Authenticity of Vedas

 क्या वेदों में मिलावट नही है ?

 By Idris Rizvi ✍️✍️


Authenticity of Vedas


वेदों की प्रामाणिकता 




Note : - यहाँ पाठकों को सूचित किया जाता है , की यह लेख मुख्तसर लिखा जा रहा है अगर इस विषय पर चर्चा की जाए तो एक अलग से बहुत लंबी-चौड़ी किताब अस्तित्व में आ सकती है परंतु लेख में केवल असल मुद्दों पर लिखा गया है जिससे पाठकों को समझने में आसानी हो , और लेख में चंद ही किताबो से हवाले भी दिए गए नही तो दर्जनों पुस्तकों के प्रमाण दिए जा सकते है परन्तु केवल लेख को बहुत छोटा और सरल करने का प्रयत्न किया है !

* नही तो वेद क्या है ? कौनसे है ? मन्त्र सहिंता या ब्राह्मण ग्रन्थ या आरण्यक या उपनिषद वेद है ? या चारो ? सूत्रकारो का क्या मत है ? मीमांसा ? वेदान्त इत्यादि का क्या क्या मत है ? वेद कोनसे है ? शाखा क्या है ? कोनसी है  ? वेद रचिता कौन है ? ऋषि मन्त्रकर्ता है ? या द्रष्टा इत्यादि पर ही कई बहस की जा सकती परन्तु हमने केवल असल मुद्दे पर लेख लिखा है नही तो कह चुका हूं , की एक अलग से किताब बन सकती है ।

जितना यहाँ लिखा या बताया गया है बुद्धिमान जनों के लिए काफी होगा और जिन प्रमाणों को दिया गया है उसको स्वतः चेक अवश्य करे ।

आपका मित्र Idris Rizvi ✍🏻✍🏻

धन्यवाद

मूर्खो की टोली 


* आज - कल के तथाकथित अपने - आपको आर्य , हिदू  ,सनातनी , आर्य समाजी कहलाने वाले बड़ी - बड़ी डींगे हाँकने लगे है कहते नजर आते है ? वेदों में कभी मिलावट नही हो सकती ? 

* अब इन मूढो जनों की बुद्धि की क्या स्तुति की जाए मूर्खो ने अपने पूर्वजों और "वैदिक पंडितो " ( अर्थात जाहिलो ) के कथनों का विश्लेषण नही किया ? कि उनका मत यही है या कुछ ओर ही पर अफसोस बेचारो की बुद्धि पर ताला पढ़ा हुआ है अधिकांश जन वेदों की बात करते है पर न बेचारो ने स्वयं कभी वेदों के दर्शन किए है नाही कभी उसे पढा है बस भेड़ चाल चलने लगे अर्थात सुनी सुनाई बात और बस उसे गधों पर बोझ की तरह से आगे बढ़ो  ।

* ये लोग जहाँ फंस जाते है उससे पीछा छुड़वाने के लिए एक मात्र उपाय उसको मिलावट कहो और जान बचाओ कोई नही अगर किसी चीज पर ईमान ( विश्वास ) न हो तो बेचारे कर भी क्या सकते है ? बेचारो का कोई कसूर भी नही है कब तक गंदगियों का बोझ उठाकर चलते रहेंगे इसके चलते एक नवीन शब्द की इन्होंने ईजाद कर रखा है हर चीज में कहो प्रक्षिप्त ( मिलावट ).और जान बचालो ।

विषय ( Subject )


* इस  लेख में हम जानने की कोशिश करेंगे वेद क्या है ? वेद किसे कहते है ? खिल , प्रक्षिप्त , मिलावट किसे कहते है ?शाखा और मूल में क्या अंतर है ? वेदों में प्रक्षिप्त और खिल में बारे में वैदिक मत के "विद्ववानों " का क्या मत है ? इत्यादि ?

वेद किसे कहते है ?


सूचना :- यहाँ पर हम पाठकों को बताते चले कि हम आसान शब्दों में और उसकी सरल परिभाषा लिख रहे है जिससे आम और खास दोनों को समझने में आसानी हो , किस विषय और किस चीज पर बात की जारी है । 

* वेद शब्द का अर्थ का ज्ञान , जानना  या विद्या आदि आदि । 

मिलावट और लुप्त किसी  कहते है ? 



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* इसकी बिल्कुल आसान परिभाषा बनाते है ! इसको इस तरीके से समझे कि एक बर्तन में एक ग्लास शुद्ध साफ पानी रखा हो और उसमें एक ग्लास गडर का पानी मिला दिया जाए तो बर्तन के शुद्ध और मूल पानी मे मिलाई गई चीज अतिरिक्त हो जाएगी जो मूल नहीं थी बल्कि उसमे एक अलग से ऐड किया गया हो उस चीज को मिलावट ( प्रक्षिप्त ) कहते है । उसी तरीके से मूल में से कुछ निकाला गई चीज को लुप्त ( missing ,खोजाना , गयाब हो जाना  ) कहते है ।

खिल और खिल सूक्त किसे कहते है ?


* खिल से क्या मुराद है ?
 परिशिष्ट ( छुटा हुआ , बाकी बचा , बकाया , अतिरिक्त , ज्यादा ) या 
प्रक्षिप्त  ( मिलावट  , मिलाया हुआ , जो मूल में न हो ) जो मन्त्र सहिंता के मूल में न हो और जरूरत के तहत मूल में मिला लिया गया हो उसे खिल सूक्त कहते है ।

सहिंता किसे कहते है ?

1 . वेद मन्त्र के संग्रह को वेद सहिंता कहते हैं  ।

(  साहित्य का इतिहास 
 डॉ . उमाशंकर ऋषि अध्यय 2 पेज नंबर 33
संस्कृत साहित्य का इतिहास 
डॉ . राममूर्ति  शर्मा अधयाय 1 पेज नंबर 3 )

2 . पदो के अंत को अन्य पदों के आदि के साथ सन्धि नियम से बाँधने का नाम सहिंता है । 
( पाणिनि अष्टाध्यायी 1-4- 109 )

* इसे आज की भाषा मे वेद पुस्तको 
( Books ) को वेद सहिंता कहते है ।

  • ऋग्वेद सहिंता
  • यजुर्वेद सहिंता
  • सामवेद सहिंता
  • अथर्ववेद सहिंता

 मूल और शाखा में भेद 



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1 .मूल Original , Prime Rudimentary 

2 . शाखा ( Branch )

* मूल और शाखा में भेद इसको आसान शब्दो मे ऐसे समझे कि मूल एक पेड़ है और शाखाएँ उसकी टहनियां जो पेड़ से ही निकली है या यूं कहें पेड़ का ही है ।

* पतंजलि महाभाष्य में  !
  • ऋग्वेद की  21 शाखाएँ
  • सामवेद की 1000 शाखाएँ
  • यजुर्वेद की 101शाखाएँ
  • अथर्ववेद की 9 शाखाएँ
* की चर्चा है और एक -एक शाखाएँ स्वतंत्र रूप से वेद है ।

* जिसमे से चंद ही बाकी है सब लुप्त खो चुकी है ।

* मूल और शाखा में कैसे भेद हुआ इस पर संक्षिप्त में चर्चा साथ - साथ करते चलते है ।

* अब इसमें 2 मत पाए जाते है । 

1 . कई हिन्दू " विद्धवान "का कहना है  ,की पहले वेद एक ही था कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने उसको चार भागो में बांट कर ऋग्वेद  , सामवेद  , यजुुुर्वेद और अर्थववेद की अलग - अलग सहिंता ( बुक्स ) बना कर उसका उपदेश अपने चेलो को दिया फिर उन लोगो ने उसकी कई शाखाओं में उसे विभाजित कर  दिया ।

2 . वेद पहले चार ही थे उसे कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने जमा किया और उसी ने चार अलग - अलग सहिंता ( बुक्स ) बना कर उसका उपदेश अपने चेलो को दिया फिर उन लोगो ने उसकी कई शाखाओं में उसे विभाजित कर  दिया ।

Note : - जो भी किसी का मत हो हर शाखा का एक एक मन्त्र खुले रूप से वेद ही है , अगर इनमे से एक भी मन्त्र की कमी - ज्यादती  होती है तो वह वेद पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं बल्कि वेदों का बहुत थोड़ा सा अंश बकाया है । वेदों की कुल 1131 शाखायें थी । 

वेदों में कुल मन्त्र संख्या

Rigved 10552 to 10589
Yajurved 1975
Samved 1875
Atharvaved 5977
Total mantras = 20379 to 20416

* अब यहाँ पर आर्य समाज से संथापक मूल शंकर तिवारी उर्फ दयानंद सरस्वती का भी जान लेते है ।

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका विषय 25 पेज नंबर 335 -36
सत्यार्थ प्रकाश 7 समुल्लास पेज नंबर 169-170

* ऋग्वेद की शाकल शाखा  

*  यजुर्वेद की शुक्ल यजुर्वेद: वाजसनेयी संहिता माध्यंदिन

* सामवेद की कौथुम और रणयनीय शाखा

* अथर्ववेद की शौनकिय अथर्ववेद इन सबको को मूल वेद मानते है और बाकी 1127 को वेदो व्याख्या और ऋषिकृत 
कहते है ।


वेद मन्त्र का स्वधाय करने से पहले 


* एक मन्त्र को पढ़ने से पहले किन चीजो का ध्यान रखने की आवश्यकता है ?

निरुक्त 7 : 1
निरुक्त 7 : 2
निरुक्त 7 : 3
निरुक्त 7 : 4
बृह्ददेवता 1 : 2
बृह्ददेवता 1 : 4
बृह्ददेवता 1 : 12
बृह्ददेवता 1 : 21
बृह्ददेवता 1 : 76
बृह्ददेवता 1 : 80
बृह्ददेवता 1 : 81
बृह्ददेवता 1 : 82
बृह्ददेवता 5 : 93
बृह्ददेवता 8 : 130 
बृह्ददेवता 8 : 131
बृह्ददेवता 8 : 134
बृह्ददेवता 8 : 135
बृह्ददेवता 8 : 136
बृह्ददेवता 8 : 138
वेदत्रयी परिचय पेज नंबर 73

ऋषि तु प्रथमं ब्रूयाच् छन्दस्तु तदनन्तरम् ।देवतामथ मन्त्राणां कर्मस्वेवमिति श्रुतिः ।। १३८ ।।

अर्थात : - अब, सर्वप्रथम ऋषि को बताना चाहिए, उसके बाद छन्द को, और तब
कर्म के सन्दर्भ में इस क्रम से मन्त्रों के देवता को, ऐसी श्रुति है। 
(बृह्ददेवता 8 : 138)

  1. ऋषि
  2. छंद
  3. देवता
  4. स्वर , विनियोग , अर्थ , वर्ण , अक्षर

* मंत्र को पढ़ने से पहले देखा जाता है उसका ऋषि कौन है ? एक मन्त्र ऋषी की क्या भूमिका होती है यहा उसका निर्णय कर सकते हो ।


* अथातौ दैवतम् । तत् यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीनां देवतानां तत्दैवतमिति आचक्षते । सा एषा देवतोपपरीक्षा। यत्कामः ऋषिः यस्यां देवतायाम् आर्थपत्यम् इच्छन् स्तुति प्रयुङ्क्ते, तद्देवतः स मन्त्रो भवति। ताः त्रिविधाः ऋचः-परोक्षकृताः, प्रत्यक्षकृताः, आध्या-
त्मिक्यः च। तत्र परोक्षकृताः सर्वाभिः नामविभक्तिभिः युज्यन्ते, प्रथमपुरुषश्च आख्यातस्य ॥१॥

अर्थात : -अब देवत-काण्ड आरम्भ होता है । जिन नामों में मुख्यरूप से देवताओं
का स्वरूप-वर्णन है उनका संग्रह 'दैवत' कहलाता है। आगे इस काण्ड में  देवताओं की पूरी परीक्षा वर्णन है। किसी मन्त्र में  कोई कामना लेकर, कोई ऋषि, जिस देवता का प्रधान अर्थ चाहता हुआ, स्तुति करता है-उसी देवता का वह मन्त्र होता है । तो, ये ऋचायें ( मन्त्र ) तीन तरह की हैं-परोक्षतः कही गई, प्रत्यक्षत: कही गई और स्वयं कही गई । ( निरुक्त 7 : 1 ) 

* यह संभव नही की मन्त्र में ऋषि न हो परंतु एक मन्त्र में एक से ज्यादा देवता हो सकते किसी मन्त्र में देवता भी नही होता वहा पर ।

तत् ये अनादिष्टदेवताः मन्त्राः, तेषु देवतोपपरीक्षा। यद्देवतः स यज्ञो वा यज्ञाङ्गं वा, तद्देवताः भवन्ति । अथान्यत्र यज्ञात्-प्राजा- पत्याः इति याज्ञिकाः, नाराशंसाः इति नैरुक्ताः। अपि वा, सा काम- देवता स्यात्, प्रायोदेवता वा । अस्ति हि आचारो बहुलं लोके-देव- देवत्यम्, अतिथिदेवन्यम्, पितृदेवत्यम् । याज्ञदैवतो मन्त्र इति । अपि
हि, अदेवताः देवतावत् स्तूयन्ते। यथा, अश्वप्रभृतीनि ओषधिपर्य-न्तानि । अथापि अष्टौ द्वन्द्वानि ॥

अर्थात : - जिन मन्त्रों में देवता का उल्लेख नहीं, उनके देवता का निर्णय करते हैं । जिन देवता का यज्ञ हो, या यज्ञ का खण्ड भी हो-उन्हीं देवता के वे ( मन्त्र ) होते हैं ।
यज्ञ से भिन्न-स्थानों में याज्ञिकों के अनुसार प्रजापति [ मन्त्र के ] देवता होते हैं ।
( निरुक्त 7 : 4 )

* किसी मन्त्र में देवता का उल्लेख नही भी होता वहा पर इंद्र , प्रजापति , विश्वदेव , इत्यादि होगा मन्त्र पढ़ कर पता चल जाता है , की इस मंत्र में किस देवता की स्तुति  ( वर्णन ) किया गया है ।

* और अर्थववेद 20कांड के कुंताप सूक्त
 ( 127 से 136 सूक्त ) में ऋषि का अता पता ही नही है । 

पदपाठ


* वैदिक मत के लोगो का मानना है कि वेदो सुरक्षित रखने के लिए उसे कई तरीके से उसको पढ़ा जाता था और उसको कंठस्थ ( मुंहजबानी याद ) कर लिया जाता है जो कि इस प्रकार है ।


'जटा, माला, शिखा, लेखा, ध्वजो, दण्डो, रथो, घनः । अष्टौ विकृतयः प्रोक्ताः क्रमपूर्वा मनीषिभिः ॥' 
( विकृतवल्ली 1 : 5 ). 
( ऐतआरण्यक 3 : 13 )
( बृह्ददेवता 1 : 14 )

इस प्रकारसे प्रत्येक मंत्रके ११ संहितापाठ होते हैं। वास्तवमें पाठ-प्रकार भेद से
आर्षी-संहिताके ग्रन्थ अनेक हैं किन्तु संहिता प्रत्येक वेद की एक-एक ही होती है।

* इसमें से 8 प्रमुख है जिसको अष्टविकृतिया कहते है ।

 जटा
माला
शिखा
 रेखा
 ध्वजो
दण्ड
रथ
 घन

* इसके अलावा 3 और है ।

 1 . सहिंता पाठ
2 .पदपाठ
3 . क्रमपाठ

पाठ भेद का मुख्य कारण 


*  क्या यह 11 विकृतियां पहले से चली आ रही है या यह बाद की रचनाएं हैं हिंदू मतवाले लोगों को धोखा देते नजर आते हैं की वेदों को सुरक्षित करने के लिए इसको ईजाद किया गया था इसमें कितने सच्चई इसको भी देख लेते है  ।

*  चारों वेद सहिंता पुरानी है इस कारण समय देश और व्यक्ति तथा अध्ययन और अध्यापन मैं उच्चारण गत अंतर से पदपाठ हो गए हैं  ! वेदत्रयी परिचय पेज नंबर 32

* इसको और अच्छे से आर्य समाजी साहित्य भूषण पंडित रघुनंदन शर्मा की सुप्रशिद्ध पुस्तक वैदिक सम्पत्ति 
(सन 1930-35 लगभग ) के 4 खंड पेज नंबर 494 में बयान किया है ।

* आदिमकालीन संहिताएँ, संहिता ही थीं। उनमें मन्त्रों के पद अलग-अलग न थे। सब मन्त्र सन्धियुक्त ही थे, परन्तु कुछ दिन के बाद वेदार्थ करने में झगड़ा होने लगा। कोई 'न तस्य' को 'नतस्य' कहने लगा और कोई 'न तस्य' ही। ऐसी दशा में आवश्यकता हुई कि पदों का विच्छेद पाठ भी आरम्भ किया जाए, अत:
वैदिक आचार्यों ने अलग-अलग करके एक-एक संहिता की दो-दो संहिताएँ कर लीं। यहीं से शाखाओं का आरम्भ हुआ।

* बुक्स पहले ही से थी फिर उसको एक से दो कर लिया गया उचारण की गलतियों कारण नाकि पदपाठ से सहिंता की रचना  की गई विकृतियां , पदपाठ वेदों को सुरक्षित रखने के लिए नही बल्कि वेद शब्द के उच्चारण की गलतियों  का नतीजा है परन्तु वो सहिंता कहा है जिससे एक से दो बनाई गई ये सब लुप्त हो चुकी है । 

* दयानंद सरस्वती के मतानुसार इक्षवाकु के जमाने मे लिपिबद्ध करने की कला आ चुकी थी और इक्षवाकु का दौर हिन्दू मत के अनुसार लाखो साल पुराना है उसके ज़माने में मनुस्मृति को लिपिबद्ध कर लिया था उस वक्क्त मनुस्मृति लिख ली थी वेद नही लिखा गया क्या मिथ्या है सब पोपलीला है ।

*  यहां पाठकों को यह सब पढ़कर कुछ विचित्र सा लग रहा होगा की विषय से हटकर किन बातों पर लेख कि शुरुआत की है परंतु मैं आपको आश्वासन देता हूं कि जो कुछ सरल परिभाषा और उसके साथ जो कुछ भी बताया या लिखा गया है वह व्यर्थ नहीं होगा बल्कि अब से जो लिखा जाएगा उसको समझने के लिए यह सब बाते महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी  जिससे आपके सामने हर चीज खुलकर आने लगेगी  !

वेदों में मिलावट और आर्य समाजी


* शुरुआत करते है  आर्य समाज के बानी 
मूलशंकर तिवारी उर्फ दयानंद सरस्वती से की वो वेदों में मिलावट मानते है या नही ।

* किताब का नाम ?
" चतुर्वेद - विषय सूची "
 ( वैदिक यंत्रालय अजमेर ) पेज नंबर 99


Authenticity of Vedas

 

* अथ कुन्ताप-सूक्तानि -भद्रेण वचसा वयमित्यादि०,"गोभयाद्
गोगतिरिवेत्यादि०, "आदला बुकमेककम्, अलाबुकं निखातकम् ।।१।।
इत्यादि०,"उदभिर्यथालाबुनीत्यादि०, "इदं राधो विभु प्रभिवत्यादि ।
इति कुन्ताप-सूक्तानि समाप्तानि । परिशिष्टानि प्रक्षिप्तानीति विज्ञेयम् ।

अर्थात : - दयानंद सरस्वती जी कहते कुंताप सूक्त की समाप्ति के बाद परिशिष्ट और प्रक्षिप्त ( मिलावट ) है !

आर्य समाजी अथर्ववेद भाष्यकार
 पं. विश्वनाथ विद्यालंकार 


* इसी बात को आगे बढ़ाते हुए आर्य समाजी अथर्ववेद भाष्यकार पं. विश्वनाथ विद्यालंकार अथर्ववेद के 20 कांड सूक्त 127 पर बड़ी बहस करते है ।

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“अथर्ववेद के कुन्ताप सूक्त क्या प्रक्षिप्त है?”

पं. विश्वनाथ विद्यालंकार विद्यामार्तण्ड ने सम्पूर्ण अथर्ववेद पर भाष्य किया है। अथर्ववेद में कुल बीस काण्ड है। पंडित जी ने उल्टे क्रम से भाष्य करना आरम्भ किया था। प्रथम उन्होंने बीसवें काण्ड का भाष्य किया और उसके बाद क्रमशः 19, 18, 17 का भाष्य करते हुए 3, 2 व प्रथम काण्ड का भाष्य किया। इसका एक कारण यह रहा कि अथर्ववेद मन्त्र संख्या की दृष्टि से सामवेद और यजुर्वेद से बड़ा है और भाष्य आरम्भ करते हुए विद्वान भाष्यकार को यह पता नहीं होता कि वह पूरा भाष्य कर पायेगा या नहीं। बीसवें काण्ड का भाष्य पूरा हो जाने पर भूमिका में पंडित जी ने अथर्ववेद के इस काण्ड के भाष्य के विषय में लिखा कि 20वां काण्ड अन्य काण्डों की अपेक्षा अधिक गहन है। मन्त्रों में स्थान-स्थान पर अति-अप्रसिद्ध शब्द मिलते हैं। प्रकरण की दृष्टि में रखकर ऐसे शब्दों के यौगिक अर्थ किये गए हैं। इस काण्ड पर न तो सायणाचार्य का भाष्य है, और किसी अन्य प्राचीन आचार्य का। अथर्ववेद के अंग्रेजी अनुवादों में भी 20वें काण्ड का अनुवाद नहीं मिला। इसलिये स्वावलम्ब पर ही यह हिन्दी-भाष्य किया गया है। यह बता दें कि पंडित विश्वनाथ विद्यालंकार जी का 20 वें काण्ड का भाष्य सन् 1975 में प्रकाशित हुआ था। सम्भव है कि यह भाष्य उन्होंने सन् 1974 में आरम्भ किया होगा। 

20वें काण्ड के 127 से 136 तक के 10 सूक्त ‘कुन्ताप सूक्त’ कहे जाते हैं। स्वामी दयानन्द जी ने इन्हें परिशिष्ट या प्रक्षिप्त माना है। इस विषय में विस्तार से लिखते हुए पंडित विश्वनाथ विद्यालंकार जी कहते हैं कि 20वें काण्ड के 127 से 136 सूक्तों को ‘‘कुन्ताप-सूक्त” कहते हैं। महर्षि दयानन्द ने अपनी ‘‘चतुर्वेद-विषय-सूची” (वैदिक यन्त्रालय, अजमेर) में इन सूक्तों को परिशिष्ट अर्थात् प्रक्षिप्त माना है। 127 वें सूक्त के आरम्भ में ‘‘चतुर्वेद-विषय-सूची” के एतसम्बन्धी उद्धरण उद्धृत कर दिये हैं। (इसे पाठक पंडित जी के अथर्ववेदभाष्य में देख सकते हैं।)

“अथर्ववेद-सर्वानुक्रमणी” में भी 127 से 136 सूक्तों को ‘‘खिल” कहा है। ‘खिल’ का अभिप्राय है परिशिष्ट, जिसे कि महर्षि दयानन्द ने प्रक्षिप्त कहा है। ‘‘अथर्ववेद-सर्वानुक्रमणी” में 127 से 136 सूक्तों के ऋषि, देवता और छन्द भी इसीलिये नहीं दिये हैं।  

अथर्ववेद की पैप्पलाद शाखा में भी 127 से 136 तक के कुन्ताप-सूक्तों का अभाव है और न ही पैप्पलाद-शाखा के किसी मन्त्र में कुन्ताप-सूक्तों के किसी मन्त्र का निर्देश ही प्राप्त होता है। 

अतः यह उचित प्रतीत होता है कि इन कुन्तापसूक्तों को मूल अथर्ववेद के प्रामाणिक सूक्तों के मध्य में न छाप कर, इन्हें परिशिष्टरूप में या तो अथर्ववेद की समाप्ति पर, या पृथक् गुटकारूप में छापा जाया करे। 

कुन्ताप सूक्तों के अभिप्रपय आसानी से बुद्धिगोचर नहीं होते। इन सूक्तों में स्थान-स्थान में ऐसे पद पठित है, जिनके अर्थों को बुद्धिपूर्वक करने में पर्याप्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। यह यतः प्राथमिक प्रयत्न है, इसलिये अर्थों के सम्बन्ध में, वैदिक विद्वानों का मतभेद भी सम्भव है। कुन्ताप-सूक्तों में ऐसे भी कतिपय मन्त्र है, जिनका प्रतिपद अर्थ देना उचित प्रतीत नहीं हुआ। इसलिये ऐसे मन्त्रों के अर्थ शिष्ट-भाषा में किये गए हैं। 

अथर्ववेद के 20 वें काण्ड में केवल 4 सूक्त ऐसे हैं, जिनमें कि बीस-बीस मन्त्र हैं। यथा सूक्त 129, 130 और 131 में बीस-बीस मन्त्र हैं। परन्तु ये तीनों सूक्त ‘‘खिल” होने से प्रक्षिप्त हैं, क्योंकि ये कुन्ताप सूक्तों के हैं। काण्ड 20 सूक्त 70 में भी 20 मन्त्र है। सम्भवतः ‘‘विंशतिः स्वाहा” (17) मन्त्र बीसवें काण्ड के 70वें सूक्त का निर्देश करता हो। 

अथर्ववेद भाष्यकार पंडित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

 ( आर्य समाजी )



* ये अपनी अथर्ववेदभाष्यभूमिका
 (पेज नंबर 40 से )  में लिखते है मन्त्र सहिंता के मन्त्रो की संख्या में और उसके सेटिंग में भी गड़बड़ है जिसका एक्सपल आज भी आप बड़ी आसानी से निकला सकते है ।

* ex .  इनकी अथर्ववेद के 12 वे कांड में 5 सूक्त है और सायण भाष्य पर  आधारित सहिंता में 11सूक्त है । 

* पंडित सेवकलाल कृष्णदास की पुस्तक में कुल मन्त्र संख्या 5937 है ।

* इनकी पुस्तक में 5977मंत्र है ।

* सायण भाष्य में 759 सूक्त है अजमेर वैदिक यंत्रालय की पुस्तक में 731 सूक्त है ।

* जब ये भी कुंताप सूक्त पर पहुँचते है ।
 ( 20 - 127 से 137 ) 

* सूचना-सूक्त १३६ के मन्त्र १ तथा ४ को छोड़कर, यह कुन्तापसूक्त १२७-१३६ ऋग्वेद आदि अन्य वेदों में नहीं है। हम स्वामी विश्वेश्वरानन्द नित्यानन्द कृत पद सूची से पद पाठ को संग्रह करके और कुछ शोधकर लिखते हैं। 

आर्य समाज पंडित


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* आर्य समाजी साहित्य भूषण पंडित रघुनंदन शर्मा की सुप्रशिद्ध पुस्तक वैदिक सम्पत्ति  (सन 1930-35 लगभग ) के 4 खंड पेज नंबर 503 में लिखते है 1 वेद में नही बल्कि 4 वेदों में मिलावट है ।

ऋग्वेद में मिलावट


* बालखिल्य सूक्त ऋग्वेद में, खिल अर्थात् ब्राह्मणभाग यजुर्वेद में, आरण्यक और
महानाम्नी सूक्त सामवेद में और कुन्तापसूक्त अथर्ववेद में मिले हुए हैं। इनको सब लोग जानते हैं और सबके विषय में विस्तृत प्रमाण उपलब्ध हैं। 

* इनके अतिरिक्त कुछ स्थल यजुर्वेद और
अथर्ववेद में और हैं जिनकी सूचना उन्हीं वाक्यों से हो जाती है कि वे प्रक्षिप्त हैं। 

* उसी प्रकार प्रक्षिप्त भाग का भी ज्ञान सबको है और उसको हटाकर शुद्धसंहिताओं के रूप को सब जानते हैं। ऋग्वेद के बालखिल्य सूक्तों के लिए ऐतरेयब्रा० २८ । ८ में लिखा है
कि वज्रेण बालखिल्याभिर्वाच: कूटेन'। इसके भाष्य में सायणाचार्य कहते हैं कि 'बालखिल्य-नामका: केचन महर्षयस्तेषां सम्बन्धीन्यष्टौ सूक्तानि विद्यन्ते तानि बालखिल्यनामके ग्रन्थे समाम्नायन्ते', अर्थात् बालखिल्य नाम के कोई महर्षि थे। उनसे सम्बन्ध रखनेवाले आठ सूक्त
हैं। वे खिल्य नाम के ग्रन्थ में लिखे गये हैं। इस वर्णन से ज्ञात हुआ कि बालखिल्य सूक्तों की अलग पुस्तक थी । 

* वही पुस्तक ऋग्वेद के परिशिष्ट में आ गई है और अब तक अथ बालखिल्य
और इति बालखिल्य के साथ ऋग्वेद में ही सम्मिलित है। इसके अतिरिक्त अनुवाकानुक्रमणी में स्पष्ट लिखा हुआ है कि 'सहस्रमेतत्सूक्तानां निश्चितं खैलिकैर्विना', अर्थात् खिल भाग को
छोड़कर ऋग्वेद के एक सहस्र सूक्त निश्चित हैं । 

* यहाँ बालखिल्यों को ऋग्वेद की गिन्ती में नहीं गिना गया। इस प्रकार ऋग्वेद का खिल सबको ज्ञात है।

यजुर्वेद में मिलावट


* इस प्रकार इसी प्रकार यजुर्वेद का मिश्रण भी प्रसिद्ध है। सर्वानुक्रमणी में लिखा है कि 'माध्यन्दिनीये वाजसनेयके यजुर्वेदाम्नाये सर्वे सखिले सशुक्रिय ऋषिदैवतछन्दास्यानुक्रमिष्यामः', 

*अर्थात ऋचा खिल और शुक्रिय मन्त्रों के सहित माध्यन्दिनीय यजुर्वेद के ऋषि, देवता और छन्दों कीअनुक्रमणी बनाता हूँ। यहाँ खिल भाग का प्रत्यक्ष सङ्केत है । इसके आगे अनुक्रमणी में ही लिखा
हुआ है कि 'देवा यज्ञं
ब्राह्मणानुवाकोविंशतिरनुष्टभः सोमसम्पत्', अर्थात् यजुर्वेद १९ । १२
के 'देवा यज्ञमतन्वत' मन्त्र से लेकर बीस अनुष्टुप्छन्द ब्राह्मणभाग हैं और 'अश्वस्तूपरो ब्राह्मणाध्याय: शादंदद्भिस्त्वचान्तश्च', 

* अर्थात् यजुर्वेद का चौबीसवाँ अध्याय सबका सब और २५वें अध्याय के आरम्भ के शादं से लेकर त्वचा तक नौ मन्त्र ब्राह्मण हैं और 'ब्राह्मणे ब्राह्मणमिति द्वे काण्डिके तपसे अनुवाकश्च ब्राह्मणम्', अर्थात् यजुर्वेद अध्याय ३० के
'ब्राह्मणे ब्राह्मणम्' और शेष सारा अध्याय ब्राह्मण है ।

* परन्तु हम देखते हैं कि वाजसनेयी संहिता ना तमौ वर्णानपर्वी साऽनित्या।की मन्त्रसंख्या १९०० ही है जिसमें शुक्रिय के भी मन्त्र मिले हुए हैं क्योंकि लिखा है कि-
द्वे सहस्र शतं न्यूनं मन्त्रे वाजसेनयके। इत्युक्तं परिसंख्यातमेतत्सर्वं सशुक्रियम्।
अर्थात् सौ कम दो हज़ार मन्त्र वाजसनेय के हैं और इसी में शुक्रिय के भी सम्मिलित हैं। जब यह वाजसनेयी संहिता है तब इसमें सब मन्त्र वाजसनेय के ही होने चाहिएँ, शुक्रिय के नहीं किन्तु हम देखते हैं कि वर्तमान वाजसनेयी संहिता की मन्त्रसंख्या १९७५ है, इससे स्पष्ट हो
जाता है कि शुक्रिय के मन्त्र तो १९०० में ही घुसे हैं और शेष ७५ मन्त्र कहीं बाहर से लाकर जोड़े गये हैं। हमको ब्राह्मणभाग के प्रक्षेप का पता मिल रहा है इससे ज्ञात होता है कि यजुर्वेद का प्रक्षेप भी सबपर प्रकट है और प्रसिद्ध है।

सामवेद में मिलावट 


* इसी तरह सामवेद का भी खिलभाग, अर्थात् परिशिष्ट भाग प्रसिद्ध है। सभी जानते हैं कि सामवेद की महानाम्नी ऋचाएँ और आरण्यकभाग परिशिष्ट हैं। महानाम्नी ऋचाओं के विषय में
ऐतरेयब्राह्मण २२ । २ में लिखा है कि 'ता ऊर्ध्वा सीम्नोऽभ्यसृजत। यदूर्वा सीम्नोऽभ्यसृजत तत् सिमा अभवन् तत्सिमानां सिमात्वम्', 

* अर्थात् इन महानाम्नी ऋचाओं को प्रजापति ने वेद की सीमा के बाहर बनाया है। बाहर होने के कारण ही इनका नाम सिमा है। यहाँ महानाम्नी ऋचाएँ स्पष्ट रीति से ऋग्वेद की सीमा के बाहर बतलाई गई हैं। 

* ये अब तक पूर्वार्चिक के अन्त
में लिखी जाती हैं। इसी प्रकार आरण्यकभाग भी परिशिष्ट ही है। यह बात सामवेदसंहिता के देखनेमात्र से स्पष्ट हो जाती है । सामवेदसंहिता के दो विभाग हैं । एक का नाम पूर्वार्चिक है और दूसरे का उत्तरार्चिक। पूर्वार्चिक में छह प्रपाठक हैं और प्रत्येक प्रपाठक के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध दो-दो विभाग हैं। यह क्रम पाँच प्रपाठकों में एक ही समान है, परन्तु छठे प्रपाठक में जहाँ यह आरण्यकखण्ड जुड़ा हुआ है उसमें तीन विभाग छपे हुए हैं। यह तीसरा विभाग ही आरण्यक है इसको सायणाचार्य ने भी परिशिष्ट ही कहा है और क्रम के देखने से भी यह परिशिष्ट ही ज्ञात होता है, इसलिए इसके खिल होने में सन्देह नहीं है।

अथर्ववेद में मिलावट


* जिस प्रकार इन तीनों वेदों का खैलिक भाग प्रसिद्ध है उसी प्रकार अथर्ववेद का कुन्तापसूक्त भी खिल के ही नाम से प्रसिद्ध है। अजमेर की छपी हुई संहिता में जिस प्रकार ऋग्वेद का खिलभाग, 'अथ बालखिल्य' और 'इति बालखिल्य' लिखकर छापा गया है ।

* उसी प्रकार अजमेर की छपी हुई अथर्वसंहिता के काण्ड २०, सूक्त १२६ के आगे 'अथ कुन्तापसूक्तानि' लिखकर छापा गया है और सूक्त १३७ के पहले 'इति कुन्तापसूक्तानि समाप्तानि' भी छपा हुआ है, जिससे प्रकट हो जाता है कि इतना भाग परिशिष्ट ही है। स्वामी हरिप्रसाद वेदसर्वस्व पृष्ठ ९७ पर लिखते हैं कि 'जैसे ऋग्वेदसंहिता में बालखिल्य सूक्त मिलाये जा रहे हैं वैसे अथर्वसंहिता के अन्त में आजकल कुन्तापसूक्त मिलाये जा रहे हैं। इस विवरण से पाया जाता है कि कुन्तापसूक्त भी परिशिष्ट ही हैं और शुरू से ही सबको ज्ञात हैं।

मिलावट के प्रमाण 


* इन प्रसिद्ध और सर्वमान्य परिशिष्टों के अतिरिक्त भी चारों संहिताओं में कहीं-कहीं प्रक्षिप्त भाग है जो उसी स्थल की सूचना से स्पष्ट हो जाता है। उदाहरणार्थ यजुर्वेद का निम्न मन्त्र देखने योग्य है-

* न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः । हिरण्यगर्भ इत्येषा मा मा हि सीदित्येषा यस्मान्नजात इत्येषाः। -यजु:०३२।३

* इस मन्त्र में आधा भाग तो मन्त्र का है, परन्तु आधा भाग तीन भिन्न-भिन्न स्थलों में आये हुए मन्त्रों की प्रतीकों का बतलानेवाला बाह्य वाक्य है। 'हिरण्यगर्भः' यजुः० १३ । ४ में, ‘मा मा
हिंसीत्' यजुर्वेद १२ । १०२ में और ‘यस्मान्नजातः' यजुर्वेद ८।३६ में आये हुए मन्त्रों केआरम्भिक शब्द हैं ।

* इसलिए मूल मन्त्रों की प्रतिकों का बतानेवाला संस्कृतवाक्य है, क्योंकि
सर्वानुक्रमणी ३।१५ में लिखा है कि 'एताः प्रतीकचोदिता ब्रह्मयज्ञे ध्येयाः', अर्थात् यह
प्रतीकवाला मन्त्र ब्रह्मयज्ञ का है। प्रतीक कहने से ही यह बाहर का सूचित होता है।

 * इसी प्रकार और भी बहुत-से छोटे-छोटे टुकड़े अनेक मन्त्रों में मिले हैं, जिनकी सूचना उव्वट और महीधर आदि ने यजु के नाम से कर दी है। इसका उत्तम नमूना यजु १०।२० के भाष्य में दिखलाई पड़ता
है ।

* इसी प्रकार की बाह्य संस्कृत का एक नमूना अथर्ववेद में भी देखा जाता है। अथर्वकाण्ड १९ सूक्त २२ और २३ में लिखा है कि-

* अङ्गिरसानामाद्यैः पञ्चानुवाकैः स्वाहा।
आथर्वणानां चतुर्ऋचेभ्यः स्वाहा।
अर्थात् अङ्गिरस वेद के पाँच अनुवाकों से स्वाहा और अथर्ववेद की चार ऋचाओं से स्वाहा। इन वाक्यों से प्रतीत होता है कि ये वाक्य कहीं बाहर के हैं। ऐसे वाक्य स्वयं प्रक्षिप्त होने की सूचना दे रहे हैं। 

* कहने का तात्पर्य यह कि मूल वैदिक संहिताओं में जो कुछ परिशिष्ट, खैलिक और प्रक्षिप्त भाग है वह आदिमकाल से आज तक सबको ज्ञात है। ऐसा नहीं है कि प्रक्षिप्त भाग वेदपाठियों से छिपा हो। 

यदि छिपा होता तो महाभारत में वेदों को अशुद्ध लिखकर बेचनेवाले वेददूषकों का वर्णन न होता । अशुद्ध लिखनेवाले मूर्ख लेखकों के कारण ही गोपथब्राह्मण
१ । २९ में आज तक 'इषे त्वोर्जे त्वा' के स्थान में इखे त्वोर्जे त्वा' छप रहा है।

आर्य समाजी विद्धवान 


Authenticity of Vedas




* वैदिक वाङ्मय का इतिहास
प्रथम भाग वेदों की शाखाएं
लेखक पण्डित भगवद्दत्त बी. ए.
अध्यक्ष वैदिक अनुसन्धान संस्था-
माडल टाऊन सन 1935 ईसवी

* जैसे की हमने पहले की बता दिया है , की ऋग्वेद की 21 शाखाएँ थी उसी में से ऋग्वेद की ।
 
1 . बाष्कल
2 . शाकल  दो शाखाएं है । 


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* एतत् सहस्र दश सप्त चैवाष्टावतो बाष्कलकेऽविवानि ।
तान्पारणे शाकले शैशिरीये वदन्ति शिष्टा न खिलेषु विप्राः ॥३६॥

अर्थात्-याकलशाखा पाठ में शाकलशाखा पाठ से आठ सूक्त अधिक है इस प्रकार शाकल पाठ में १११७ सूक्त है और बाष्कल शाखा पाठ में ११२५ सुक्त हैं। इन आठ सूक्त में से एक तो बाष्कल शाखा के अन्त का संज्ञान सूक्त है और शेष सात सूक्त ११ वालखिल्य सूक्तों में से पहले सात है।

* बाष्कल के 8 मंडल में कुल 99 सूक्त है । ( 7 अधयाय पेज नंबर 98 )


* शतपथ ब्राह्मण के अनुसार ऋग्वेद में कुल 10800 पंक्तिया अर्थात मन्त्र है यजुर्वेद में 8000 सामवेद 4000 


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* उसने ऋचाओं को १२००० बृहती में विभाजित किया, क्योंकि प्रजापति ने इतनी ऋचायें बनाईं। वे तीसवें व्यूह में पंक्तियों में ठहर गये। चूंकि वे तीसवें व्यूह में ठहरे, इसलिए मास में तीस रातें होती हैं। चूंकि पंक्तियों में, इसलिए प्रजापति पांक्त है (पाँचवाला)। १०८०० पक्तियाँ हैं ॥२३॥

* उसने दो और वेदों के विभाग किये। १२००० बृहतियों में ८००० यजु, ४००० साम। प्रजापति ने इन दो वेदों में इतना ही बनाया। ये दोनों तीसवें व्यूह में पंक्तियों पर ठहर गये। चूंकि तीसवें व्यूह में ठहरे, इसलिए महीने में तीस रातें होती हैं। पंक्तियों में, इसलिए प्रजापति पांक्त (पाँचवाला) है। १०८०० पंक्तियाँ हुईं ॥२४॥

* आगे पण्डित भगवद्दत्त बी. ए. यजुर्वेद के विषय मे 9 अधयाय पेज नंबर 174 से 175 में लिखते है ।

* शुक्लयजुः की मन्त्र-संख्या
ब्रह्माण्ड पुराण पूर्व भाग अध्याय ३५ श्लो० ७६, ७७ तथा वायु पुराण अध्याय ६१ श्लोक ६७, ६८ का पाठ निम्नलिखित है ।

* द्वे सहस्रे शते न्यूने मन्त्रे वाजसनेयके।
ऋम्गणः परिसंख्यातो ब्राह्मणं तु चतुर्गुणम् ।। अष्टौ सहस्राणि शतानि
चाष्टावशीतिरन्यान्यधिकश्च पादः ।
एतत्प्रमाणं यजुषामृचां च सशुक्रिय सखिलं याज्ञवल्क्यम् ॥

* अर्थात्-वाजसनेय आम्नाय में १९०० ऋचाएं हैं। तथा यजुओं और ऋचाओं का प्रमाण शुक्रिय और खिलसहित ८८८० और एक पाद है। इस प्रकार पुराणों के अनुसार वाजसनेयों के पाठ में कुल मन्त्र
८८८० और एक पाद हैं । अथवा ६९८० और एक पाद यजुओं का तथा १९०० ऋचाएं हैं।

* एक चरणव्यूह का पाठ है-

द्वे सहस्रे शते न्यूने मन्त्रे वाजसनेयके ।
ऋग्गणः परिसंख्यातस्ततो ऽन्यानि यजूंषि च । अष्टौ शतानि सहस्राणि चष्टाविंशतिरन्यान्यधिकञ्च पादम् ।
एतत्प्रमाणं यजुषां हि केवलं सवालखिल्यं सशुक्रियम् ।। ब्राह्मणं च चतुर्गुणम् ।।

* चरणब्यूह और पुराणों के पाठ का स्वल्प अन्तर है । चरणब्यूह के अनुसार वाजसनेयों की कुल मन्त्र संख्या ८८२० और एक पाद है। प्रतिज्ञापरिशिष्ट सूत्र के चतुर्थ खण्ड में लिखा है- वाजसनेयिनाम्-अष्टौ सहस्त्राणि शतानि चान्यान्यष्टौ संमि-
तानि ऋम्भिविभक्तं सखिलं सशुक्रियं समस्तो यजूंषि च वेद ॥४॥

* अर्थात् बाजसनेयों की मन्त्र संख्या ८८०० है। इतना ही सम्पूर्ण यजुः है। इस में ऋचाएं, खिल और शुक्रिय अध्याय सम्मिलित हैं। चरणव्यूह का टीकाकार महिदास इसी श्लोक के अर्थ में ऋक्
संख्या १९२५ मानता है । उस के इस परिणाम पर पहुंचने का कारण
जानना चाहिए।

* आगे पण्डित भगवद्दत्त बी. ए. सामवेद के विषय मे 10 अधयाय पेज नंबर 219 में लिखते है ।

* इसी प्रकार का पाठ एक प्रकार के चरणव्यूहों में है ।

अष्टौ सामसहस्राणि सामानि च चतुर्दश ।
अष्टौ शतानि नवतिर्दशतिर्वालखिल्यकम् ।।

सरहस्यं ससुपर्ण प्रेक्ष्य तत्र सामदर्पणम् ।
सारण्यकानि ससौर्याण्येतत्सामगणं स्मृतम् ।।

इसी का दूसरा पाठ दूसरे प्रकार के चरणव्यूहों में है ।

अष्टौ सामसहस्राणि सामानि च चतुर्दश ।
अष्टौ शतानि दशभिर्दशसप्तसुवालखिल्यः ससुपर्णः प्रेक्ष्यम् । तत्सामगणं स्मृतम् ।

* एक और प्रकार के चरणव्यूह का निम्नलिखित पाठ भी ध्यान देने
योग्य है ।

* अष्टौ सामसहस्राणि छन्दोगार्चिकसंहिता । गानानि तस्य वक्ष्यामि सहस्राणि चतुर्दश ।। अष्टौ शतानि ज्ञेयानि दशोत्तरदशैव च ।ब्राह्मणञ्चोपनिषदं सहस्रं त्रितयं तथा ।।

* अन्तिम पाट का अभिप्राय बहुत विचित्र. प्रकार का है । तदनुसार साम आर्चिक संहिता में ८००० साम थे । उसी के गान १४८२० थे। साम गणना के पुराणस्थ और चरणव्यूह-कथित पाठों में स्वरूप भेद हो
गया है। उस भेद के कारण इन वचनों का स्पष्ट और निश्चित अर्थ लिखा नहीं जा सकता । हां, इतना तो निणींत ही है कि आर्थिक संहिता में शतपथ-प्रदर्शित १४४००० अक्षर परिमाण के सब मन्त्र होने चाहिएं। और अनेक स्थानों में ८००० के लगभग साम संख्या कहने से यह भी
कुछ निश्चित ही है कि सामवेद की समस्त शाखाओं में कुल ८००० के लगभग मन्त्र होंगे।

एक और आर्य समाजी 

*  सम्पूर्ण जीवन चरित्र महर्षि दयानंद सरस्वती जिल्द 1 पेज नंबर 386 

Authenticity of Vedas

*  क्या आर्य समाजी के पूर्वज वेदों में मिलावट नहीं मानते थे ? 

आइए देखते हैं ?

* जैसे सब को ज्ञात है कि इनके पास वेदों की सहिंता ( बुक्स ) भी मौजूद नहीं थी जर्मनी से छप कर आती तो यह पढ़ लिया करते नहीं तो वेद इनके पास मौजूद भी नहीं थे ।

* उसी के चलते आर्य समाजी जो दयानंद सरस्वती के जमाने में खुद उनके साथ आर्य समाज का प्रचार और दयानंद की मान्यता पर लोगों में उसका प्रचार करते थे ।

* कन्हैयालाल जी कहते हैं दयानंद सरस्वती का विरोध करके क्या फायदा यदि किसी ने अपना स्वार्थ निकालने के लिए मूर्ति पूजा की कोई स्तुति यानि मंत्र को मिला दिया हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं क्योंकि चारों वेद एक किताब की शक्ल में कहीं उपलब्ध नहीं है ।

* अब आर्य समाजी फिर से विलाप करने लगेंगे यहाँ श्रुति  कहाँ मन्त्र नही तो उनको

 दयानंद सरस्वती कृत

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका विषय 4 पेज नंबर 98 - 99 देख लेना चाहिए । की दयानंद सरस्वती जी ने स्पष्ट किया है कि निगम ,श्रुति ,छंद ,मंत्र सब नाम वेदी के नाम हैं ।

Book

अलबेरूनी लिखित

अलबरूनी का भारत

ALBERUNIS INDIA

[ALBERUNI]

अनुवादक

श्री रजनी कान्त शर्मा एम० ए०

प्रकाशक

भादर्श हिन्दी पुस्तकालय

४९२, मालवीय नगर

इलाहाबाद-३

प्रयम संस्करण )

मार्च सन् १९५०


Authenticity of Vedas


* ब्राह्मण लोग वेद को लिखने की आज्ञा नहीं देते, क्योंकि इसका उच्चारण विशेप ताल-स्वरों से होता है । वे लेखनो का प्रयोग इसलिए नहीं करते कि कहीं कोई अशुद्धि और लिखित पाठ में कोई अधिकता और प्रभाव न हो जाय । इसका परिणाम यह हुआ है कि वे कई बार वेद को भूल जाने से इसे (वेदों )खो चुके हैं। 

( 12 परिच्छेद पेज 102 )

 हिन्दू विद्ववानों का मत

* अब वैदिक विद्वानों का भी मत जान लेते हैं जो सनातनी पंडितों की सुप्रसिद्ध पुस्तकों से प्रमाण दिए जाएंगे जिसमें से अधिकतर आर्य समाजी तो नहीं पर उनके समर्थक जरूर कह सकते हैं क्योंकि उन्होंने भी दयानंद सरस्वती की अपनी पुस्तकों में वर्णन किया है इसे पढ़कर बुद्धिमानी व्यक्ति यह निष्कर्ष निकाल सकता है , की आर्य समाजी और दयानंद सरस्वती का कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ समर्थन जरूर करते हैं ।

* जो हवाले दिए गए हैं व नवीन एवं प्राचीन दोनों की किताबें के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं जिसमें हम सर्वप्रथम ऋग्वेद पर बात करेंगे पर फिर यजुर्वेद पर फिर सामवेद फिर अथर्व वेदा पर आए देखते हैं ।

ऋग्वेद में मिलावट 

Book

वैदिक-साहित्य का इतिहास

डॉ. राममूर्ति शर्मा

एम. ए., पी. एच. डी., डी. लिट; शास्त्री

प्रोफेसर संस्कृत-विभाग
पजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़
नेशनल लेक्चरर (१९८४-८५)
राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित एवं पुरस्कृत


Authenticity of Vedas

* बालखिल्य सूक्त-ऋग्वेद के विन्यास-क्रम के सम्बन्ध में विवेचन करते समय बालखिल्य सूक्तों के स्थान का निर्णय भी महत्त्वपूर्ण है। ये सूक्त संख्या एकादश हैं । ये सूक्त यद्यपि अष्टम मण्डल के अन्त में जुड़े हुए मिलते हैं, तथापि उनका स्वतन्त्र अस्तित्व प्रतीत होता है । 

* प्राचीन ऋषियों ने उनकी प्रामाणिकता को स्वीकार नहीं किया और न संग्रहकर्ताओं ने उनकी गणना मण्डल और अनुवाकों के विभाजन में की। आचार्य सायण ने भी अपने ऋग्वेदभाष्य में इन सूक्तों का भाष्य नहीं किया, यद्यपि कात्यायन की सर्वानुक्रमणी में उनका उल्लेख है ।

*  स्पष्ट है कि बालखिल्य सूक्तों का सम्बन्ध ऋग्वेद अथवा उसके अष्टम मण्डल से नहीं है । अष्टक और मण्डल क्रम में बाधक होने से भी यही बात उचित प्रतीत होती है कि ऋग्वेद के संहिता रूप में आने के बाद उन्हें मनमाने रूप से अष्टम मण्डल के पश्चात् जोड़ दिया गया।

Book 

संस्कृत साहित्य का इतिहास

प्राशयन

डॉ. बहादुश्चन्द बाबड़ा

जॉइंट डाइरेक्टर जनरल, आर्कियोलॉजी, भारत सरकार

लेखक

ਕਰਿ ਹੈ

अध्यक्ष : पाण्डुलिपि-विभाग, हिन्दी संग्रहालय,

हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयोग

चौखम्बा विद्याभवन वाराणसी-१

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* महर्षि शौनक ने ऋग्वेद -संहिता मैं १०५८० मंत्र, १५३८२६ शब्द और १२००० अक्षर बताये हैं । इतिहासकारों एवं वेदश विद्वानों ने भावेद ये कुल मंत्र की संख्या १०१६० से लेकर १०५८९ तक विभिन्न संख्याओं में निर्धारित की है। अंतिम गणना स्वामी दयानंद सरस्वती की है। ये मंत्र 11 प्रकार के पदों में विरचित है । page Number86


Book

संस्कृत वाङ्मय का बृहद् इतिहास

प्रथम वेदखण्ड

(संहिता-ब्राह्मण-आरण्यक-उपनिषद् एवं वैदिक संस्कृति)

प्रधान सम्पादक:

पद्मभूषण आचार्य बलदेव उपाध्याय

सम्पादक:

प्रो. ब्रजबिहारी चौबे

उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान

लखनऊ

( अधयाय 5 पेज नंबर 149 - 150 )


Authenticity of Vedas


*  बालखिल्य सूक्तों की स्थिति- कि जिस इलाजीला आज हमें जो ऋग्वेद-संहिता उपलब्ध है उसमें ११ सूक्त ऐसे मिलते हैं जो बालखिल्य के नाम से विख्यात हैं। इन ११ सूक्तों में कुल ८० मन्त्र हैं और उनका स्थान अष्टम मण्डल के ४८वे सूक्त के बाद है। वस्तुतः अष्टम मण्डल में 9२ ही सूक्त हैं, किन्तु इन ११ बालखिल्य सूक्तों को मिलाकर इसकी कुल सूक्त-संख्या १०३ हो जाती है। 

* आधुनिक विद्वान् इनको परिशिष्ट कहकर बाद का जोड़ा हुआ मानते हैं, किन्तु इनकी प्राचीनता के विषय में सन्देह नहीं किया जा सकता। अनुवाकानुक्रमणी के अनुसार ये बालखिल्य सूक्त शाकल-संहिता में नहीं पाये जाते; इनकी सत्ता केवल बाष्कल संहिता में ही पाई जाती है। शाकल-संहिता में इनकी सत्ता न होने के कारण इनका पदपाठ नहीं मिलता है।

* सर्वानुक्रमणी में यद्यपि प्रतीक रूप में इन सूक्तों के आदिम पद का उल्लेख किया गया है, किन्तु अनुवाकानुक्रमणी में अष्टम मण्डल की सूक्तसंख्या में से ये निकाल दिये गये हैं। वहाँ अष्टम मण्डल में ९२ सूक्तों का ही उल्लेख है। ये सूक्त अनुवाकों तथा सूक्तों के विभाग के अन्तर्गत नहीं आते। सायणाचार्य का भाष्य भी इन सूक्तों पर नहीं मिलता।' अनुवाकानुक्रमणी का कथन कि ये बालखिल्य सूक्त शाकल-शाखा के नहीं, सही प्रतीत होता है। आज शाकल-शाखा की संहिता में भी अष्टममण्डल में ४५वें सूक्त के बाद इन्हें जो रख दिया गया है, वह गलत है। इनको वहाँ से निकाल देना चाहिये। बाष्कल-शाखा की संहिता का जब अलग से सम्पादन हो तो उसमें उनको जोड़ देना चाहिये।

* अब प्रश्न यह उठता है कि जब ये सूक्त मूल शाकल-शाखा की संहिता में नहीं थे तब उनको इसके अष्टम मण्डल में ही क्यों जोड़ दिया गया और किसी मण्डल के साथ इनको क्यों नहीं जोड़ दिया गया? इसका उत्तर यह है कि ये सूक्त काण्ववंशी ऋषियों द्वारा रचे गये हैं।

* अष्टम मण्डल पूर्णरूप से काण्ववंशी ऋषियों की ऋचाओं का ही संकलन है, इसलिये काण्ववंशी ऋषियों के रचे बालखिल्य सूक्तों को अष्टममण्डल में ही संकलित कर लिया गया।

Book

* वैदिक साहित्य एवं संस्कृति

(वैदिक साहित्य का इतिहास)
लेखक पद्मश्री डॉ० कपिलदेव द्विवेदी आचार्य


एम०ए० (संस्कृत, हिन्दी), एम०ओ०एल०, डी०फिल्० (प्रयाग),
पी०ई०एस० (अप्रा०), विद्याभास्कर, साहित्यरत्न, व्याकरणाचार्यनिदेशक विश्वभारती अनुसंधान परिषद्
ज्ञानपुर (भदोही) प्रणेता-अर्थविज्ञान और व्याकरणदर्शन, अथर्ववेद का सांस्कृतिक अध्ययन,
वेदों में विज्ञान, वेदों में आयुर्वेद, भक्ति कुसुमांजलिः, राष्ट्र-गीताञ्जली:, आत्मविज्ञानम्, संस्कृत निबन्ध-शतकम्, संस्कृत-व्याकरण, (सभी उ०प्र० शासन द्वारा पुरस्कृत) भाषा-विज्ञान एवं भाषा-शास्त्र, वैदिक साहित्य एवं संस्कृति, साधना और सिद्धि आदि। नपावर मनमानी
विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी


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*  ऋग्वेद की शाखाएं

महर्षि पतंजलि (१५०ई०पू०) ने महाभाष्य में ऋग्वेद की २१ शाखाओं का उल्लेख किया है । '

एकविंशतिधा बाहव॒च्यम्' (महा० आह्निक

 १) इनमें से केवल 5 शाखाओं का मुख्य रूप से उल्लेख मिलता है । शेष के नाम भी संदिग्ध हैं ।'

'चरणव्यूह' के अनुसार प्रमुख ५ शाखाएँ ये हैं - १. शाकल, २. बाष्कल, ३.

आश्वलायन, ४. शांखायन, ५. माण्डूकायन ।

१. शाकल : संप्रति ऋग्वेद की यही शाखा प्रचलित है। यही शाखा उपलब्ध है । इसी के अनुसार आगे वर्ण्य-विषय, मंत्रसंख्या आदि दिए गए हैं ।

२. बाष्कल : यह शाखा उपलब्ध नहीं है । शाकल शाखा में १०१७ सूक्त हैं,परन्तु बाष्कल शाखा में १०२५ सूक्त थे, अर्थात् ८ सूक्त अधिक थे । इन ८ सूक्तों को भी शाकल शाखा में समाविष्ट कर लिया गया है । एक 'संज्ञान सूक्त' को ऋग्वेद के अन्त में ले लिया है और शेष ७ सूक्तों को 'बालखिल्य सूक्तों में प्रथम ७ सूक्तों में स्थान दिया गया है।

३. आश्वलायन : यह संहिता और इसका ब्राह्मण सम्प्रति उपलब्ध नहीं है । इस शाखा के श्रौतसूत्र और गृह्यसूत्र ही उपलब्ध हैं।

४. शांखायन : यह शाखा उपलब्ध नहीं है । इसके ब्राह्मण, आरण्यक,श्रौत

और गृह्यसूत्र ही प्राप्य हैं।

५. माण्डूकायन : यह शाखा संप्रति अप्राप्य है । (अध्याय 2 पेज 46 )


Book


संस्कृत साहित्य का इतिहास
लेखक डॉ० उमाशङ्कर शर्मा ऋषि'
एम० ए०, डी० लिट्०, साहित्याचार्य,
प्रोफेसर तथा अध्यक्ष संस्कृत विभाग, पटना विश्वविद्यालय
फगाणी गरिकमा माली 'परिणीअकादमी
चौखम्भा भारती अकादमी आकर ग्रन्थों के प्रकाशक तथा वितरक पो० ऑ० बॉक्स नं० १०६५
'गोकुल भवन' के. ३७/१०९, गोपाल मन्दिर लेन.
वाराणसी-२२१००१(भारत)


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* सम्पूर्ण ऋग्वेद में दस मण्डल, एक सहस्र सत्रह (१०१७) सूक्त तथा शौनक की अनुक्रमणी (श्लोक४३) के अनुसार १०५८० मन्त्र हैं। अष्टम मण्डल में ४८वें सूक्त के बाद ग्यारह खिल सूक्त हैं जिनमें ८० मन्त्र हैं। सूक्तों की संख्या इसलिए १०२८ हो जाती है। गिनने पर वस्तुतः मन्त्रसंख्या १०५५२ ही होती है और अनुवाक ८५ हैं। ऋग्वेद के दस मण्डलों में सूक्त-संख्या क्रमशः इस प्रकार है।

१९१+४३+६२+५८+८७+७५+१०४+९२ (+११)+११४+१९१=१०१७ (+११)=१०२८ सूक्त। अष्टम

मण्डल में ११ सूक्त खिल या प्रक्षिप्त हैं। खिल सूक्तों को स्वाध्याय के समय पढ़ने का विधान है किन्तु न तो इनका पद-पाठ मिलता है न अक्षर-गणना में इनका समावेश है।


 यजुर्वेद में मिलावट

Book

वैदिक-साहित्य का इतिहास

डॉ. राममूर्ति शर्मा

एम. ए., पी. एच. डी., डी. लिट; शास्त्री

प्रोफेसर संस्कृत-विभाग
पजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़
नेशनल लेक्चरर (१९८४-८५)
राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित एवं पुरस्कृत


यजुर्वेद की सहिंता की रचना 

( अध्याय 2 पेज 57 )

इस आधार पर शुक्ल यजुर्वेद के कालक्रम की दृष्टि से निम्नलिखित

चार विभाग किये जा सकते हैं।

(१) १-१८ तक का मूल भाग ।

(२) आगे के ७ (२५ वें अध्याय तक) सर्वप्रथम जोड़े गए होंगे, क्योंकि

ये दोनों भाग सामान्य यज्ञीय कृत्यों से सम्बन्ध रखते हैं।

(३) कर्मकाण्ड का विस्तार एवं विकास अगले १४ अध्यायों की रचना का कारण बना होगा। विस्तार २६ से २६ तक के अध्यायों का (जिसमें प्राचीन यज्ञों का और सूक्ष्म विवरण है) और विकास ३० से ३६ अध्याय तक । (जिसमें कुछ नवीन यज्ञों की विवेचना है) का कारण बना होगा।

(४) अन्तिम भाग ४०वा अध्याय उस समय का जोड़ा हुआ है, जिस समय' कर्मकाण्ड से हटकर ज्ञानकाण्ड की ओर प्रवृत्ति बढ़ रही थी।

Book

संस्कृत वाङ्मय का बृहद् इतिहास

प्रथम वेदखण्ड

(संहिता-ब्राह्मण-आरण्यक-उपनिषद् एवं वैदिक संस्कृति)

प्रधान सम्पादक:

पद्मभूषण आचार्य बलदेव उपाध्याय

सम्पादक:

प्रो. ब्रजबिहारी चौबे

उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान

लखनऊ

( अधयाय 8पेज न 227 )

* शुक्लयजुर्वेद में जो ब्राह्मणभाग मिला हुआ है वह पाठमात्र से तो क्या गहरी अन्वेषणा से भी प्रतीत नहीं होता। कृष्णयजुर्वेद में यज्ञकर्म की सुविधा के अभिप्राय से प्रत्येक प्रकरण के अन्त में मिलाया गया है तथा वह ब्राह्मण नाम से लिख दिया गया है, किन्तु शुक्लयजुर्वेद में अयातयाम बनाने के अभिप्राय से मन्त्रों के मध्य में मिलाया तथा मन्त्र सा बना दिया गया है; यह ब्राह्मण है ऐसा लिखा नहीं। कात्यायनमुनिकृत सर्वानुक्रमणी से भी यह पता लगता है कि शुक्लयजुर्वेद में भी ब्राह्मणभाग मिला हुआ है।

* कृष्णयजुर्वेद तथा शुक्लयजुर्वेद नामों के पीछे चाहे जो भी कारण रहा हो हमें इस विवेचन से मात्र यही अभिमत है कि मूलयजुर्वेद-संहिता इन दोनों से भिन्न थी। आज वह उपलब्ध नहीं। यजुर्वेद की सम्पूर्ण शाखा-संहिताओं का वही आधार थी । असल यजुर्वेद आज उपलब्ध नही है वैदिक मतवालो ।

( अधयाय 8पेज न 227 )

  * आगे लिखते है ।

अधयाय 10 पेज नंबर 262  से  266

माध्यन्दिनसंहिता का स्वरूप-

*उपलब्ध-माध्यन्दिन- संहिता में कुल ४० अध्याय हैं। इस संहिता के आरम्भिक पचीसअध्यायों को मूल तथा अन्त के पन्द्रह अध्यायों को खिल माना गया है। आचार्य उवट तथा महीथर का कथन है कि आरम्भ के पचीस अध्याय तक दर्शपूर्णमास, पितृयज्ञ,अग्निहोत्र, उपस्थान, अग्निष्टोम, वाजपेय, राजसूय, सौत्रामणी तथा अश्वमेध से सम्बद्ध मन्त्र हैं, तथा अन्तिम १५ अध्याय इस वेद का खिल भाग (परिशिष्ट) है ।

अध्याय २६-४० को भाष्यकारों की परम्परा खिल मानती है। अध्याय 26-29 का खिलत्व न केवल खिल कहने से अपितु मन्त्रों की सामान्य प्रकृति से भी सिद्ध होता है। इन अध्यायों में वे मन्त्र संगृहीत हैं, जिनका विनियोग पूर्ववर्णित मुख्य यागों में नहीं हुआ था।

* यदि ये मन्त्र पूर्व के होते तो मुख्य यागों के मन्त्रों को उद्धृत करते समय इनको भी उद्धृत कर दिया गया होता, अर्थात् इनका भी विनियोग वहीं पर हो गया होता। जैसे, दर्शपूर्णमासेष्टि-विषयक मन्त्र प्रथम दो अध्यायों में क्रमपूर्वक उद्धृत है; किन्तु २६वें अध्याय में भी दर्शपूर्णमासेष्टि के मन्त्र हैं। 

* ऐसा प्रतीत होता है कि दर्शपूर्णमासेष्टि के जितने मन्त्र पहले विनियुक्त होते थे, वे सब प्रथम दो अध्यायों में.संगृहीत कर दिये गये। किन्तु बाद में भी कुछ मन्त्र किसी कारण नई रचना या पूर्व अज्ञात मन्त्र की प्राप्ति या शाखान्तर मन्त्र के समावेश से मा.सं. में समाविष्ट हो गये। २६वें अध्याय में पूर्वनिर्दिष्ट अनुष्ठानों से सम्बन्धित मन्त्र हैं; २७वें में पञ्चचितीक-अग्निसम्बन्धी मन्त्र हैं; २८वें में सौत्रामणी के अङ्गभूत पशुप्रयाज, अनुयाज प्रैषमन्त्र हैं; २६ में अश्वमेध सम्बन्धी शेष मन्त्र हैं। यागविषयक अवशिष्ट मन्त्रों का संकलन होने के कारण इन अध्यायों का खिलत्व या परिशिष्टत्व स्पष्ट है।

इसमें भी यजुष तथा ऋच दोनों प्रकार के मन्त्र हैं। वासिष्ठी शिक्षा के अनुसार इसमें १४६७ ऋचायें तथा २८२३ अथवा २८१८ यजुष् मन्त्र हैं। 

* चरणव्यूह के अनुसार या. सं. में १९०० अक् मन्त्र तथा ८८२० यजुष् मन्त्र हैं।' चरणव्यूह के भाष्यकार महिदास इसी श्लोक के व्याख्यान में वा.सं. में ऋक्-मन्त्रों की संख्या १९२५ मानते हैं। पुराणों के अनुसार इस संहिता में कुल मन्त्रसंख्या ८८८० तथा एक पाद है, जिसमें १६०० ऋचायें हैं और ६६८० यजुष् मन्त्र हैं। प्रतिज्ञापरिशिष्ट के अनुसार ऋचाओं, खिल तथा शुक्रिय अध्याय सहित यजुष् मन्त्रों की कुल संख्या ८८०० है।


 अथर्ववेद में मिलावट 

Book

वैदिक-साहित्य का इतिहास

डॉ. राममूर्ति शर्मा

एम. ए., पी. एच. डी., डी. लिट; शास्त्री

प्रोफेसर संस्कृत-विभाग
पजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़
नेशनल लेक्चरर (१९८४-८५)
राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित एवं पुरस्कृत


* अधयाय  4 पेज नंबर 82


* कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि १ से ७ तक काण्डों वाले प्रथम भाग में भिन्न-भिन्न विषय वाले दीर्घ सूक्त संगृहीत हैं और १३व से १८वे काण्ड तक के तृतीय भाग में सब ऐसे ही सूक्त संगृहीत हैं जिनमें प्रत्येक एक पृथक विषय से सम्बद्ध है। इस प्रकार १४३ काण्ड में केवल विवाह से सम्बन्धित सूक्त हैं और १८व काण्ड में केवल अन्त्येष्टिविषयक सूक्त । १९वें काण्ड में भैषज, राष्ट्रसमृद्धि एवं अध्यात्म आदि से सम्बन्धित विविविषयक मुक्त हैं ।

* २० काण्ड के अन्तर्गत ऋग्वेद संहिता ही के सोमविषयक सूक्तों को संगृहीत कर दिया है । कुन्तापसूक्त अवश्य नवीन रचना है।


 Book

संस्कृत वाङ्मय का बृहद् इतिहास

प्रथम वेदखण्ड

(संहिता-ब्राह्मण-आरण्यक-उपनिषद् एवं वैदिक संस्कृति)

प्रधान सम्पादक:

पद्मभूषण आचार्य बलदेव उपाध्याय

सम्पादक:

प्रो. ब्रजबिहारी चौबे

उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान

लखनऊ

 (अधयाय 12 : 369-71)

* कुन्तापसूक्त- अ.वे. के २०वें काण्ड के दस सूक्तों (१२७-१३६) का एक समुदाय
कुन्ताप' के नाम से प्रसिद्ध है। इन सूक्तों को खिल माना जाता है। हस्तलेखों में प्रारम्भ करते समय 'अथ कुन्तापसूक्तानि' तथा इनकी समाप्ति पर इतिकुन्तापसूक्तान' ऐसा उल्लेख मिलता है। कुन्तापसूक्त की सीमा कितनी है निश्चित नहीं। आचार्य सायण ने
२०.१२७-१२८ के ३० मन्त्रों को ही कुन्तापसूक्त माना है, किन्तु सम्पूर्ण को वे खिल ही मानते हैं।

Book

* वैदिक साहित्य एवं संस्कृति

(वैदिक साहित्य का इतिहास)
लेखक पद्मश्री डॉ० कपिलदेव द्विवेदी आचार्य


एम०ए० (संस्कृत, हिन्दी), एम०ओ०एल०, डी०फिल्० (प्रयाग),
पी०ई०एस० (अप्रा०), विद्याभास्कर, साहित्यरत्न, व्याकरणाचार्यनिदेशक विश्वभारती अनुसंधान परिषद्
ज्ञानपुर (भदोही) प्रणेता-अर्थविज्ञान और व्याकरणदर्शन, 

अथर्ववेद का सांस्कृतिक अध्ययन,
वेदों में विज्ञान, वेदों में आयुर्वेद, भक्ति कुसुमांजलिः, राष्ट्र-गीताञ्जली:, आत्मविज्ञानम्, संस्कृत निबन्ध-शतकम्, संस्कृत-व्याकरण, (सभी उ०प्र० शासन द्वारा पुरस्कृत) भाषा-विज्ञान एवं भाषा-शास्त्र, वैदिक साहित्य एवं संस्कृति, साधना और सिद्धि आदि। नपावर मनमानी
विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी

 ( अधयाय 2 पेज नंबर 100 )

* कांड १९ और २० । ये दोनों कांड प्रक्षिप्त ज्ञात होते हैं । पंचपटलिका और शौनकीय चतुरध्यायिका में अथर्ववेद के केवल १८ कांडों का ही उल्लेख है।कौशिक गृह्यसूत्र और वैतान श्रौतसूत्र में भी केवल १८ कांडों के ही मंत्र 'प्रतीक' के रूप में उद्धृत हैं।

प्रो० मैकडानल का अभिमत : प्रो० मैकडानल ने अथर्ववेद के विषय में ये विचार व्यक्त किए हैं ।१ : १. मूल अथर्ववेद में केवल १३ कांड थे । यह रचनाशैली एवं विषय-विवेचन की दृष्टि से कहा जा सकता है । (२) कांड- १३ के बाद विषयों में एकरूपता एवं क्रमबद्धता है, जो १३ कांडों में अप्राप्य है। जैसे - कांड १४ में विवाह संस्कार, कांड १५ में व्रात्य-वर्णन, कांड १६-१७ में संमोहन मंत्र, कांड १८ में अन्त्येष्टि ।

* कांड १५-१६ ब्राह्मणों के तुल्य गद्य-शैली में हैं । कांड १६ एवं १७ बहुत छोटे हैं।  कांड १९ और २० बाद में जोड़े गए हैं । कांड १९ में कुछ अंश परिशिष्ट के तुल्य हैं और कुछ अंशों में पाठ भ्रष्ट हैं । कांड २० के प्राय: सभी सूक्त इन्द्र-स्तुति-परक हैं और ऋग्वेद से संगृहीत हैं । अथर्ववेद की परम्परा के विरुद्ध अन्तिम अध्यायों में सोमयाग वर्णित है । यह अथर्ववेद को चतुर्थ वेद का स्थान दिलाने का प्रयत्न है ।

Book

संस्कृत साहित्य का इतिहास
लेखक डॉ० उमाशङ्कर शर्मा ऋषि'
एम० ए०, डी० लिट्०, साहित्याचार्य,
प्रोफेसर तथा अध्यक्ष संस्कृत विभाग, पटना विश्वविद्यालय
फगाणी गरिकमा माली 'परिणीअकादमी
चौखम्भा भारती अकादमी आकर ग्रन्थों के प्रकाशक तथा वितरक पो० ऑ० बॉक्स नं० १०६५
'गोकुल भवन' के. ३७/१०९, गोपाल मन्दिर लेन.
वाराणसी-२२१००१(भारत)

 ( अधयाय 2 पेज नंबर 57 )

 * इसके अन्त में १० सूक्त 'कुन्ताप-सूक्त
के नाम से प्रसिद्ध हैं (२०/१२७-३६); जिनमें देवता, ऋषि, छन्द या विनियोग किसी का निर्देश नहीं है, इनका पद-पाठ भी नहीं है। ये खिल-सूक्त हैं।

Note : -  पाठकों को ध्यान देने की आवश्यकता है कि जिस सूक्त में ऋषि का अता पता ही नहीं है उसमें मिलावट होने में कोई शक हो सकता है भला ?

* तो मित्रों यह सब झोलझाल है वेदों  में ! हिंदू मत का कोई ऐसा बड़ा विद्वान पंडित नहीं गुजरा जिसने वेदों में मिलावट को स्वीकार न किया हो परंतु आजकल के मूर्ख वेदों में मिलावट नहीं इसका बीन बजाते रहते हैं क्या मिथ्या है !

* अगर वेदों में एक मंत्र की भी कमी पेशी हो तो हमारा दावा सिद्ध हो जावेगा परंतु मैंने आपके सामने ऐसे प्रमाण प्रस्तुत किए हैं अंधा बहरा गूंगा वेदों में क्या मिलावट ना मानेगा भला अंधा बहरा गूंगा भी इसको वेदों में मिलावट मानेगा ही मानेगा चंद किताबों के हवाले दिए जैसे हमने पहले ही बता दिया था इस विषय पर चर्चा करने बैठो तो अलग से एक किताब बन जाए मुझे आशा है मैंने जितना बताया विद्वान जनों के लिए काफी होगा आपका मित्र  !


Idris Rizvi ✍️✍️
( Alhamdulillah )













































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