Who is Allah ?

अल्लाह कौन है ?


Allah kon hai ?


अल्लाह शब्द का अर्थ !



بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم

اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔ اما بعد


بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم


إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ أَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا 33:56

اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ 

كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ

.إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ

اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ، وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ

كَمَا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ

.إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ


 सबसे पहला प्रश्न यह उठता है ,कि अल्लाह है कौन ? नॉन मुस्लिमों में इसकी बड़ी हड़धर्मी मची हुई है इस तरीके से कहते नजर आते हैं कि यह मुसलमानों का खुदा है पर वह तनिक भर सोच , विचार करते तो कभी इस तरीके की मूर्खता भरी बात ना करते सबसे पहले इस बात का विश्लेषण करते हैं कि अल्लाह शब्द कहां से इज्ज़ाद हुआ अल्लाह यह अरबी का शब्द है बल्कि अल्लाह शब्द का अर्थ होता है हिंदी संस्कृत में ईश्वर अल्लाह अर्थात ईश्वर होता है । 


Allah kon hai ?


यहां यह बातें स्पष्ट हो गई कि ईश्वर अर्थात अल्लाह अल्लाह अर्थात ईश्वर एक छोटा सा पानी का ही उदाहरण ले लीजिए कि पानी को इंग्लिश में वाटर कहते हैं अरबी में शरबत कहते हैं हिंदी में पानी कहते हैं परंतु भाषा परिवर्तन होने से वह चीज बदल नहीं जाती उसी तरीके से अल्लाह शब्द है यह अरबी शब्द है अगर हम इसको हिंदी में या संस्कृत में कहेंगे तो ईश्वर और यहां भी एक हद धर्मी पर उतर आते हैं कहते हैं कि क़ुरआन नाजिल होने से पहले अल्लाह शब्द कोई दिखला दीजिए !

अल्लाह शब्द ना क़ुरआन आने के बाद नाही नबी ए पाक  सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के आने के बाद ही कोई नया शब्द आया है बल्कि नबी ए पाक सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम के पिता जी का नाम ही अब्दुल्ला था अर्थात अल्लाह का बंदा और आज भी ईसाई , यहूदी अरब में रहने वाले ईश्वर को पुकार ने के लिए अल्लाह ही शब्द का इस्तेमाल करते हैं जैसा कि क़ुरआन ए मजीद में आता है सूरत 112 सुरह इख्लास आयत नंबर 1 में ऐ नबी फरमा दीजिए अल्लाह एक है अगर खुदा एक के अलावा और होते तो खुदा क्यों कहता कि अल्लाह एक है यानी कह रहे हैं कि एक ईश्वर के अतिरिक्त दूसरा ईश्वर नहीं केवल एक ही अल्लाह है जो कि पूजनीय है ।

* अर्थात : - (ऐ रसूल) तुम (उनसे) कह दो कि (तुम को एख़तियार है) ख्वाह उसे अल्लाह (कहकर) पुकारो या रहमान कह कर पुकारो (ग़रज़) जिस नाम को भी पुकारो उसके तो सब नाम अच्छे (से अच्छे) हैं और (ऐ रसूल) न तो अपनी नमाज़ बहुत ऊँचा  कर पढ़ो न और न बिल्कुल धीरे  से बल्कि उसके दरमियान एक औसत तरीका एख्तेयार कर लो । ( 17 :110 )

* सब अच्छे नाम उसी के है ।

  • अल्लाह
  •  अल रहमान
  • अल रहीम
  • अल करीम
  • अल मालिक 
  • अल कुदुस
  • अल राजिक
  • अल गफूर
  • अल बारीक
  • इत्यादि
  • ईश्वर
  • पालनहार
  • रब


और जो जिस भाषा मे  बोलता है सब अच्छे नाम उसी के है ।

सभी धर्म ग्रंथो में एक अल्लाह जिक्र


विश्व में ऐसा कोई मजहब नहीं है जिसमें एक पालनहार का जिक्र न मिलता हो हिंदुइज्म हो सिखईस्म हो ईसाइयत , यहूदीयत या जो भी मजहब हो अलबत्ता खुद को नास्तिक कहने वाले अर्थात  मुल्हिदीन लोग भी यह बात तो स्वीकार करते हैं कि एक पावर तो है भले वो उसको प्रकृति या किसी का भी नाम ले पर एक तो कहते हैं कि एक पावर तो है ही ।

 परंतु यहां पर एक प्रश्न यह उठता है ? कि सिर्फ एक ईश्वर का जिक्र होने से एक अल्लाह का जिक्र होने से क्या उसे मान लिया जाए अर्थात ईसाई धर्म में एक ईश्वर का क्या तसव्वर है इन विषम में और जितने भी दिन है उसमें एक ईश्वर का तसव्वर और क्या है उसका विश्लेषण करना अति आवश्यक है ।

क़ुरआन ही क्यों ?


पालनहार के गुण अर्थात सिफत का विश्लेषण करते हैं , कि उसके बारे में एक भक्त को किस तरीके से विश्वास रखना चाहिए जब हिंदू धर्म का विश्लेषण करते ऐसे अनोखे बातें हैं परंतु एक ही उदाहरण लेते हैं उसका  अथर्ववेद कांड नंबर 4 सूक्त 1 मंत्रा नंबर 6 जिसमें कहां जा रहा है कि वह ईश्वर सोता हुआ सा था फिर उसने समस्त जगत रचने के लिए उठते सब रच दिया इसी तरीके से मनुस्मृति में भी आता है ।

Allah kon hai ?


उसी तरीके से ईसाइयों की बाइबिल का भी विश्लेषण करेंगे तो 2 उत्पत्ति विषय में ही आता है कि उसने फला फला दिन में वह वह रचा और उसके बाद फिर उसने विश्राम किया क्या एक पालनहार को मानने वाला उसके बारे में ऐसा विश्वास रख सकता है कि वह सोए विश्राम करें भले वह विश्राम करे सोए थकावट आवे तो ऐसे को पालनहार मन्ना व्यर्थ है क्योंकि वह एक मनुष्य या इत्यादि जिस्मानी ताकत रखने वालों ही हो सकता है जिसको थकावट या नींद आए पर पालनहार के बारे में कैसा विश्वास रखना चाहिए  ?


Allah kon hai ?


आए उसके बारे में पवित्र कुरान क्या कहता है  ? वह देखते हैं क़ुरआन ए मजीद कहता है सूरतुल बकरा आयत नंबर 255 ना तेरे रब को उग आती है ना नींद यानी कोई उसको थकावट नहीं होती ना ही नींद आती है तो यह होती है पालनहार की सच्ची सिफात अर्थात गुण यह तो कोई शक नहीं कि तमाम मजाहिब में उसका जिक्र है पर उसको मानने का तरीका सिर्फ क़ुरआन ने बताया है किस तरीके से उसकी पूजा करें किस तरीके से उसके बारे में एक मनुष्य को विश्वास रखना चाहिए !


Allah kon hai ?


पालनहार की जात के बारे में और उसकी सिफात 
( गुणों )के बारे में कोई पूर्ण तरह नहीं जानता ना ही कोई दावा कर सकता है कि किसी ने उसको पूर्ण पहचान लिया हां परंतु पवित्र कुरान और नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो बताया है उसके चलते हुए कुछ - कुछ बयान करने की कोशिश करूंगा 
In Sha Allah ऐ मेरा सौभाग्य है कि उनकी बताई हुई कुरान की शिक्षाएं और नबी की बताए शिक्षिओ में से मैंने एक परसेंट भी बता दिया तो मैं अपने लिए उसको बहुत सौभाग्य और अपने निजात का जरिया समझता हूं और इस लेख में हम यह भी विश्लेषण करेंगे कि गैर मुस्लिमों के जितने भी क्वेश्चन ( ? )आते हैं अल्लाह के मुतालिक उसका भी हम एक -एक स्पष्टीकरण देने की कोशिश करेंगे कि उसको मुंह नहीं है तो वह बोलता कैसा है ? उसको  कान नहीं है तो वह सुनता कैसा है  वगैरह वगैरह उस बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा भी करेंगे इंशा अल्लाह ताअला ।


Allah kon hai ?


पवित्र क़ुरआन के सूरह नम्बर 112 में आता है , तेरा पालने वाला कैसा है ।

112:1 कहो: "वह अल्लाह यकता है,

112:2 अल्लाह निरपेक्ष (और सर्वाधार) है,

112:3 न वह जनिता है और न जन्य,

112:4 और न कोई उसका समकक्ष है  ।


Allah kon hai ?

अल्लाह ( ईश्वर ) की जात और उनकी सिफत अर्थात गुण के बारे में अकीदा अर्थात मान्यता


अल्लाह एक है अर्थात ईश्वर एक है उसका कोई साझेदारी नहीं ना जात में ना सिफत में ना कामों में ना हुक्म देने में ना नामों में है जो हर हाल में मौजूद रहना जरूरी है यह इसका अदम मुहाल है यानी किसी जमाने में उसकी जात मौजूद ना हो ऐसा मुमकिन नहीं उसकी जात कदीम ( अनादि ) अजली ( सक्षम ) और अबदी ( अमर ) यानी हमेशा से है उसे कभी मौत ना आएगी एक अल्लाह की जात वह है ,की सिवाय उसके कोई बंदगी नहीं और वह केवल अकेला ही उपासना के लायक है ।

मान्यता नंबर 1 

अल्लाह बेनियाज़ ( सर्वशक्तिमान ) है वह किसी का मोहताज नहीं सारी दुनिया और मखलूक उसी की मोहताज है ।

मान्यता नंबर 2

अल्लाह की जात  को  अपनी अकल से समझना मुमकिन नहीं क्योंकि जो चीज अक्ल के जरिए समझ आती है अक्ल उसको अपने में घेर लेती है और उस अल्लाह की शान यह नहीं कि कोई चीज उसको घेरे अलबत्ता यह मुमकिन है कि अल्लाह के कामों के जरिए से उसके मुख्तसर अर्थात संक्षिप्त तौर पर उसकी सिफत अर्थात गुण और फिर उन शब्दों के जरिए अल्लाह पाक की जात पहचानी जा सकती है ।

मान्यता नंबर 3

अल्लाह की सिफत अर्थात गुण ना तो उसकी जात है ना ही उसके जात से अलग हो सके क्योंकि वह सब गुण ऐसे है जो की अल्लाह की जात को चाहती और उसकी जात के लिए जरूरी है ।

 नोट : -  इसी सिलसिले में दूसरी बात यह ध्यान रखने की है कि अल्लाह की गुण भी अलग अलग है और उसका मतलब भी अगल है । 

उदहारण ० अल -राजिक = खिलाने वाला 
अल -हय्यूल कय्यूम = हमेशा से जिंदा और दूसरों को जिंदा  रखने वाला ( न उसे मौत आये न ऊघ , और हमेशा से कायम ) सुर्ष्टि रचेता , हर चीजो का चलाने वाला इत्यादि उस के गुण है ।


* सिफत उसकी जात नहीं हो सकती और सिफत गेरे जात इसलिए नहीं है कि  गैर जात मानने की सूरते में दो बातें हो सकती है ।

 1 ) या तो उसकी गुण कदीम होगी अर्थात अनादि यानी हमेशा से ।

2 )  हादीस जो उसके पैदा करने से पैदा हुई
 ( मखलूक ) अगर कदीम मानते हैं तो कई एक कदीम को मानना पड़ेगा जबकि कदीम सिर्फ एक ही है ।

* अगर हादीस यानी मखलूक तस्लीम करते हैं तो यह मानना भी जरूरी होगा कि वह कदीम जात सिफतो के हादीस  होने या पैदा होने से पहले बगैर सिफत के थी  अल्लाह माफ करें और दोनों बातें बातिल है अर्थात गलत है।


मान्यता नंबर 4

जिस तरह अल्लाह की जात कदीम अर्थात अनादि   अजली अर्थात सक्षम तथा अबदी यानी अमर है उसी तरह उसकी गूण कदीम अजली और अबदी है  ।

मान्यता नंबर 5

 अल्लाह की जात और उसकी सिफते के अलावा सब चीजें मखलूक यानी पहले नहीं थी अब मौजूद है ।

मान्यता नंबर 6 

अल्लाह की कोई सिफत  ( गुण )मखलूक नहीं जेरे कुदरत दाखिल अर्थात नित्य है ।

 मान्यता नंबर 7 

जो अल्लाह के गुण को मखलूक कहे वह गुमराह और बद्दीन हैं  । 

मान्यता नंबर  8 

 जो आलम में  किसी चीज को खुद से मौजूद माने या उसके मखलूक होने में शक करे वह इंकार करने वाला है अर्थात काफिर है ।

मान्यता नंबर 9

 अल्लाह ना किसी का बाप है ना किसी का बेटा है और ना ही उसकी कोई बीवी अगर कोई अल्लाह के लिए बाप-बेटा बीवी बताएं वह वह काफिर अर्थात इनकार करने वाला बद्दी गुमराह है ।

 मान्यता नंबर 10 

अल्लाह  हमेशा से जिंदा है और उसे कभी मौत नहीं और वह हर जान को पालने वाला है अर्थात हर जान  उसके दस्ते कुदरत में है अर्थात कब्जे में है जब किसी की मौत का वक्त आजा ता तो वह उसे मौत दे देता है ।जब तक उसकी जिंदगी है जब तक वह जिंदा रखें  !

मान्यता नंबर 11

अल्लाह का हर चीज पर उसका जोर है इसके लिए कोई मुमकिन चीज उसकी कुदरत से बाहर नही जो चीज मुहाल हो अर्थात मौजूद ना हो सके उससे अल्लाह पाक है कि उसकी कुदरत उसे शामिल हो क्योंकि मुहाल उसे कहते हैं जो मौजूद ना हो सके और जब उस पर कुदरत होगी तो मौजूद हो सकेगा और जब मौजूद हो सकेगा तो फिर  मुहाल कैसे हो सकेगा अर्थात मौजूद ना हो सकेगा ।

 इसे तरह से समझे कि दूसरा खुदा मुहाल है यानी दूसरा खुदा नहीं हो सकता अगर दूसरा खुदा होना कुदरत के अधीन हो तो मौजूद हो सकेगा और जब मौजूद हो सकेगा तो मुहाल नहीं रहा और दूसरे खुदा मुहाल ना मानना अल्लाह का एक होने का इंकार है ।

 यूं ही अल्लाह का फना हो जाना मुहाल है यानी अल्लाह का मर जाना मुहाली आने नामुमकिन है अगर अल्लाह का फना होना होने का कुदरत में दाखिल माना जाए तो अल्लाह के अल्लाह होने से इंकार करना है एक बात यहां समझने की है कि हर वह चीज जो अल्लाह के कुदरत में मातहत हो वह मौजूद हो , ही जाए यह कोई जरूरी नहीं जैसे कि यह मुमकिन है कि सोना चांदी की जमीन हो जाए लेकिन ऐसा नहीं लेकिन ऐसा हो जाना हर हाल में मुमकिन रहेगा चाहे ऐसा कभी ना हो ।

 नोट : - अब यहां एक प्रश्न उठता है की अल्लाह हर चीज कर सकता है तो क्या वह दूसरा अल्लाह भी पैदा कर सकता है यह सवाल सिरे से ही गलत है जैसा कि मैं ऊपर विस्तारपूर्वक बता चुका हूं  ।

परंतु में आपकी शंका का समाधान करने की कोशिश करता हूं जो कि इस तरीके से हैं हमने ऊपर उसके गुणों की चर्चा की उसकी जात के बारे में क्या मान्यता रखनी चाहिए मुझे आशा है कि आप ने उसे ध्यान से पढ़ा समझा होगा उसमें एक बात गौर करने की है कि वह ( अल्लाह ) अजन्मा ( जन्म रहित ) है अर्थात कभी जन्म नही लिया और जो जन्म ना ले वह खालिक है अर्थात जिसने सबको पैदा किया और उसको किसी ने नहीं जन्म दिया अर्थात किसी ने पैदा नहीं किया जो पैदा हो जाए वह हादिस है अर्थात मखलूक अगर एक अल्लाह दूसरे अल्लाह को पैदा भी कर देता है तो वह खालीक नहीं बल्कि मखलूक ही होगी मखलूक हो गई तो उसमें यह गुण नहीं आ सकते  गुण नहीं आएंगे उसके मखलूक होने पर तो वह खुदा भी नहीं हो सकता तो इसका पूरा निचोड़ यह है कि एक खुदा दूसरे खुदा को पैदा भी कर दे तो भी वह खुदा कहलाने लायक ना होगा ।

मान्यता नंबर 12

 अल्लाह हर कमाल और खूबी के जामेअ हैं यानी सारी खूबी उसमें है अल्लाह हर वह चीज से पाक है जिसमें कोई ऐब , बुराई या कमी हो यानी उसमें ऐब या नुकसान होना मुहाल है अर्थात मुमकिन ही नहीं और जिस में कोई कमाल हो ना नुकसान हो उसी के लिए मुहाल है ।

उदाहरण ० के तौर पर समझते हैं झूठ ,बोलना , दगा देना , खयानत करना ,जुल्म करना , जीहालात ,बेहयाई वगैरह अल्लाह के लिए मुहाल है याने नामुमकिन है और यह कहना कि झूठ पर कुदरत इस माने कि वह झूठ बोल सकता है और कोई यह कहे कि झूठ बोलना आदि बुराई मुमकिन है तो वह खुदा की एबी , बताना है यह कहा जा सकता है कि खुदा का इनकार करना है और यह समझ कि यदि वह मुहाल यानी पैदा करता कुदरत  कदीर ना होगा उसकी कुदरत नासिक रहे जाएगी अर्थात अधूरी तो यह बिल्कुल बातिल ,जुटा, यानी बेअसल ,बेकार की बात उसमें कुदरत का क्या नुकसान है कमी तो उस मखलूक में है जो कुदरत के ताल्लुक में उसमें इसमें यह खूबी पाई ना जाए ।

मान्यता नंबर 13 

अब यहां यह भी प्रश्न उठता है ? कि हयात ,कुदरत ,सुनना ,देखना ,कलाम ,इल्म और इरादा उसकी जात के गुण है मगर आंख , कान , जुबान से उसका सुनना देखना कलाम करना नहीं क्योंकि यह सब जिसम के काम है और वहां जिसम से पाक है अल्लाह हर धीमी से धीमी आवाज को सुनता है ऐसी बारिक चीजों को देखता है जो एक उच्च कोटि की दूरबीन भी ना देख सके कि उसका देखना सुनना इन्हीं चीजों पर निर्भर नहीं बल्कि वह मौजूद को देखता है और सुनता है ।

मान्यता नंबर 14 

अल्लाह की दूसरी सिफतो अर्थात गुण की तरह उसका कलाम भी कदीम अर्थात अनादि है उसका कलाम कुरान है कुरान शरीफ को मखलूक (पैदा  करता )माने  तो बुजुर्गों और दूसरे इमामो और सहाबा रजिअल्लाहु अनहु के कॉल के अनुसार काफिर है अर्थात हर चीज का इनकार करने वाला ।

मान्यता नंबर 15 

अल्लाह का कलाम आवाज से पाक है और कुरान शरीफ जिसकी हम अपनी जुबान से तिलावत करते हैं और किताबों और कागजों में लिखते दिखाते हैं उसका बिना आवाज का कदीम  कलाम है और हमारा पढ़ना लिखना हमारी आवाज हादिस यानी पैदा करता जो हमने सुना वह कभी जो हमने पढ़ा हमारी आवाज से वो हमारी पैदा करता है जो हमने पढ़ने के बाद सुना वह कदीम है अर्थात अनादि हमारा याद करना हदीस हमने जो याद किया वह कदीम है यू समझे कि किसी ने रोशनी पैदा की और किसी ने रोशनी दीया 

उदाहरण ०  यह ले लीजिए कि हमने आग जलाई यह हमारा कमाल नहीं हमने आग पैदा की उसके पहले भी आग मौजूद थी हमने सिर्फ आग को जलाया अपने उपयोग के लिए ना कि उसको हमने बनाया उसी तरीके से जब कुरान पढ़ते हैं तो हम उसको हादीस करते हैं और जो हम पढ़ कर सुनते हैं वह कदीम होता है ।

मान्यता नंबर 16 

अल्लाह का  इल्म , जुज्यात , कुल्लियात ,मौजुदांत , मादुमत  , मुमकिनात और मुहालात को मुहित घेरे हुई है ,यानी सबको अज़ल से जानता और अब भी जानता है और अबद तक जानेगा हमेशा जानेगा चीज बदल जाया करती है लेकिन अल्लाह का इल्म नहीं बदला करता क्योंकि उसका इलमा अनादि है अर्थात नित्य हमेशा से उसके इल्म में पहले जैसा था अभी वैसा है आगे भी वैसा रहेगा वर्तमान रहे वह फ्यूचर पास्ट प्रेजेंट हमेशा उसके लिए वर्तमान रहता है क्योंकि वह समय टाइम हर चीज से बाहर है और पाक है वह दिलों की बातों और वसवसों को जानता है यहां तक कि उसके इल्म की कोई थाह नहीं अर्थात लिमिट नहीं अनलिमिटेड ।

मान्यता नंबर 17 

वह हर खुली और ढकी चीजों को जानता है और उसका इल्म जाती है और जाती इल्म उसके लिए खास है और कोई ढकी छिपी जाहिर चीजों को जाती इल्म अल्लाह के सिवा किसी दूसरे के लिए साबित करें वह काफिर है अर्थात इंकार करने वाला क्योंकि किसी दूसरे के लिए जाती इल्म आने का मतलब है बगैर खुदा के लिए खुद हासिल होना और स्वाभाविक ज्ञान कभी नहीं हो सकता जिसका ।

उदाहरण ०  इस तरीके से ले लीजिए जब तक किसी बच्चे को उस्ताद ना पढ़ाए तो कोई बच्चा खुद से जान नहीं सकता उसी तरीके से अल्लाह ने हर इल्म अपने रहमत से लोगों को नबियों के जरिए बताया उसके बाद ही लोगों ने इल्म जाना और आगे जानेंगे ।


मान्यता नंबर 18 

अल्लाह ही हर तरह की जातो अर्थात इंसान ,जिन्न , फरिश्ते , हैवानात , पशु , पक्षी आदि आदि को और कामों को पैदा करने वाला है हकीकत में रोजी पहुंचाने वाला सिर्फ अल्लाह ही है पर किसी बंदे किसी फरिश्ते आदि के जरिए रोजी पहुंचाता है अगर कोई यह मानें कि मैं सोउ रोजी बिना मेहनत उसको मिले तो उसके इल्म का क्या कहना ?

मान्यता नंबर 19

 अल्लाह ने हर भलाई और बुराई अपने असली इल्म के माफिक मुकद्दर कर दिया यानी जैसा होना था वैसा ही करने वाला था उसके अपने इल्म से जाना और वही लिख लिया ।

 नोट :-  इसका मतलब हरगिज़ यह नहीं जैसा उसने लिख दिया वैसा ही हमको करना पड़ा बल्कि हम जैसा करने वाले थे वैसा ही उसने लिख दिया उदाहरण के तौर पर किसी फला के लिए अल्लाह ने जिममें 
कोई बुराई लिखी बल्कि वो बुराई ही करने वाला था  अगर भलाई करने वाला था तो वह उसने भला ही लिखता अल्लाह के लिख देने से किसी को मजबूर कर दिया यह तकदीर की बातें हैं तकदीर के बातें का इनकार नहीं किया जा सकता और तकदीर का इनकार करने वाला सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने उस उम्मत को मजूस  (भरष्ट ) बताया है ।

मान्यता नंबर 20 

तकदीर की 3 किस्में हैं  ।

1 ० मुबर में हकीकी : - इल्म इलाही में किसी शय पर रोक नहीं  ।

2 ० मुअल्लके महज : - जो फरिश्ते के लिखे में से किसी चीज का रुका होना जाहिर फरमा दिया गया यानि दुआ और सदका से बदल जाए  ।

3 ० मुअल्लके शबीह व मुबरम :-- जिसके रुके होने का फरिश्तों ने लेखो में जिक्र नहीं लेकिन अल्लाह के इल्म में वहां रुका है इसकी कजा ( बचा हुुआ) की घटना होने ना होने का दोहरा उल्लेख किसी शर्त के साथ है ।

 अब तकदीर की 3 किस्में जिनके बारे में कुछ तफ्सील से लिखा जाता जाता है मुबरमें हकीकी वह तकदीर है जिसकी तब्दीली मुमकिन नहीं ।

उदाहरण ० जैसे कॉम के लूत पर फरिश्ते का आजाब लेकर आए और हजरत इब्राहिम ने उन काफिरों को अजाब से बचाने की कोशिश की और यहां तक कि जैसा अल्लाह ने कुरान शरीफ में इस बात को इस तरह बताया कि हमने कोम लूत के बारे में झगड़ने लगा याने बात करने लगा चर्चा करने लगा रिक्वेस्ट करने लगा कहना यह है कि कॉम पर आजाब ये मुबरमे हकीकी था हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम उसमें झगड़े यानी इरशाद हुआ  इब्राहिम इस ख्याल में ना पढ़ो बेशक उन पर अजाब ऐसा आने वाला है जो फिरने का नहीं यह अल्लाह की तरफ से फैसला  कुन होता है क्योंकि गुनाहगारों को इसकी सजा देना लाजमी बात है लूत अलैहिस्सलाम की कौम ने वह करतूत की उन पर अजाब आना ही था ।

 या अल्लाह की तकदीरों में से एक तकदीर की डेफिनेशन है कि उन पर वह लाजिमी ही हो गई थी जरूरी अब दूसरी किस्म की चर्चा करते हैं यहां दो मसले खासकर लेकर चलते हैं जिसमें से पहला मसला यह है तकदीर की बातें आम लोगों अर्थात हम जैसे जाहिल नहीं समझ सकते इसमें ज्यादा गौर और फिक्र करना बर्बाद होने का सबब है ।

 इसीलिए हजरत अबू बकर और हजरत उमर रजि अल्लाह अनहुमा इस मसले में बहस करने से रोक दिया गया तो तुम्हारी और हमारी क्या गिनती इतनी बात ध्यान में रहे कि अल्लाह ने आदमी को ईट पत्थर और दूसरे जमादार की तरह वह  देह ऐसी और  बे हरकत याने यानी निर्जीव या बेजान पैदा नहीं किया बल्कि उसको एक तरह का ज्ञान दिया उसे कर्म के लिए स्वतंत्र कर दिया है कि वह एक काम को चाहे करें या ना करें और उसके साथ ही उसको अकल भी दी है कि भले बुरे फायदे नुकसान को पहचान सके अगर करना चाहता है उसी की किस्म के समान हो जाता है और इसी बिना पर इंसान की पकड़ है ।

जैसे कि कुरान में सूरत अल मुल्क में अल्लाह इरशाद फरमाता है कि हमने मौत और जिंदगी को इसलिए पैदा किया कि तुम्हारी जांच परीक्षा करें कि तुम में अच्छे कर्म करके कौन हमारे पास आता है और वही रहम फरमा ने वाला  ।

नोट  : - 1 ०  अपने आप को बिल्कुल पत्थर की तरह मजबूर और बिल्कुल मुख्तार समझना दोनों ही गुमराही  है अर्थात खुद को पत्थर के जैसा समझना यानी कि वह मान लेना जो होना है वह उसी के करने से होगा और हम कुछ नहीं करेंगे यह तो बात ऐसी हो गई कि मैं कमाने ना जाऊं और रोटी मेरे मुंह तक आ जाए और दूसरा यह कि खुद को इतना स्वतंत्र समझे कि मेरी पकड़ना होगी हीी नही  इस तरीके के लोग दोनों ही गुमरह है ।

 मसला नंबर 2 ०  दूसरी बात यह है कि बुरा काम करने पर यह कहना कि तकदीर में ऐसा ही था और अल्लाह की मर्जी ऐसी थी यह बहुत बुरी बात है शरीयत का हुक्म यह है कि जो अच्छा काम करें उसे अल्लाह की तरफ से जाने जो बुरा काम करें अपने नफ़्स की तरफ से और इब्लीस मलऊन उनकी तरफ से समझें  ।

जैसा अल्लाह क़ुरआन में फरमाता है कि जो किया उसने अपने हाथ का ही वह अपने ऊपर अर्थात जिसने बुरा काम किया उसने अपने ही हाथ का किया धरा जो उसके ऊपर मुसीबत आई उसके हाथ का किया हुआ  है अल्लाह ने उसको दे दिया और वह राई के दाने के बराबर भी नाइंसाफी नहीं करता ।

मान्यता नंबर 21 

अल्लाह दिशा , जगहों , वक्त , हिलने , रुकने  शक्ल सूरत , तमाम पैदा करती चीजों से पाक है इसीलिए अल्लाह जमीन और आसमान का नूर है अर्थात गुमराही से निकालकर लोगों को हिदायात देने वाला हर शय पर कुदरत रखने वाला जमीन और आसमान की निजाम को चलाने वाला हैं ।


मान्यता नंबर 22 

अल्हम्दुलिल्लाह अल्लाह पाक का दीदार कयामत मैदान ए महशर एवं जन्नतियों को होगा ओर उस दिन  मुसलमानों को यकीन होगा पर यह नहीं कह सकते कि कैसा होगा  क्योंकि जिस चीज को देखते हैं वह चीज देखने वालों से कुछ दूर पर होती है और नजदीक या दूरी देखने वालों से किसी तरफ होती है जब किसी को देखा जाता है तो उसे देखने के लिए आगे , पीछे , दाएं , ऊपर , नीचे  , दूर , करीब देखा जाता है और अल्लाह  तमाम चीजो से पाक् से तथा हर उस चीज से पाक है जो जिस्मानी चीज रखती हो फिर यही बात आखिर दीदार कैसे होगा ?

 यह प्रश्न दिल में उठता है ?  तो खूब समझलो कि यहां कैसे और क्यों की गुंजाइश नहीं इंशाल्लाह जब देखेंगे उस वक्त बता देंगे कि इस सब बातों का खुलासा यह है क्यों ? कैसे  ? क्यों ? करा दी का संबंध अकल से है और अल्लाह की जात तक अकल पहुंच नहीं सकती जहां तक अकल पहुंचती है वह खुदा नहीं जब वहां तक कहीं नहीं पहुंच सकती तो अकल् नजर उसे घेरे में ले भी नहीं सकती ।


उसे ही तरीके से कुछ लोग क़ुरआन कि मुतशाबेह आयत के पीछे पड़े रहते हैं और असल तक नहीं पहुंच सकते कि खुदा को ही उसका असल इल्म है उसका इल्म तुम्हें नहीं अल्लाह ही बेहतर जानता है सूरह आले इमरान आयत नंबर 7

वही (हर चीज़ पर) ग़ालिब और दाना है (ए रसूल) वही (वह ख़ुदा) है जिसने तुमपर किताब नाज़िल की उसमें की बाज़ आयतें तो मोहकम (बहुत सरीह) हैं वही (अमल करने के लिए) असल (व बुनियाद) किताब है और कुछ (आयतें) मुतशाबेह (मिलती जुलती) (गोल गोल जिसके मायने में से पहलू निकल सकते हैं) पस जिन लोगों के दिलों में कज़ी है वह उन्हीं आयतों के पीछे पड़े रहते हैं जो मुतशाबेह हैं ताकि फ़साद बरपा करें और इस ख्याल से कि उन्हें मतलब पर ढाले लें हालाँकि ख़ुदा और उन लोगों के सिवा जो इल्म से बड़े पाए पर फ़ायज़ हैं उनका असली मतलब कोई नहीं जानता वह लोग (ये भी) कहते हैं कि हम उस पर ईमान लाए (यह) सब (मोहकम हो या मुतशाबेह) हमारे परवरदिगार की तरफ़ से है और अक्ल वाले ही समझते हैं ।  ( 3 : 7 )

मान्यता नंबर 23

अल्लाह जो चाहे जैसा चाहे उस पर किसी का काबू नहीं ना कोई अल्लाह को उसके इरादे से न रोक सकता है ना उसे ऊँघ  आती है अर्थात आलस ना उसे नींद आती है और वह तमाम जहानों का निगहबान है याने देखने वाला वह ना तो थकता है और ना उगता है वही सारे आलम का पालनहार है मां-बाप से ज्यादा मेहरबान और हलीम है अल्लाह की रहमत टूटे हुए दिल का सहारा है ।

 अगर अल्लाह की रहमत ना हो तो कोई कान रखने के बावजूद सुन नहीं सकता जबान रखने के बावजूद बोल नहीं सकता आंख रहने के बावजूद देख नहीं सकता आज हम चलती फिरती दुनिया में ही इसका नजारा करें तो बहुत से उदाहरण हमारे आंखों के सामने आते हैं की आंखें रहने के बावजूद उन्हें दिखाई ना दे कान रहने के बावजूद सुनाई ना दे जबान रहने के बावजूद वह बोल ना सके यह सब उसकी रहमत के बिना कुछ नहीं अगर उसकी रेहमत ना हो तो कोई कुछ ना कर सके मां के पेट में जैसी चाहे सूरत बनाए वही है अल्लाह ही गुनाहों को बख्श ने वाला तोबा कबूल करने वाला और कहार और गजब फरमाने वाला है ।

उसकी पकड़ ऐसी कड़ी है कि उसके बिना उसके छुड़वाए कोई छूट नहीं सकता अल्लाह चाहे तो छोटी चीजों को बड़ी कर दे और फैली चीजों को समेट दें वह जिसे चाहे ऊंचा कर दे उसके अमल के सबब जिसको चाहे नीचा कर दे उसके अमल के सबब वह जलील को इज्जत और इज्जत वाले को जलील कर दे उनके अमल के सबब जिसको चाहे सीधे रास्ते पर लाए उसके कोशिश के सबब जिसे चाहै सीधे रहा से अलग कर दे उसकी हट धर्मी के सबब जिसे चाहे करीब कर दे इसे चाहे मर दूर कर दे उनके अमलओ के सबब जिसे चाहे दे जिसे चाहे छीन ले उनकी कोशिश के सबब इमानदारी के सबक गुमराही के सभासद गर्मी के सबब वह जो कुछ करता है या करेगा वह इंसाफ है और वह जुल्म करने से पाक साफ है अल्लाह बुलंद से बुलंद है यहां तक कि उसकी बुलंदी की कोई थाह नहीं कोई लिमिट नहीं ।

हर चीज को घेरे हुए हैं अपने इल्म से और उसी जात कोई घेर नहीं सकता फायदा और नुकसान उसी के हाथों में है उनके अच्छे किए और बुरे के के सबब या आजमाइश के सबब मजलूम की फरियाद को पहुंचता है और जालिमों से बदला लेता है उनके किए के सबब उसकी मसिहत और उसके इरादे के बगैर कुछ नहीं हो सकता ।

वह भले कामों से खुश और बुरे कामों से नाराज होता है अल्लाह की रहमत है कि वह ऐसे कामों का हुक्म नहीं करता जो तुम्हारी ताकत के बाहर हो ऐसे क़ुरआन में अल्लाह  इरशाद फरमाता है  ।


(ऐ रसूल) ये ख़ुदा की आयतें हैं जो हम तुमको ठीक (ठीक) पढ़ के सुनाते हैं और ख़ुदा सारे जहॉन के लोगों (से किसी) पर जुल्म नही करता । (  3 : 108 )

ये उन्हीं कामों का बदला है जिनको तुम्हारे हाथों ने (ज़ादे आख़ेरत बना कर) पहले से भेजा है वरना ख़ुदा तो कभी अपने बन्दों पर ज़ुल्म करने वाला नहीं ।

 ( 3 : 182 )

 अल्लाह बंदों को सवाब या अजाब , बंदों के साथ मेहरबानी यह बंदे जो अपने लिए अच्छा जाने अल्लाह के लिए वाजिब नहीं क्योंकि वह एक हिकमत वाला है हो सके हम अपने गुमान में उसको अच्छा समझे पर वह अल्लाह के नजदीक बुरी हो और अल्लाह अपने बंदों पर जुल्म नहीं करता जिसका ।

उदाहरण यह लीजिए कोई शराबी शराब पीता है और खुद उसको अच्छा समझता है कोई जुवारी जुआ खेलता है खुद उसको अच्छा समझता है पर अल्लाह  उसको नापसंद करता है अल्लाह हर जायज दुआओं को कबूल करता है और नाजायज दुआओं को कबूल   नहीं करता जैसा कोई कहे कि मुझे रातों-रात कोई करोड़पति बना दे बिना कोशिश की तो अल्लाह ने उसको इल्म सलाहियत सोचने समझ  की अक्ल दी है ।

 अगर उसमें वह सच्चे दिल से काम करता है तो अल्लाह चाहे तो उसको गनी कर दे वह कुल मालिक है जो चाहे करे जो चाहे वो दे क्योंकि वही बेहतर जानने वाला है बेहतरीन तदबीर करने वाला बेहतरीन फैसला करने वाला हमारे गुमान में वह बुरा हो पर वह हमारे हक में बेहतर ही होता है जिसका अंदाजा हमें आगे चलकर जिंदगी में आता है कुछ काम को हम अच्छा जानते हैं पर वह काम ना होने पर नाराजगी हो जाती है जब उसका अंदाज आगे चलकर हमें भविष्य में आता है तो हमें पता चलता है कि हमारे भलाई के लिए था तो अल्लाह बेहतरीन हिकमत वाला है ।

मान्यता नंबर 24

 आंखों  से देखा जाता कान के जरिए सुना जाता आग जलाने का काम करती है पानी के सबक प्यास बुझती है लेकिन अल्लाह चाहे तो आंख से सुनने लगे कान से देखने लगे  पानी से चलाने लगी आग से प्यास बुझे और ना चाहे तो लाखों आंख खुद देखने को भी पहाड़ नजर ना आएगा और आग के अंगारे में तिनका से बेदाग रहेगा अब यह बात हमारे  कि दिमाग और स्वभाव से बिल्कुल विपरीत प्रतीत होता है परंतु यह पालनहार के स्वभाव के विरुद्ध नहीं क्योंकि वह हर चीज पर जोर रखता है और ना ही उसके नियम के विरुद्ध यह हमारे दृष्टिकोण से हमारे स्वभाव के विरुद्ध हो सकता है ।

 पर उसके दृष्टिकोण से नहीं उसी तरीके  से और मोजिज़ा का भी मसला है इंशाल्लाह उस पर भी एक लेख बना देंगे मोजिज़ा ( चमत्कार ) आखिर होता क्या है  ?और इसकी सही मान्यता क्या है ।

मान्यता नम्बर 25

 वह आसमानों का रब है वह जमीनों का रब है जमीन और आसमान में जो कुछ भी है वह सब का रब है इंसान , जिन्न , परिंदा , पशु ,फरिश्ते , जो हमारी आंखों से दिखाई दे या न दे उसका बनाने वाला वह अकेला है और जो भी मखलुकत है सिवाय उसकी ही बंदगी करते हैं और किसी की नहीं वह खिलाने वाला , पिलाने वाला , जीलाने वाला , मारने वाला , उठाने वाला , रोजे जजा का मालिक दुआ सिर्फ उससे ही वही खिलाता है वही पिलाता है वही जिंदा को मुर्दा करता है  और मुर्दे को जिंदा करेंगा  और सब उसकी ही उपासना करते है उसके जैसा कोई नहीं तमाम तारीफ है उसके लिए ही है वह कुल मालिक है उसकी जितनी तारीफ की जाए जितनी इबादत की जाए वो कम है बंदे को खाली उसका ही बंदा बन के रहना  चाहिए वहीउपासना करने योग्य है  उसकी पूजा करनी चाहिए ।


 और भी बहुत सी बातें हैं पर उनको बयान करना मुमकिन नहीं जितना मेरे इल्म में था और जो बुजुर्गों का दिया हुआ है  हदीस की रोशनी में था बताने की कोशिश की है अकल मंदो के लिए इतना ही काफी होगा ।

 इसमें किसी तरीके के लिखने में समझने में बोलने में गुस्ताखी हो पाक पालनहार से दुआ है कि या अल्लाह तू गफूर व रहीम है मेरी सब गलतियों को दरगुजर फरमा और सही तरीके से लिखने की समझने की और उससे ज्यादा खुद पर अमल करने की तौफीक अता फरमा आमीन अल्लाहुम्मा आमीन सुम्मा आमीन अस्तगफिरुल्लाह रब्बी मिन कुल्ली व जनबीयू व अतुबु  इलाही ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मदूर रसूल अल्लाह  । सल्लाहु अलैहि वसल्लम

 एक पाक पालनहार की बारे में इस तरीके से मान्यता रखनी चाहिए और कुल मालिक की सिफत भी यही है और इसीलिए ही तो वह इबादत के लायक है सच्चाई की तरफ , सच्चे दिन की तरफ सच्चे दिन के तरफ जो तुम में और हम में एक सा है एक अल्लाह की इबादत करें और उसके रसूल की बात माने अपनी जिंदगी को स्वर्गगामी बनाए दुनिया और आखिरत दोनों में कामयाबी पाए अस्सलामु अलैकुम ।


Allah kon hai ?


*  हक़ क़ुरआन लौहे महफूज में है ।(85:21,22)

* बेशक़ क़ुरआन फैसले की बात है ।
( 86:13,14) ( 15 : 1 से 15 )

* बेशक़ क़ुरआन सीधा राह दिखाता है ।
( 15:9 )

 *وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُضِلَّ قَوْمًۢا بَعْدَ إِذْ هَدَىٰهُمْ حَتَّىٰ يُبَيِّنَ لَهُم مَّا يَتَّقُونَ إِنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌ

अर्थात :-  अल्लाह की ये शान नहीं कि किसी क़ौम को जब उनकी हिदायत कर चुका हो उसके बाद बेशक अल्लाह उन्हें गुमराह कर दे हत्ता (यहां तक) कि वह उन्हीं चीज़ों को बता दे जिससे वह परहेज़ करें बेशक ख़ुदा हर चीज़ से (वाक़िफ है)       ( 9 :15 )

* हम ने ( अल्लाह ) उनकी जबान में ही कई नबी भेजे । ( 14 : 4 )

* हक़ बात( इस्लाम ) कोई जबरदस्ति नही।(2-256).  

 *पालनहार आज्ञा देता है नेकी का और बेहयाई को नापसंद करता है।(16:90).    


*नसीहत उनके लिए सीधे मार्ग पर चलना चाहे। 
(81:27,28,29)(40:28)

           
* ये मानव तुम लोग पालनहार(अल्लाह) के मोहताज हो और अल्लाह बे-नियाज़ है(सर्वशक्तिमान) है नसीहत वो मानते है जो अक्ल वाले है (13:19).     

     
 * और हरगिज अल्लाह को बे-खबर ना जानना जालिमो के काम से उन्हें ढील नही दे राहा है, मगर ऐसे दिन के लिए जिसमे आंखे खुली की खुली राह जांयेंगी।(14:42)


*कोई आदमी वह है, की अल्लाह के बारे में झगड़ाता है, ना तो कोई इल्म, ना कोई दलील और ना तो कोई रोशन निशानी।

(22:8)(31:20)(52:33,34)(23:72)(23:73).                                                      

*कह दो,"सत्य आ गया और असत्य मिट 
गया, असत्य तो मिट जाने वाला ही होता है।
(17:81)







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1 comments:

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April 30, 2020 at 7:38 PM ×

माशा अल्लाह भाई। बहुत अच्छा लेख प्रस्तुत किया है।

Congrats bro Answering-ARYAN.com you got PERTAMAX...! hehehehe...
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Dharm kise kahate hain

धर्म क्या है ? धर्म का अर्थ    अब हंसी ना आए तो क्या आए जो दिन और रात , गौ-मूत्र ,गोबर में लदे रहते हैं अर्थात उसे खाते पीते ह...