Dharm kise kahate hain

धर्म क्या है ?


Dharm ki paribhasha

धर्म का अर्थ 


 अब हंसी ना आए तो क्या आए जो दिन और रात , गौ-मूत्र ,गोबर में लदे रहते हैं अर्थात उसे खाते पीते है वे लोग इस्लाम पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं ? तो बड़ा ही  अचंभा लगता है उसी तरीके से इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाला आर्य समाज है और गप्पा बाबा के चेले उसमें  खास कर के अपने आप को एक्स -मुस्लिम बता ने वाले महेंद्रपाल आर्य  हैं वह बात सिरे से ही झूठ प्रतीत होती है परंतु उनका कर्म उनके साथ ।



Dharm ki paribhasha


इनका दावा है कि इस्लाम को धर्म सिद्ध करें और कुरान को  कलामुल्लाह अब जो मनु के अनुसार अर्थात मनु जी के कथन के अनुसार दूध , दही , गोबर  गोमूत्र का  काड़ा बनाकर उसे पीने का जो आदेश दे जाहिर सी बात है उनके दिमाग में कीचड़ ही बन  सकता है इससे ज्यादा कुछ नहीं परंतु आपकी शंका का समाधान भी करते हैं जिसका उदाहरण है कि मनुजी ने धर्म के 10 लक्षण बताएं हैं जिसकी चर्चा करते हैं कि उसमें क्या-क्या लक्षण बताएं कि जो धर्म में पाए जाते हैं ।


इस्लाम धर्म का इतिहास


 (पहले) सब लोग एक ही दीन रखते थे (फिर आपस में झगड़ने लगे तब) ख़ुदा ने नजात से ख़ुश ख़बरी देने वाले और अज़ाब से डराने वाले पैग़म्बरों को भेजा और इन पैग़म्बरों के साथ बरहक़ किताब भी नाज़िल की ताकि जिन बातों में लोग झगड़ते थे किताबे ख़ुदा (उसका) फ़ैसला कर दे और फिर अफ़सोस तो ये है कि इस हुक्म से इख्तेलाफ किया भी तो उन्हीं लोगों ने जिन को किताब दी गयी थी और वह भी जब उन के पास ख़ुदा के साफ एहकाम आ चुके उसके बाद और वह भी आपस की शरारत से तब ख़ुदा ने अपनी मेहरबानी से (ख़ालिस) ईमानदारों को वह राहे हक़ दिखा दी जिस में उन लोगों ने इख्तेलाफ डाल रखा था और ख़ुदा जिस को चाहे राहे रास्त की हिदायत करता है . 
  ( Al Quran 2 : 213 )

 हजरत आदम  अलैह अस्सलाम से लेकर नबी ए पाक सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम तक सब एक ही दिन पर थे यानी दीन ए इस्लाम उसके बाद लोगों ने आपस में भेद किया और अपने दिन ( असल धर्म ) से भटक गए हैं तनंतर पालनहार ने उनके मार्गदर्शन के लिए नबी एवं पुस्तक  भेजी जिसमे वे भेद डाल रखा था उसका निर्णय हो जाए परंतु मानव ने उस के संदेश को न मानते हुए अपना ही मत ,पंथ , संप्रदाय बना लिया ।

धर्म तो पहले से एक ही चला आ रहा है सनातन काल से जो केवल इस्लाम हैं इस्लाम ही सनातन है परंतु लोग उसको समझने में गलती करते हैं इस्लाम का मायना होता है सलामती और सलामती का मायना होता है शांति या गर्दन रख देना एक पालनहार के सामने अपनी नाजायज इच्छाओं को दमन कर देना ।

 सनातन काल से सिर्फ इस्लाम ही चला आ रहा है और वही स्वीकार करने अर्थात धारण करने योग्य है परंतु यहां मानव इस गलत फहमी है और ऐसा कहते हैं , कि इस्लाम 1450 साल पहले आया अब इनकी मूर्खता के बारे में क्या कहना बल्कि अल्लाह कौन है ? इस बारे में मैं एक विस्तारपूर्वक लेख बना चुका हूं अगर आप ने ना देखा हो तो यहां देख लीजिए । 

अल्लाह कौन है ? 👈✍️


उसी तरीके से बुखारी शरीफ की हदीस में आता है  ।

० अबू हुरैरा रजिअल्लाहु अनहु से रिवायत है की  अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने फरमाया हर बच्चा दीन ए इस्लाम की फितरत पर पैदा होता है अर्थात एक ईश्वर को मानने वाला होता है परंतु वह उनके माता-पिता उसे यहूदी , नसरानी या मूर्तिपूजक बना देते हैं जैसे जानवर के बच्चा पैदा होता है क्या उसने कोई कान कटा पैदा हुआ तो तुम लोगों ने ही कान काट देते हैं अर्थात तुम ही लोग करते हो वह तो एक ही इस्लाम के मान्यता पर जन्म लिया अर्थात एक ईश्वर की उपासना करने वाला  ।
(सही बुखारी हदीस नंबर 6599 ) 


क्या इस्लाम धर्म है  ? 


० और अहले किताब ने जो उस दीने हक़ से इख्तेलाफ़ किया तो महज़ आपस की शरारत और असली (अम्र) मालूम हो जाने के बाद (ही क्या है) और जिस शख्स ने ख़ुदा की निशानियों से इन्कार किया तो (वह समझ ले कि यक़ीनन ख़ुदा (उससे) बहुत जल्दी हिसाब लेने वाला है । ( 3 : 19 )


 ० और हम तो उसी (यकता ख़ुदा) के फ़रमाबरदार हैं और जो शख्स इस्लाम के सिवा किसी और दीन की ख्वाहिश करे तो उसका वह दीन हरगिज़ कुबूल ही न किया जाएगा और वह आख़िरत में सख्त घाटे में रहेगा । ( 3 : 85 )

 अब यहां चर्चा करने की जरूरत नहीं क्योंकि मैंने विस्तारपूर्वक ऊपर ही बता दिया है कि दीन और धर्म किसे कहते हैं जब लोगों ने बिगाड़ किया तो पाक पालनहार ने हर दौर में अपने नबी एवं पुस्तकें भेजी जिनमें वह भेद डाल चुके थे उसका निर्णय हो जाए कि सच्चाई क्या है । पालनहार के नजदीक केवल एक ही दिन है वह दिन ए इस्लाम ।

 फिर सर्व मत , पंथ , संप्रदाय लोगों ने अपने मर्जी से बना लिए मुक्ति का जरिया केवल इस्लामी ही है परंतु सब ने उसको धर्म का नाम दे दिया अपना और उस पालनहार ने उनके झूठे दिन के लिए जब वह ना माने क्योंकि कुरान ए मजीद सूरह बकरा आयत नंबर 256 इरशाद फरमाया " इस्लाम में कोई जोर जबरदस्ती नहीं " हक खुला हैं रोशनी के जैसा लोगों के न मानने के कारण फिर अल्लाह ने फरमाया की दिन तुम्हारे धर्म 
( मत ) तुम्हारे साथ हमारा दिन हमारे साथ अर्थात कोई जोर जबरदस्ती नहीं उसने माना अपने भले के लिए जिसने ना माना उसने अपने ही बुरे के लिए ।


धर्म के लक्षण 


 आइये धर्म के ही लक्षण जानते हैं जो मनु जी ने स्वयं बताए हैं ।



Dharm ki paribhasha



 मनुस्मृति अध्याय नंबर 6 श्लोक नंबर 92 इसी तरीके से सत्यार्थ प्रकाश पांचवा समुल्लास पेज नंबर 109 से लेकर 110 उसी तरीके से संपूर्ण जीवन चरित्र दयानंद सरस्वती एक साफा नंबर 253


1 . धृति  = ( धैर्य , सब्र )
2 . क्षमा  = ( माफ कर देना , अपना अपमान करने वालो का भी उपकार करना )
3 . दमः =  ( हमेशा संयम से धर्म मे लगे रहना )
4 . अस्तेय = (चोरी , छल कपट ,आदि कर्म न करना )
5 . शौच = ( भीतर और ह्रदय को पवित्र करना )
6 . इन्द्रिय = ( अधर्म आचरणों के रोकना )
7 . धी: = (अच्छे कर्मों से बुद्धि की उनती करना ) 
8 . विद्या = ( इल्म हासिल करना , ज्ञान प्राप्त करना )
9 . सत्य =  ( हमेशा सत्य बोलना )
10 . क्रोध न करना  = ( गुस्से को पी जाना )

 नॉट : - अब इसकी आवश्यकता तो नहीं है कि इस्लाम को भी धर्म सिद्ध किया जाए संपूर्ण 
विश्व के लोग इस्लाम को रोजाना स्वीकार करते है उसकी सच्चाई देख कर परंतु इनकी शंका का समाधान कर ही देते हैं एवं मनु जी के सिद्धांतों पर इस्लाम को बैठाने की कोशिश करते हैं और यहां गौर करने की बात है मैं केवल क़ुरआन से ही प्रमाण दे रहा हूं वही बहुत हो जाएंगे अगर आहदीसो से प्रमाण देने लगा तो इन्हें भागना भी नहीं सुधरेगा यह कुरान से ही कुछ कुछ दे देते हैं नहीं तो लेख भी काफी बड़ा हो जाएगा आइए देखते हैं ।


1 . धृति  = ( धैर्य , सब्र )


Dharm ki paribhasha


० मगर जो लोग ईमान लाए, और अच्छे काम करते रहे और आपस में हक़ का हुक्म और सब्र की वसीयत करते रहे ।  ( क़ुरआन 103 : 3 )

० किन्तु यह चीज़ केवल उन लोगों को प्राप्त होती है जो धैर्य से काम लेते है, और यह चीज़ केवल उसको प्राप्त होती है जो बड़ा भाग्यशाली होता है ।
 ( 41 : 35 )

० ऐ ईमानदारों मुसीबत के वक्त सब्र और नमाज़ के ज़रिए से ख़ुदा की मदद माँगों बेशक ख़ुदा सब्र करने वालों ही का साथी है  ।
 ( 2 : 153 )

० और ख़ुदा की और उसके रसूल की इताअत करो और आपस में झगड़ा न करो वरना तुम हिम्मत हारोगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी और (जंग की तकलीफ़ को) झेल जाओ (क्योंकि) ख़ुदा तो यक़ीनन सब्र करने वालों का साथी है । ( 8 : 46 )

आजमाइश अच्छी बुरी परस्ती में ।

(मुसलमानों) तुम्हारे मालों और जानों का तुमसे ज़रूर इम्तेहान लिया जाएगा और जिन लोगो को तुम से पहले किताबे ख़ुदा दी जा चुकी है (यहूद व नसारा) उनसे और मुशरेकीन से बहुत ही दुख दर्द की बातें तुम्हें ज़रूर सुननी पड़ेंगी और अगर तुम (उन मुसीबतों को) झेल जाओगे और परहेज़गारी करते रहोगे तो बेशक ये बड़ी हिम्मत का काम है । ( 3 : 186 ) 
उसी तरीके से ये भी है ।
( 39 : 49 ) ( 18 : 7 ) ( 29 : 2 , 3 ) 
( 22 :11 ) ( 2 : 214 )

2 . क्षमा  = ( माफ कर देना , अपना अपमान करने वालो का भी उपकार करना )



Dharm ki paribhasha


० वे लोग जो ख़ुशहाली और तंगी की प्रत्येक अवस्था में ख़र्च करते रहते है और क्रोध को रोकते है और लोगों को क्षमा करते है - और अल्लाह को भी ऐसे लोग प्रिय है, जो अच्छे से अच्छा कर्म करते है   ( 3 : 134 )

० (तो ऐ रसूल ये भी) ख़ुदा की एक मेहरबानी है कि तुम (सा) नरमदिल ( चीफ ) उनको मिला और तुम अगर बदमिज़ाज और सख्त दिल होते तब तो ये लोग (ख़ुदा जाने कब के) तुम्हारे गिर्द से तितर बितर हो गए होते पस (अब भी) तुम उनसे दरगुज़र करो और उनके लिए मग़फेरत की दुआ मॉगो और (साबिक़ दस्तूरे ज़ाहिरा) उनसे काम काज में मशवरा कर लिया करो (मगर) इस पर भी जब किसी काम को ठान लो तो ख़ुदा ही पर भरोसा रखो (क्योंकि जो लोग ख़ुदा पर भरोसा रखते हैं ख़ुदा उनको ज़रूर दोस्त रखता है ।
 ( 3 : 159 )

० और अल्लाह के मार्ग में ख़र्च करो और अपने ही हाथों से अपने-आपको तबाही में न डालो, और अच्छे से अच्छा तरीक़ा अपनाओ। निस्संदेह अल्लाह अच्छे से अच्छा काम करनेवालों को पसन्द करता है ।
( 2 : 195 ) 

० और क्षमा के बारे के हदीसो में भरमार है । सुब्हान अल्लाह उनका क्या कहना उसका कोई तोड़ नही है ।


3 . दमः =  ( हमेशा संयम से धर्म मे लगे रहना )


Dharm ki paribhasha


० रहे ईमानदार मर्द औऱ ईमानदार औरतें, वे सब परस्पर एक -दूसरे के मित्र है। भलाई का हुक्म देते है और बुराई से रोकते है। नमाज़ क़ायम करते हैं, ज़कात देते है और अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करते हैं। ये वे लोग है , जिनकर शीघ्र ही अल्लाह दया करेगा। निस्सन्देह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है ।
( 9 : 71 )

० वे ऐसे हैं, जो तौबा करते हैं, बन्दगी करते है, स्तुति करते हैं, (अल्लाह के मार्ग में) भ्रमण करते हैं, (अल्लाह के आगे) झुकते है, सजदा करते है, भलाई का हुक्म देते है और बुराई से रोकते हैं और अल्लाह की निर्धारित सीमाओं की रक्षा करते हैं -और इन ईमानवालों को शुभ-सूचना दे दो ।
( 9 : 112 )

० उनकी बात दूसरी है जिन्होंने धैर्य से काम लिया और सत्कर्म किए। वही है जिनके लिए क्षमा और बड़ा प्रतिदान है । ( 11 : 11 )


4 .अस्तेय = (चोरी , छल कपट ,आदि कर्म न करना )


Dharm ki paribhasha


1. कभी झूठ मत बोलो – ( 22.30)

2. कभी किसी की जासूसी न करें – ( 49.12)

3. इतराओ मत बेशक अल्लाह ता आला इतराने वालों को पसंद नहीं करता – ( 28 76 )

4. किसी की बेईज्ज़ती न करें – ( 49.11)

5. फुजूल खर्ची न करो – ( 17.26)

6. जरूरतमंदों को खिलाएं – ( 22.36)

7. किसी के पीठ पीछे उसकी बुराई न करो  (49.12)

8. अपनी कसमों की हिफाज़त करो (जब क़सम खा लो तो पूरा करो या कफ्फारा दो) – ( 5.89)

9. कभी रिश्वत न लें – ( 27.36)

10. अपना मुआहदा पूरा करो – ( 9.4)

11. अपने गुस्से पर क़ाबू रखें – ( 3.134)

12. गपशप न फैलाएं – ( 24.15)

13. दूसरे लोगों के बारे में अच्छा सोचो – (24.12)

14. माँ बाप के साथ कभी सख्त न बनो हमेशा नर्म रवय्या इख्तियार करो –  ( 17.23)

15. बुरी और बेफायदा बातों से दूर रहो – (23.3)

16. लोगों का मजाक मत उड़ाओ – (49.11)

17. आजिज़ी के साथ ज़मीन पर चलें –  ( 25.63)

18. बुरे के साथ भी अच्छा बरताव रखो – (41.34)

19. वो मत कहो जो तुम नहीं करते या नहीं कर सकते  ( 61.2)

20. अपना वादा पूरा करो और अमानत में खयानत न करो – (23.8)

21. दूसरों के झूठे देवताओं बुरा भला न कहें –
 ( 6.108)

22. Business व्यापार में लोगों को धोखा न दें – (कुरान 6.152)

23. बगैर किसी हक़ के कोई चीज़ न लें –
 (कुरान 3.162)

24. गैर ज़रूरी सवाल न करें – (कुरान 5.101)

25. कन्जूस मत बनो और न ही फुजूल खर्ची करने वाले बनो – (कुरान 25.67)

26. बुरे नामों से दूसरों को मत बुलाओ – (49.11)

27. अपने आप को पाक (शुद्ध) होने का दावा न करें – (कुरान 53.32)

28. एहसान करने के बाद उसका बदला न मांगो – (कुरान 76.9)

29. मजलिसों में दूसरों के लिए जगह बनाओ – (कुरान 58.11)

30. अगर दुश्मन सुलह व शांति चाहता है, तो उसे कुबूल करो – (कुरान 8.61)

31. अच्छे तरीके से सलाम का जवाब दो ( 4.86)

32. लोगों को अपने एहसान की याद न दिलाएं – (कुरान 2.264)

33. अगर दो ग्रुप आपस में लड़ पड़ें तो उन में सुलह करा दो – (कुरान 49.9)

34. दरमियानी आवाज़ से बात करें और अपनी आवाज़ को पस्त रखें – (कुरान 31.19)

35. नफरत फ़ैलाने की वजह न बनो (कुरान 6.108)

36. अपने घर में दाखिल होने पर लोगों को सलाम करें – (कुरान 24.27)

37. काफिरों के लीडरों से भी धीरे से बात करें – (कुरान 20.44)

38. दूसरों के कम दिए गए चंदे मज़ाक न उड़ाओ – (कुरान 9.79)

39. पैगंबर को मत बुलाओ उस तरह जिस तरह से दूसरों को बुलाते हो – (कुरान 24.63)

40. मियां और बीवी के बीच सुलह व शांति बनाने की कोशिश करें – (कुरान 4.128)

41. करप्शन और फितना क़त्ल से बदतर गुनाह है – (कुरान 2.217)

42. हिकमत और अच्छे तरीके से दूसरों को सिखाओ – (कुरान 16.125)

43. बिना सबूत के दूसरों पर इलज़ाम न लगाएं – (कुरान 24.4)

44. पैगंबर की बीवियों को अपनी माँ की तरह समझो – (कुरान 33.6)

45. अपनी आवाजें पैगंबर की आवाज से ऊंची न करो – (कुरान 49.2)

46. बिना जाने और तहक़ीक़ के किसी को काफ़िर मत कहो – (कुरान 4.94)

47. किसी के कमरे में दाखिल से पहले इजाज़त लो – (कुरान 24.59)

48. अगर इस तरह जवाब दो जो बहुत अच्छा हो तो हो सकता है तुम्हारा दुश्मन भी दोस्त बन जाये – (कुरान 41.34)


5 . शौच = ( भीतर और ह्रदय को पवित्र करना )


Dharm


० ईमानवाले पुरुषों से कह दो कि अपनी निगाहें बचाकर रखें और अपने गुप्तांगों की रक्षा करें। यही उनके लिए अधिक अच्छी बात है। अल्लाह को उसकी पूरी ख़बर रहती है, जो कुछ वे किया करते है । 
( 24 : 30 )

० ऐ ईमान लानेवाले ! नशे की दशा में नमाज़ में व्यस्त न हो, जब तक कि तुम यह न जानने लगो कि तुम क्या कह रहे हो। और इसी प्रकार नापाकी की दशा में भी (नमाज़ में व्यस्त न हो), जब तक कि तुम स्नान न कर लो, सिवाय इसके कि तुम सफ़र में हो। और यदि तुम बीमार हो या सफ़र में हो, या तुममें से कोई शौच करके आए या तुमने स्त्रियों को हाथ लगाया हो, फिर तुम्हें पानी न मिले, तो पाक मिट्टी से काम लो और उसपर हाथ मारकर अपने चहरे और हाथों पर मलो। निस्संदेह अल्लाह नर्मी से काम लेनेवाला, अत्यन्त क्षमाशील है ।
( 4 : 43 )

ऐ ईमानदारों जब तुम नमाज़ के लिये आमादा हो तो अपने मुंह और कोहनियों तक हाथ धो लिया करो और अपने सरों का और टखनों तक पॉवों का मसाह कर लिया करो और अगर तुम हालते जनाबत में हो तो तुम तहारत (ग़ुस्ल) कर लो (हॉ) और अगर तुम बीमार हो या सफ़र में हो या तुममें से किसी को रफ ए हाजत या औरतों से हमबिस्तरी की हो और तुमको पानी न मिल सके तो पाक ख़ाक से तैमूम कर लो यानि (दोनों हाथ मारकर) उससे अपने मुंह और अपने हाथों का मसा कर लो (देखो तो ख़ुदा ने कैसी आसानी कर दी) ख़ुदा तो ये चाहता ही नहीं कि तुम पर किसी तरह की तंगी करे बल्कि वो ये चाहता है कि पाक व पाकीज़ा कर दे और तुमपर अपनी नेअमते पूरी कर दे ताकि तुम शुक्रगुज़ार बन जाओ । ( 5 : 6 )

अपने रब को अपने मन में प्रातः और संध्या के समयों में विनम्रतापूर्वक, डरते हुए और हल्की आवाज़ के साथ याद किया करो। और उन लोगों में से न हो जाओ जो ग़फ़लत में पड़े हुए है . ( 7 : 205 )

निस्संदेह इबराहीम बड़ा ही सहनशील, कोमल हृदय, हमारी ओर रुजू (प्रवृत्त) होनेवाला था .
( 11 : 75 )

ऐसे ही लोग है जो ईमान लाए और जिनके दिलों को अल्लाह के स्मरण से आराम और चैन मिलता है। सुन लो, अल्लाह ( ईश्वर ) के स्मरण से ही दिलों को संतोष प्राप्त हुआ करता है . ( 13 : 28 )


6 . इन्द्रिय = (अधर्म आचरणों के रोकना  ,  असत्य का त्याग )


Dharm


 ० तुम एक उत्तम समुदाय हो, जो लोगों के समक्ष लाया गया है। तुम नेकी का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह ( ईश्वर ) पर ईमान ( विश्वास ) रखते हो और यदि किताबवाले भी ईमान लाते तो उनके लिए यह अच्छा होता। उनमें ईमानवाले भी हैं, किन्तु उनमें अधिकतर लोग अवज्ञाकारी ही हैं. 
 ( 3 : 110 )

० निश्चय ही अल्लाह न्याय का और भलाई का और नातेदारों को (उनके हक़) देने का आदेश देता है और अश्लीलता, बुराई और सरकशी से रोकता है। वह तुम्हें नसीहत करता है , ताकि तुम ध्यान दो.  ( 16 : 90 )

० हिकमत और अच्छे तरीके से दूसरों को सिखाओ – (कुरान 16.125)

० नफरत फ़ैलाने की वजह न बनो (कुरान 6.108)

० अगर दो ग्रुप आपस में लड़ पड़ें तो उन में सुलह करा दो – ( 49.9)

० बुरे नामों से दूसरों को मत बुलाओ – (49.11)

० अपना वादा पूरा करो और अमानत में खयानत न करो – (23.8)

० अगर दुश्मन ( दुष्ट शत्रु ) सुलह व शांति चाहता है, तो उसे कुबूल करो – (कुरान 8.61)


० बिना सबूत के दूसरों पर इलज़ाम न लगाएं – (24.4)



7 . धी: = (अच्छे कर्मों से बुद्धि की उनती करना , नशे का सेवन नही करना एवं  अच्छे पदार्थ का सेवन , दुष्टों का संघ का परित्याग करना ) 


Dharm


० तुमसे शराब और जुए के विषय में पूछते है। कहो, "उन दोनों चीज़ों में बड़ा गुनाह है, यद्यपि लोगों के लिए कुछ फ़ायदे भी है, परन्तु उनका गुनाह उनके फ़ायदे से कहीं बढकर है।" और वे तुमसे पूछते है, "कितना ख़र्च करें?" कहो, "जो आवश्यकता से अधिक हो।" इस प्रकार अल्लाह दुनिया ( लोक ) और आख़िरत
 ( परलोक )के विषय में तुम्हारे लिए अपनी आयते खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि तुम सोच-विचार करो। ( 2 : 219 )

० ऐ ईमान लानेवालो ! जो अच्छी-सुथरी चीज़ें हमने तुम्हें प्रदान की हैं उनमें से खाओ और अल्लाह के आगे कृतज्ञता दिखलाओ, यदि तुम उसी की बन्दगी
 ( भक्ति )करते हो . ( 2 : 172 )

० ऐ लोगों! धरती में जो हलाल और अच्छी-सुथरी चीज़ें हैं उन्हें खाओ और शैतान के पदचिन्हों पर न चलो। निस्संदेह वह तुम्हारा खुला शत्रु है . ( 2 : 168 )

० करप्शन और फितना क़त्ल से बदतर गुनाह है – (2.217)

० और अल्लाह के मार्ग में उन लोगों से लड़ो जो तुमसे लड़े, किन्तु ज़्यादती न करो। निस्संदेह अल्लाह ज़्यादती करनेवालों को पसन्द नहीं करता । 
( 2 : 190 )

० तुम उनसे लड़ो यहाँ तक कि फ़ितना शेष न रह जाए और दीन (धर्म) ईश्वर के लिए हो जाए। अतः यदि वे बाज़ आ जाएँ तो अत्याचारियों के अतिरिक्त किसी के विरुद्ध कोई क़दम उठाना ठीक नहीं । ( 2 : 193 )

8 . विद्या = ( इल्म हासिल करना , ज्ञान प्राप्त करना )


Dharm


 ० पढ़ो, अपने रब के नाम के साथ जिसने पैदा किया
 ( 96 : 1 )

० पढ़ो, हाल यह है कि तुम्हारा रब बड़ा ही उदार है ।
 ( 96 : 3 )

० जिसने क़लम के द्वारा शिक्षा दी ।
( 96 : 4 )

० मनुष्य को वह ज्ञान प्रदान किया जिस वह न जानता था  ।  ( 96 : 5 )

० जैसा कि हमने तुम्हारे बीच एक रसूल तुम्हीं में से भेजा जो तुम्हें हमारी आयतें सुनाता है, तुम्हें निखारता है, और तुम्हें किताब और हिकमत (तत्वदर्शिता) की शिक्षा देता है और तुम्हें वह कुछ सिखाता है, जो तुम जानते न थे । ( 2 : 151 )

क़ुरआन और विज्ञान कर बारे में ये सब आयते है , सबको लिखना मुकिन नही यहाँ देख लीजिए ।

( 21 : 30 ) ( 41:11 )  ( 31 : 29 ) ( 39 : 5 )
 ( 79 : 30 ) ( 25 : 61 ) ( 10: 5 ) ( 71 : 16'17 )
 ( 21:33 ) ( 51 :47 )( 34 : 3 ) ( 10 : 61 )( 7 : 57 ) 
( 13 : 17 )( 25 : 48'49 )( 35 : 9 )( 45 : 5 )
( 50 : 9'10'11 )( 56 : 68'69'70 )( 67: 30 ) 
( 39 : 21 )( 30 :24 )( 23 : 18 )( 86: 11 )( 24 : 43 )( 30 : 48 )( 78 : 6'7 )( 21 : 31 )( 31 : 10 )
 ( 16 :15 )( 79 : 32 )( 88:19 )(55: 19'20 )
( 27:61 )( 25:53 )(24:40 )(25:54)(20:53)(51:49)
( 36:36 )(16:79 )(79:19)(16: 68'69 )(29 : 41 )
(27 : 17'18 )(16:69 )(2 : 159'160 )(2 : 174 )
(8 : 112 )(22: 3)(6:11)(22:8 )


9 .सत्य  =  ( हमेशा सत्य बोलना )


Dharm


० और सत्य में असत्य का घाल-मेल न करो और जान -बुझ के सत्य को छिपाओ मत । ( 2 : 42 )

० मगर जो लोग ईमान लाए ( विश्वास करें ) और अच्छे काम करते रहे और आपस में हक़  ( सत्य )का हुक्म और सब्र की वसीयत करते रहे ।  ( 103 : 3 )

० झूठी बातो से बचो – ( 22.30)

० किसी की बेईज्ज़ती न करें – ( 49.11)

० सोचो, जब तुम एक-दूसरे से उस (झूठ) को अपनी ज़बानों पर लेते जा रहे थे और तुम अपने मुँह से वह कुछ कहे जो रहे थे, जिसके विषय में तुम्हें कोई ज्ञान न था और तुम उसे एक साधारण बात समझ रहे थे; हालाँकि अल्लाह के निकट वह एक भारी बात थी ।
( 24 : 15 )

० और जो व्यर्थ बातों से पहलू बचाते है; ( 23 : 3) 

० और जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करते है- ( 23 : 5 )


० और जो अपनी अमानतों और अपनी प्रतिज्ञा का ध्यान रखते है; ( 23 : 8 )


० सफल हो गए ईमानवाले, ( 23 : 1)



० भलाई और बुराई समान नहीं है। तुम (बुरे आचरण की बुराई को) अच्छे से अच्छे आचरण के द्वारा दूर करो। फिर क्या देखोगे कि वही व्यक्ति तुम्हारे और जिसके बीच वैर पड़ा हुआ था, जैसे वह कोई घनिष्ठ मित्र है । ( 41 : 34 )

० मनुष्य उस प्रकार बुराई माँगता है जिस प्रकार उसकी प्रार्थना भलाई के लिए होनी चाहिए। मनुष्य है ही बड़ा उतावला! ( 17 : 11)

० जो कोई सीधा मार्ग अपनाए तो उसने अपने ही लिए सीधा मार्ग अपनाया और जो पथभ्रष्टो हुआ, तो वह अपने ही बुरे के लिए भटका। और कोई भी बोझ उठानेवाला किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा। और हम लोगों को यातना नहीं देते जब तक कोई रसूल न भेज दें । ( 17 : 15 )

० और व्यभिचार के निकट न जाओ। वह एक अश्लील कर्म और बुरा मार्ग है । ( 17 : 32 )

० और जिस चीज़ का तुम्हें ज्ञान न हो उसके पीछे न लगो। निस्संदेह कान और आँख और दिल इनमें से प्रत्येक के विषय में पूछा जाएगान। ( 17 : 36 )

० इनमें से प्रत्येक की बुराई तुम्हारे रब की स्पष्ट में अप्रिय ही है । ( 17 : 38 )

० मेरे बन्दों से कह दो कि "बात वहीं कहें जो उत्तम हो। शैतान तो उनके बीच उकसाकर फ़साद डालता रहता है। निस्संदेह शैतान मनुष्यों का प्रत्यक्ष शत्रु है।"
 ( 17 : 53 )

 ० कह दो, "सत्य आ गया और असत्य मिट गया; असत्य तो मिट जानेवाला ही होता है।"
 ( 17 : 81 )

10 . क्रोध न करना  = ( गुस्से को पी जाना )



Dharm


० वे लोग जो ख़ुशहाली ( अच्छी )और तंगी (बुरी ) की प्रत्येक अवस्था में ख़र्च करते रहते है और क्रोध को रोकते है और लोगों को क्षमा करते है - और अल्लाह  
( ईश्वर )को भी ऐसे लोग प्रिय है, जो अच्छे से अच्छा कर्म करते है।  ( 3 : 134 )

नॉट : - बाकी 5 में देख लीजिए ।


 अल्हम्दुलिल्लाहीराबिल आलमीन तुम्हारे मतानुसार कुरान और इस्लाम को मैंने धर्म सिद्ध कर दिया यह तो कुछ ही प्रमाण थे जो केवल कुरान से ही दिए इसमें तो हदीसो का एक भी प्रमाण नहीं दिया अगर उसे भी जोड़ दिया जाए तो इनकी बुद्धि सुन हो जाए अब इस्लाम को धर्म तो सिद्ध कर दिया और धर्म अर्थात  धारण करने योग्य अब मुझे आशा है , कि इस्लाम को  अब आप लोग स्वीकार लेना चाहिए ।


Dharm


परंतु तू मुझे पता है ,कि आप सत्य को ग्रहण नहीं कर सकते कोई नहीं हमें सत्य बताना है कोई माने या ना माने वह समय उसकी मर्जी है सत्य तो साफ पानी के जैसा और रोशन सूरज की जैसी स्पष्ट है उस से मनवाना नहीं बल्कि स्वयं अकलमंद इंसान उसे मान लेता है बरहाल इन्हीं सिद्धांतों पर वैदिक मत को मैं अधर्म सिद्ध कर सकता हूं परंतु मैं ऐसा नहीं करूंगा क्योंकि जाओ जी लो अपनी जिंदगी अपितू कौन सा धर्म धारण करने योग्य उसका नीचे उदाहरण दे देता हूं आप स्वयं ही उसका निर्णय करें धन्यवाद ।

इस्लाम और वैदिक मत में अंतर 

० और लोग ब्याज खाते है, वे बस इस प्रकार उठते है जिस प्रकार वह क्यक्ति उठता है जिसे शैतान ने छूकर बावला कर दिया हो और यह इसलिए कि उनका कहना है, "व्यापार भी तो ब्याज के सदृश है," जबकि अल्लाह ने व्यापार को वैध और ब्याज को अवैध ठहराया है। अतः जिसको उसके रब की ओर से नसीहत पहुँची और वह बाज़ आ गया, तो जो कुछ पहले ले चुका वह उसी का रहा और मामला उसका अल्लाह के हवाले है। और जिसने फिर यही कर्म किया तो ऐसे ही लोग आग (जहन्नम) में पड़नेवाले है। उसमें वे सदैव रहेंगे । ( 2 : 275 )

० अल्लाह ब्याज को घटाता और मिटाता है और सदक़ों ( दान ) को बढ़ाता है। और अल्लाह किसी अकृतज्ञ, हक़ मारनेवाले को पसन्द नहीं करता । 
( 2 : 276 )

ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह का डर रखो और जो कुछ ब्याज बाक़ी रह गया है उसे छोड़ दो, यदि तुम ईमानवाले हो ।
( 2 : 78 )


ऐ ईमान लानेवालो! बढ़ोत्तरी के ध्येय से ब्याज न खाओ, जो कई गुना अधिक हो सकता है। और अल्लाह का डर रखो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो ।
 ( 3 : 130 )

मनुस्मृति अधयाय 8 श्लोक 140 , 142 , 150 , 151 ,154 , 155 ,156 


Dharm

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हक़ वो होता है जो सर चढ़ के बोले जिस में विरोधी  भी तारीफ कर !भले तान ही कसे , क्या मिथ्था है  गोबर खाने वाले भी उन्नति की बात करते है ।

इस्लाम की शिक्षा एक साथ मिल कर खाओ , पीओ , गरीब ,अमीर सब के हाथ का बना हुआ खाओ ।




वैदिक शिक्षा









० रहे वे लोग जिन्होंने हमारे मार्ग में मिलकर प्रयास किया, हम उन्हें अवश्य अपने मार्ग दिखाएँगे। निस्संदेह अल्लाह सुकर्मियों के साथ है । ( 29 : 69 )

० निस्संदेह तुम्हारा रब उसे भली-भाँति जानता है, जो उसके मार्ग से भटकता और वह उन्हें भी जानता है, जो सीधे मार्ग पर है ।
( 6 : 117 )


० जिन लोगों ने अपने धर्म के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और स्वयं गिरोहों में बँट गए, तुम्हारा उनसे कोई सम्बन्ध नहीं। उनका मामला तो बस अल्लाह के हवाले है। फिर वह उन्हें बता देगा जो कुछ वे किया करते थे । ( 6 : 159 )



हक़ क़ुरआन लौहे महफूज में है ।(85:21,22)

* बेशक़ क़ुरआन फैसले की बात है ।
( 86:13,14) ( 15 : 1 से 15 )

* बेशक़ क़ुरआन सीधा राह दिखाता है ।
( 15:9 )

 *وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُضِلَّ قَوْمًۢا بَعْدَ إِذْ هَدَىٰهُمْ حَتَّىٰ يُبَيِّنَ لَهُم مَّا يَتَّقُونَ إِنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌ

अर्थात :-  अल्लाह की ये शान नहीं कि किसी क़ौम को जब उनकी हिदायत कर चुका हो उसके बाद बेशक अल्लाह उन्हें गुमराह कर दे हत्ता (यहां तक) कि वह उन्हीं चीज़ों को बता दे जिससे वह परहेज़ करें बेशक ख़ुदा हर चीज़ से (वाक़िफ है)       ( 9 :15 )

* हम ने ( अल्लाह ) उनकी जबान में ही कई नबी भेजे । ( 14 : 4 )

* हक़ बात( इस्लाम ) कोई जबरदस्ति नही।(2-256).  

 *पालनहार आज्ञा देता है नेकी का और बेहयाई को नापसंद करता है।(16:90).    


*नसीहत उनके लिए सीधे मार्ग पर चलना चाहे। 
(81:27,28,29)(40:28)

           
* ये मानव तुम लोग पालनहार(अल्लाह) के मोहताज हो और अल्लाह बे-नियाज़ है(सर्वशक्तिमान) है नसीहत वो मानते है जो अक्ल वाले है (13:19).     

     
 * और हरगिज अल्लाह को बे-खबर ना जानना जालिमो के काम से उन्हें ढील नही दे राहा है, मगर ऐसे दिन के लिए जिसमे आंखे खुली की खुली राह जांयेंगी।(14:42)


*कोई आदमी वह है, की अल्लाह के बारे में झगड़ाता है, ना तो कोई इल्म, ना कोई दलील और ना तो कोई रोशन निशानी।

(22:8)(31:20)(52:33,34)(23:72)(23:73).                                                      

*कह दो,"सत्य आ गया और असत्य मिट 
गया, असत्य तो मिट जाने वाला ही होता है।


(17:81)





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