Vedo me bali pratha

 बलिप्रथा


बलिप्रथा

आर्य समाज और पशुबलि का विरोध


* प्रिय मित्रों के लिए एक महत्वपूर्ण लेख !

* आर्य समाज वे पंथ है , जो अपने इतिहास को स्वयं मिटाने पर तुला है अपने रीति , रिवाज , ऋषिमुनियों की आज्ञा के विरुद्ध चलने वाला पंथ है , जो केवल 138 - 140 वर्ष पुराना है जिसकी स्थापना झुट की बुनियाद पर राखी थी जिसके संथापक दयानंद नामक के व्यक्ति ने की थी ।

* जिसके फलस्वरूप वैदिक धर्म के पालन करने वालो ने इन आर्य समाज की विचारधारा को सिरे से ही नकार दिया और इन आर्य समाजीयो का पुरजोर खंडन करते नजर आते है । आर्य समाज की मान्यता वेदों के विरुद्ध , ब्रह्मण ग्रन्थ विरुद्ध एंव ऋषिमुनियों की शिक्षा के विरुद्ध आदि आदि ।

* आर्य समाज का मुख्य उपदेश यह है , की असत्य को सत्य साबित करना और सत्य को असत्य अलबत्ता  वेदों के अर्थों का अनर्थ कर दिया है जो कि नाही निरुक्त से नाही निघण्टु से  दूर दूर तक कोई लेना देना नही है । मुर्खता के स्तर यहाँ तक बड़ गया कि वेदों में ज्ञान विज्ञान में नाम पर विमान , बंदूक आदि तक लिख दिया जिसका एक उद्धरण लेते चलते है ।

* रथ , रथेन = विमान , यान क्या मिथ्या फैला रखी है  सब जानते है कि विमान अविष्कार की पूर्ण प्रक्रिया 1903 ईसवी में पूर्ण हुई  जो कि 12 सेंकड तक ऊंची उड़ान भरी बहरहाल अक्ल वाले जानते है , परंतु आर्य समाज वे भूल गए कि ये दौर शुशिक्षित गण अर्थात पढे लिखे लोगो का समय है जो इनके षड्यंत्र से भलीभांति परिचित है परंतु ये बाते 500 साल पूर्व कहते तो शायद कोई तुम्हारी बातों के जल में फस जाता परंतु अफसोस अब ऐसा ना हो सकेगा दुर्भाग्य वर्ष वे समय बीत गया जब तुम ज्ञान विज्ञान के नाम पर पाखंड फैला कर पेट भरा करते थे , बरहाल इन अप्रमाणित लोगो को छोड़कर सीधा मुद्दे पर आते है ।

* वेदों में और अन्य ग्रन्थों में पशु बलि का प्रवधान है जो कि 80 -90% वैदिक धर्म मे लोग मान्य करते है , 
जो कि यहाँ देख सकते है 👉 बलिप्रथा  
परंतु नवयुग में इस बारे में चर्चा करते है तो कई बंधु के पेट में दर्द शुरू हो जाता है और कहने लगते है ये पाप है , सब मिलावट है आदि आदि परंतु उन के कहने से सत्य तो बदल नही जाता जो है सो है और स्वयं ऋषीमुनि  ,विद्धवान बन जाते है प्रक्षेप है यानी मिलावट है मेरे प्रिय मित्र किस आधार पर ये घोषणा करते हो कोई प्रमाण या स्वयं अग्नि आदि ऋषि बन गए या फिर वेदव्यास सत्य ग्रहण करो बात तो यहाँ तक पहुच गई है कि जिन मंत्रो में  इन बातों का उल्लेख था उसके अर्थ बदल -बदल कर स्वतः वेदों में प्रक्षेप कर दिया जिसके फलस्वरूप इतना विरोधाभास है कि एक आर्य समाजी का भाष्य दूसरे आर्य समाजी के भाष्य से पूर्णतः विपरीत नजर आता है ।

*  और दुर्भाग्यवर्ष दोनो के भाष्य ना तो निरुक्त ना ही निघण्टु से मेल खाते है और जिस पर कोई काबू न चला उसको मिलावट और अशुद्ध घोषित कर दिया परंतु सत्य से कितना भागोंगे अलबत्ता कुछ उदाहरण लेते चलते है ।


वेद भाष्य और प्रक्षेप 

( मिलावट )

 सायणाचार्य


* पहले एक बात नॉट करने की है , जितना पीछे जाया जयाएँगे  उतना ही प्रमाणित तथ्य मिलेंगे आज से 600 वर्ष पूर्व सायणाचार्य एक मात्र वेद आदि के भाष्य करते थे जिन्होंने सम्पूर्ण वेदों का भाष्य किया था मतलब की 
ऋग्वेद , सामवेद , यजुर्वेद और अथर्ववेद जो भी उसके हस्त लेख वर्तमान में मौजूद है इस भाष्य को देश - विदेश की विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त है ।


बलिप्रथा


* सायण भाष्य ने ऋचाओ के प्रत्येक शब्द का विस्तार अर्थ  दिया है , प्रत्येक शब्द का व्याकरण संम्मत व्यूनत्तपत्ति है । तथा उन्हें अपने समय के अनेकों ग्रन्थों के उदाहरण देकर अपने अर्थों की पुष्टि
 ( प्रमाण के साथ ) उस प्रकार एक मात्र सायण ही भाष्यकर्ता है , जिन्होंने बिना कीसी पूर्वग्रह के वेदों का अर्थ किया है । और उनके भाष्य के आधार पर सामान्य  वेदों का सही सही अर्थ समाझ सकता है ।

वेद और बलिप्रथा एंव मांस भक्षण 


*  यज्ञ के प्रयोजन करते समय 7 सामग्री की आवश्यकता होती है जिसमे में पशुबलि भी एक महत्वपूर्ण अंग है जो कि कुछ इस तरीके से है ।

 यस्मि॒न्नश्वा॑स ऋष॒भास॑ उ॒क्षणो॑ व॒शा मे॒षा अ॑वसृ॒ष्टास॒ आहु॑ताः । की॒ला॒ल॒पे सोम॑पृष्ठाय वे॒धसे॑ हृ॒दा म॒तिं ज॑नये॒ चारु॑म॒ग्नये॑ ॥
( ऋग्वेद  10 : 91 : 14 )

* अर्थात : - यज्ञ के समय जिस अग्नि में घोड़ो , बैलों ,
बिजारो , मेंढ़ों की आहूति ( बलि ) दी जाति है , उस जलपान करने वाले , सोमयुक्त पीठ वाले , व यज्ञ विधाता अग्नि के लिए में ह्रदय से साधन स्तृती बोलता हूँ । 

* अब आर्य समाजीयो को क्योंकर नाराज करे दयानन्द के भाष्य से भी कुछ प्राप्त करते है ।


बलिप्रथा
ऋग्वेद 1 : 162 :13



* ये लो मित्रो दयानन्द जी ने तो पूर्णतः मांस पकाने की विधि ही बता दी वे भी घोड़े का मांस मुझे आशा है कि आर्य समाजीयो की आत्मा को शांती अवश्य मिल जाये  ।

यदूव॑ध्यमु॒दर॑स्याप॒वाति॒ य आ॒मस्य॑ क्र॒विषो॑ ग॒न्धो अस्ति॑ । सु॒कृ॒ता तच्छ॑मि॒तार॑: कृण्वन्तू॒त मेधं॑ शृत॒पाकं॑ पचन्तु ॥
( ऋग्वेद  1 : 163 : 10 )

अर्थात : -  घोड़े के पेट मे जो बिना पची हुई घास रह जाती है एंव  पकाते समय जो कच्चे मांस का अंश बचा
रहता है , उसे मांस काटने वाले शुद्ध करे एंव मांस देवो के निमित्त पकावे ।

यत्ते॒ गात्रा॑द॒ग्निना॑ प॒च्यमा॑नाद॒भि शूलं॒ निह॑तस्याव॒धाव॑ति । मा तद्भूम्या॒मा श्रि॑ष॒न्मा तृणे॑षु दे॒वेभ्य॒स्तदु॒शद्भ्यो॑ रा॒तम॑स्तु ॥
 ( ऋग्वेद  1 : 163 : 11 )

अर्थात : - हे घोड़े ! आग में पकाया जाते हुए तुम्हारे गात्र से जो रस छलकता है , एंव तुम्हे मारते समय जो रक्त शूल में लग जाता है , वह धरती पर न गिर पाए और न तिनको में मिले , संपूर्ण की कामना करने वाले देवो को वह दिया जाए ।

ये वा॒जिनं॑ परि॒पश्य॑न्ति प॒क्वं य ई॑मा॒हुः सु॑र॒भिर्निर्ह॒रेति॑ । ये चार्व॑तो मांसभि॒क्षामु॒पास॑त उ॒तो तेषा॑म॒भिगू॑र्तिर्न इन्वतु ॥
  ( ऋग्वेद  1 : 163 : 12 )

अर्थात : - जो लोग घोड़े के अवयवों को पकाते हुआ चारो और से देखते है एवं इस प्रकार से कहते है ,
" मांस बड़ा सुगंधित है " थोड़ा हमे भी दो  जो लोग घोड़े के मांस की भीख मांगते है , उनकी अभिलाषय 
हमे प्राप्त हो ।

मा त्वा॒ग्निर्ध्व॑नयीद्धू॒मग॑न्धि॒र्मोखा भ्राज॑न्त्य॒भि वि॑क्त॒ जघ्रि॑: । इ॒ष्टं वी॒तम॒भिगू॑र्तं॒ वष॑ट्कृतं॒ तं दे॒वास॒: प्रति॑ गृभ्ण॒न्त्यश्व॑म् ॥ 
 ( ऋग्वेद  1 : 163 : 15 )

अर्थात : - है अश्व ! धुँए वाली अग्नि को देखकर मत बुरा जानो अधिक अग्नि के ताप के कारण मांस पकाने
का पात्र न टूटे ,यज्ञ के लिए अभिष्ट , हवन के लिए लाए , सामने भेंट दिए जाने के लिए तैयार एंव वषट्कार द्वारा सुशोभित घोड़े को देवगण स्वीकार 
करे  ।

यदश्वा॑य॒ वास॑ उपस्तृ॒णन्त्य॑धीवा॒सं या हिर॑ण्यान्यस्मै । सं॒दान॒मर्व॑न्तं॒ पड्बी॑शं प्रि॒या दे॒वेष्वा या॑मयन्ति ॥
 ( ऋग्वेद  1 : 163 : 16 )

अर्थात : - बलि के लिए नियत अश्व को ढकने के लिए 
जो वस्त्र फैलाया जाता है , जिन स्वर्णो भूषणों से घोड़े
को सजाया जाता है एंव जिन साधनों से घोड़े के पैर एंव गर्दन बांधी जाती है , उन सब देवप्रिय वस्तुओं को ऋतिव्ज देवो को दे ।

यत्ते॑ सा॒दे मह॑सा॒ शूकृ॑तस्य॒ पार्ष्ण्या॑ वा॒ कश॑या वा तु॒तोद॑ । स्रु॒चेव॒ ता ह॒विषो॑ अध्व॒रेषु॒ सर्वा॒ ता ते॒ ब्रह्म॑णा सूदयामि ॥   ( ऋग्वेद  1 : 163 : 17 )

अर्थात : - है अश्व ! आते समय तुम नाक से महान शब्द कर रहे थे , न चलने पर तुम्हे कोड़ो से मारा गया
जैसे सुच के द्वारा हव्य अग्नि में डाला जाता हैं , उसी प्रकार उन सब व्यथाओं की मैं मंत्र द्वारा आहुति 
( बलि ) देता हूं ।

चतु॑स्त्रिंशद्वा॒जिनो॑ दे॒वब॑न्धो॒र्वङ्क्री॒रश्व॑स्य॒ स्वधि॑ति॒: समे॑ति । अच्छि॑द्रा॒ गात्रा॑ व॒युना॑ कृणोत॒ परु॑ष्परुरनु॒घुष्या॒ वि श॑स्त ॥
 ( ऋग्वेद  1 : 163 : 18 )

अर्थात : - है घोडे को काटने वाले ! देवो के प्रिय अश्व
की दोनों बगलों की चौतीस हडिड्यों को काटने के लिए छुरी भली प्रकार  चलाई जाती है ऐसी सावधानी
बरतनी , जिससे अश्व का कोई अंग कट न जाये एक एक भाग को देख कर और नाम लेकर काटो ।


एक॒स्त्वष्टु॒रश्व॑स्या विश॒स्ता द्वा य॒न्तारा॑ भवत॒स्तथ॑ ऋ॒तुः । या ते॒ गात्रा॑णामृतु॒था कृ॒णोमि॒ ताता॒ पिण्डा॑नां॒ प्र जु॑होम्य॒ग्नौ ॥ 
 ( ऋग्वेद  1 : 163 : 19 )

अर्थात : - इस दीप्त अश्व का प्रकाश कर्ता  एक मात्र ऋतु ही है , रात - दिन उस ऋतु का नियंत्रण करने वाले
हे अश्व ! तुम्हारे जिन अंगों को मै अनुकूल समय पर काटता हु , उन्हें पिंड बनाकर मैं अग्नि में हवन करटक हु ।

मा त्वा॑ तपत्प्रि॒य आ॒त्मापि॒यन्तं॒ मा स्वधि॑तिस्त॒न्व१॒॑ आ ति॑ष्ठिपत्ते । मा ते॑ गृ॒ध्नुर॑विश॒स्ताति॒हाय॑ छि॒द्रा गात्रा॑ण्य॒सिना॒ मिथू॑ कः ॥ 
 ( ऋग्वेद  1 : 163 : 20 )

अर्थात : - हे अश्व ! तुम्हारे देवो के समीप जाते समय तुम्हारे प्रिय शरीर तुम्हे दुःखी न करे . छुरी तेरे अंगों पर रुके नही , मांस ग्रहण करने का इच्छुक एंव अँगच्छेदन में अकुशल किटने वाला भिन्न भिन्न अंगों के अतिरिक्त छुरी के शरीर को मत तिरछा न काटे ।

* बलि किया हुआ घोड़ा हमे  हर प्रकार से बल दे ।
 ( ऋग्वेद  1 : 163 : 21 - 22 )


उ॒क्ष्णो हि मे॒ पञ्च॑दश सा॒कं पच॑न्ति विंश॒तिम् । उ॒ताहम॑द्मि॒ पीव॒ इदु॒भा कु॒क्षी पृ॑णन्ति मे॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥ 
( ऋग्वेद 10 : 86 : 14 )

अर्थात : -  इंद्राणी द्वारा प्रेरित यज्ञीक मेरे लिए 15 या 20 बैल पकाते है , उन्हें खाकर मै मोटा बनता हु यज्ञीक लोग मेरी दोनों कोखो सोमरस से भर देते है ,
इन्द्र सबसे श्रेष्ठ ।

अद्रि॑णा ते म॒न्दिन॑ इन्द्र॒ तूया॑न्त्सु॒न्वन्ति॒ सोमा॒न्पिब॑सि॒ त्वमे॑षाम् । पच॑न्ति ते वृष॒भाँ अत्सि॒ तेषां॑ पृ॒क्षेण॒ यन्म॑घवन्हू॒यमा॑नः ॥
( ऋग्वेद 10 : 28 : 3 )

अर्थात : - इन्द्र की पुत्र  ( सेनाध्यक्ष ) है इन्द्र यजमान पत्थरों की सहायता से तुम्हारे लिए सोमरस तैयार
करते है , तू सोमरस पीते हो , यजमान बैल का मांस
पकाते है और  तुम उसे खाते हो  उस समय तुम यजमान द्वारा बुलाया जाते हो ।

यदीद॒हं यु॒धये॑ सं॒नया॒न्यदे॑वयून्त॒न्वा॒३॒॑ शूशु॑जानान् । अ॒मा ते॒ तुम्रं॑ वृष॒भं प॑चानि ती॒व्रं सु॒तं प॑ञ्चद॒शं नि षि॑ञ्चम् ॥
( ऋग्वेद 10 : 27 : 2)

अर्थात : - ऋषि ने कहा हे इन्द्र जिस समय मैं देवयज्ञ न करने वाले एंव अपने शरीर को पालने में लगे हुई लोगों से युद्व करने जाता हूं उस समय ऋत्विजो के साथ मिलकर बैल का मांस पकता हु एंव 15 दिनों में प्रतिदिन तेज नशे वाले सोमरस को तुम्हारे लिए देता
 हूं  ।

सखा॒ सख्ये॑ अपच॒त्तूय॑म॒ग्निर॒स्य क्रत्वा॑ महि॒षा त्री श॒तानि॑ । त्री सा॒कमिन्द्रो॒ मनु॑ष॒: सरां॑सि सु॒तं पि॑बद्वृत्र॒हत्या॑य॒ सोम॑म् ॥ 
( ऋग्वेद 5 : 29 : 7 )

अर्थात : - अग्नि ने अपने मित्र इन्द्र के लिए शीघ्र ही 300 भैसों को पकाया था ............

वर्धा॒न्यं विश्वे॑ म॒रुत॑: स॒जोषा॒: पच॑च्छ॒तं म॑हि॒षाँ इ॑न्द्र॒ तुभ्य॑म् । पू॒षा विष्णु॒स्त्रीणि॒ सरां॑सि धावन्वृत्र॒हणं॑ मदि॒रमं॒शुम॑स्मै ॥
( ऋग्वेद 6 : 17 : 11 )

अर्थात :-- है इन्द्र परस्पर समान प्रीति वाले मरुदगुण तुम्हे स्त्रोत द्वारा बढ़ते है , तुम्हारे लिए पुष्पा तथा विष्णु ने 100 भैसे पकाए है , तथा तीन पत्रों को नशीमे एंव सोम से भरा है ।

* वैसे तो कई प्रमाण पर कुछ ही उदाहरण दिए है कुछ और भी है ।

( यजुर्वेद 31 : 15 ) 
( अथर्ववेद 8 : 6 : 23 )
( यजुर्वेद 20 : 87 ) आदि आदी ........

मनुस्मृति में बलिप्रथा  


(अध्यय 5 : 32 ' 36 ' 37 ' 38 ' 40 ' 41 )


बलिप्रथा


बलिप्रथा


बलिप्रथा


बलिप्रथा


विशुद्ध मनुस्मृति बलिप्रथा आर्य समाज


 ( 2 : 16 ' 41 )


बलिप्रथा


बलिप्रथा


महाभारत में बलिप्रथा


अध्य्य 88 : 1 - 10 

बलिप्रथा


* वाल्मीकि रामायण आदि में भी विस्तारपूर्वक मिलता है , अधिक जानकारी के लिए ।

* The myth the holy cow by D .N  jaha
के पुस्तक पढे ।

* परंतु अभी भी कुछ मूर्खो को ये बात हजम न हो पायेगी और कहंगे सब मिलावट है आदि आदि अलबत्ता हमे उनसे कोई गर्ज नही किसी को जबरन मनवाना मकशद नही बल्कि सत्य बताना है ।

* स्वीकार करना या अस्वीकार करना उनकी इच्छा पर निर्भर है और कुछ नए तथ्यों के साथ आगे मिलते है ।

धन्यवाद 













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