Arya aur anarya ka yudh

आर्य और अनार्य का इतिहास


आर्य और अनार्य का इतिहास

वैदिक काल

जिस तरह से वेदों में आतंकवाद की शिक्षा के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है उसी प्रकार अनार्यों के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए उस बारे में जानने का प्रयत्न करते है ?

संग्राम और  युध्द


* आर्य समाज के संथापक दयानंद सरस्वती अपनी पुस्तक ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के 22 विषय राजप्रजाधर्म पृष्ठ नंबर 285 अनार्यों के साथ व्यवहार और उनके माल को लूट कर खा जाने के बारे में कहते है !

" यहाँ इस बात को जानना चाहिए कि जो राजा को युद्ध करना है , वहीं उसका बल होता है, उसके बिना बहुत धन और सूख की प्राप्ति कभी नही होती क्योंकि
निघण्टु में " संग्राम " ही का नाम महाधन है सो उसको महाधन इस लिए कहते है कि उससे बड़े - बड़े उत्तम पदार्थ प्राप्त होते है क्योंकि बिना संग्राम के अत्यंत प्रतिष्ठा और धन कभी नही प्राप्त होता । "

* आसान शब्दों में समझे तो दयानंद जी का तात्पर्य यह है , की युद्ध ( जंग ) ही एक मात्र मार्ग है अधिक धन प्राप्त करने के लिए है । 

* वेद और आतंकवाद के विषय मे कई लेखो में अनार्य के साथ लूट मार करने की व्याख्या संक्षिप्त में की गई है , परंतु इस लेख में और अच्छे से जानने का प्रयत्न करते है , की अनार्यो का धन , पशु आदि आदि लूट का खा जाना , छीन लिया जाए , उनकी ह्त्या , उन्हे दास बनाना आदि आदि , मनुस्मृति में भी  इसका प्रवधान 7 अधयाय में बताया गया है , की लूट की जाए , फिर आपस मे मिल कर बाटना , उसी तरीके से सत्यार्थ प्रकाश 3 समुल्लास में भी इसका वर्णन है ।

* जिसके कुछ उदाहरण इस लेख में वर्णन करते है , जीवन रहा तो इसके कई और भाग भविष्य में आते रहेंगे पालनहार की कृपा से चले आये देखते है ।

महाधन और लूट 


किं ते॑ कृण्वन्ति॒ कीक॑टेषु॒ गावो॒ नाशिरं॑ दु॒ह्रे न त॑पन्ति घ॒र्मम् । आ नो॑ भर॒ प्रम॑गन्दस्य॒ वेदो॑ नैचाशा॒खं म॑घवन्रन्धया नः ॥ 
( ऋग्वेद 3 : 53 : 14 )

अर्थात : - हे इन्द्र ( सेनापते ) अनार्य लोगो के जनपदों
में गाय तुम्हारे लिए कुछ भी नही है करेंगी न वे दूध देती है न यज्ञपात्र को अपने दूध से दीप्त कर सकती है , तो तू वे गाय हमारे पास ले आओ और उनका धन भी हमे दो , तुम नीच वंश वाले लोगो का धन हमे प्रदान करो ।

उप॑ क्ष॒त्रं पृ॑ञ्ची॒त हन्ति॒ राज॑भिर्भ॒ये चि॑त्सुक्षि॒तिं द॑धे । नास्य॑ व॒र्ता न त॑रु॒ता म॑हाध॒ने नार्भे॑ अस्ति व॒ज्रिण॑: ॥
 ( ऋग्वेद  1 : 40 : 8 )

अर्थात : - जो राजपुरुष महाधन की प्राप्ति के निमित बड़े और छोटे युद्ध मे जीते व मारे व बांधके निवारण करने और वैदिक धर्म से प्रजा का पालन कराने में समर्थ होते है , वे संसार मे आनंद को भोगकर , परलोक में भी बड़े भारी आनंद को भी भोगते है ।

* दुसरो  ( अनार्य ) को लूटकर अपना पेट भरो और आनंद  प्राप्त करो क्या ज्ञान विज्ञान है ।

त्वं गो॒त्रमङ्गि॑रोभ्योऽवृणो॒रपो॒तात्र॑ये श॒तदु॑रेषु गातु॒वित् । स॒सेन॑ चिद्विम॒दाया॑वहो॒ वस्वा॒जावद्रि॑ग वावसा॒नस्य॑ न॒र्तय॑न् ॥
 ( ऋग्वेद 1 : 51 : 3 )

अर्थात : -  हे इन्द्र ( सेनाध्यक्ष ) आप जैसे सूर्य पवनो से पर्वत और मेघ के समान वर्तमान अत्र है , उस संग्राम में शत्रुओ ( अनार्यो ) के बल को दूर करते हो , शत्रु के पक्ष की सेना को नवाते के समान कपाते विविध
आनंद ( सुख की प्राप्ति के लिए ) के वास्ते धन अच्छे प्रकार प्राप्त हो ।

उ॒त ब्रु॑वन्तु ज॒न्तव॒ उद॒ग्निर्वृ॑त्र॒हाज॑नि । 
ध॒नं॒ज॒यो रणे॑रणे ॥ 
 ( ऋग्वेद  1 : 74 : 3 )
( ऋग्वेद  1 : 80 : 3 ' 10 )

अर्थात : - जो  युद्ध - युद्ध मे धन से जिताने वाला वैदिक ईश्वर उनके लिए धन को उत्पन्न करता है ।

भावार्थः - तुम जिसके आश्रय से शत्रुओ ( अनार्यो ) को पराजय करके अपने राज्यों को धन की प्राप्ति करते हो उस वैदिक ईश्वर का हमेशा सेवन किया करो ।

असि॒ हि वी॑र॒ सेन्योऽसि॒ भूरि॑ पराद॒दिः । असि॑ द॒भ्रस्य॑ चिद्वृ॒धो यज॑मानाय शिक्षसि सुन्व॒ते भूरि॑ ते॒ वसु॑ ॥
( ऋग्वेद 1 : 81 :2 )

अर्थात : - हे इन्द्र ( सेनापते ) जो तू निश्चय  करके बहुत सेना के साथ है बहुत प्रकार से शत्रुओं के बल को नष्ट करता है , छोटे बड़े युद्व को जितने वाला है , दुसरो को भी यही शिक्षा देता है । तेरे  और हमारे लिए  अच्छे प्रकार से धन प्राप्त कर ।

यदु॒दीर॑त आ॒जयो॑ धृ॒ष्णवे॑ धीयते॒ धना॑ । यु॒क्ष्वा म॑द॒च्युता॒ हरी॒ कं हन॒: कं वसौ॑ दधो॒ऽस्माँ इ॑न्द्र॒ वसौ॑ दधः ॥
 ( ऋग्वेद 1 : 81 : 3 )

अर्थात : - हे इन्द्र ( सेनापते )  तू संग्राम में शत्रुओं के धन को प्राप्त करता है ,सो तू घोड़े को रथादि में युक्त
कर किसी शत्रु ( अनार्यो ) को मार किसी मित्र को धन
धनकोष कर और हमको धन में अधिकारी बना 
( हिस्सेदार )

स सू॒नुभि॒र्न रु॒द्रेभि॒ॠभ्वा॑ नृ॒षाह्ये॑ सास॒ह्वाँ अ॒मित्रा॑न् । सनी॑ळेभिः श्रव॒स्या॑नि॒ तूर्व॑न्म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥
 ( ऋग्वेद 1 : 100 : 5 )

अर्थात : - है इन्द्र ( सेनाध्यक्ष ) शत्रुओं को रुलाते है , उनके धन आदि उत्तम पदार्थों तो अच्छे प्रकार इखट्टा 
कर जो कि शूरवीरों  के सहन योग्य हो , उस संग्राम में शत्रुजनो को मारता हुआ सुखों को प्राप्त करता है ।


सेनाध्यक्ष और राजा कैसा होना चाहिए ? 



आर्य और अनार्य का इतिहास


स स॒व्येन॑ यमति॒ व्राध॑तश्चि॒त्स द॑क्षि॒णे संगृ॑भीता कृ॒तानि॑ । स की॒रिणा॑ चि॒त्सनि॑ता॒ धना॑नि म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥
 ( ऋग्वेद 1 : 100 : 9 )

अर्थात : - जो दाहिनी ओर खड़े हुई सेना को चलते हुए
शुत्रुओ को मरता है  और शुत्रुओ को गिराने के प्रबंध से भी अच्छे प्रकार उनके इखट्टे किये धन को ले लेता है ।

तं स्मा॒ रथं॑ मघव॒न्प्राव॑ सा॒तये॒ जैत्रं॒ यं ते॑ अनु॒मदा॑म संग॒मे । आ॒जा न॑ इन्द्र॒ मन॑सा पुरुष्टुत त्वा॒यद्भ्यो॑ मघव॒ञ्छर्म॑ यच्छ नः ॥ 
( ऋग्वेद 1 : 102 : 3 )

अर्थात : - हे इन्द्र आप मान करने योग्य है । हम लोगो को धन की प्राप्ति होने के लिए जिससे संग्रामो 
( महाधन का जरिया ) में जीत उस प्रकाशित करने वाले रथ समूह को जुड़ता है , शत्रुओं को सेनपते
( इन्द्र ) जा - जा मिले उस संग्राम  में पहुँचो अर्थात अपने रथ को वहाँ ले जाओ ,जहाँ धन प्राप्त हो ।

व॒यं ज॑येम॒ त्वया॑ यु॒जा वृत॑म॒स्माक॒मंश॒मुद॑वा॒ भरे॑भरे । अ॒स्मभ्य॑मिन्द्र॒ वरि॑वः सु॒गं कृ॑धि॒ प्र शत्रू॑णां मघव॒न्वृष्ण्या॑ रुज ॥
 ( ऋग्वेद  1 : 102 : 4  ' 10  )

अर्थात : - हे सेनाध्यक्ष ( इन्द्र ) शत्रुओं के दल को चीर फाड़ करने वाली सेना आदि के अधीश प्रत्येक संग्रामो में हम लोगो को मिला ( साथ ले चल ) संग्राम में  भोजन , वस्त्र , धन , रथ को बाटो युद्ध मे हम लोग शत्रुओं को जीते । 

आतंक और मार काट 


आर्य और अनार्य का इतिहास


त्वम॒पाम॑पि॒धाना॑वृणो॒रपाधा॑रय॒: पर्व॑ते॒ दानु॑म॒द्वसु॑ । वृ॒त्रं यदि॑न्द्र॒ शव॒साव॑धी॒रहि॒मादित्सूर्यं॑ दि॒व्यारो॑हयो दृ॒शे ॥
 ( ऋग्वेद 1 : 51 : 4 , 5 ) 
 (1 : 87 : 1 , 3 )

अर्थात : - जिस तरह से सूर्य की किरणें मेघ को छिन्न भिन्न करता है , उसी प्रकार अपने शत्रुओं  ( अनार्य )
को छिन्न भिन्न  ( तहस नहस  ) करो ।

जो यज्ञ नही करते ?

वि जा॑नी॒ह्यार्या॒न्ये च॒ दस्य॑वो ब॒र्हिष्म॑ते रन्धया॒ शास॑दव्र॒तान् । शाकी॑ भव॒ यज॑मानस्य चोदि॒ता विश्वेत्ता ते॑ सध॒मादे॑षु चाकन ॥
( ऋग्वेद 1 : 51 : 8 )

अर्थात : - है इन्द्र  ( सेनाध्यक्ष ) पहले तुम यह बात जनों की कौन आर्य है ? और कौन अनार्य , दस्यु ?
इसके बाद तुम कुशलयुक्त यज्ञों का विरोध करने वाले
अर्थात जो यज्ञ नही करते उनको नष्ट करके यजमानों
( जो यज्ञ करने कराने वाले ) के वश में लाओ , तुम  शक्तिशाली हो इसलिए यज्ञ करने वालो की सहायता करो ।

भूरि॑कर्मणे वृष॒भाय॒ वृष्णे॑ स॒त्यशु॑ष्माय सुनवाम॒ सोम॑म् । य आ॒दृत्या॑ परिप॒न्थीव॒ शूरोऽय॑ज्वनो वि॒भज॒न्नेति॒ वेद॑: ॥
( ऋग्वेद 1 : 103 : 6 )

अर्थात : - जिस प्रकार से भले व्यक्ति के  धन को चोर - डाकू छीन लेता है उसी प्रकार से  इन्द्र ( सेनाध्यक्ष ) धन का आदर करके यज्ञ न करने वालो का धन छीनकर उसे यज्ञ करने वालो के लिए ले जाता है ।

मा नो॑ वधीरिन्द्र॒ मा परा॑ दा॒ मा न॑: प्रि॒या भोज॑नानि॒ प्र मो॑षीः । आ॒ण्डा मा नो॑ मघवञ्छक्र॒ निर्भे॒न्मा न॒: पात्रा॑ भेत्स॒हजा॑नुषाणि ॥
( ऋग्वेद 1 : 104 : 8 )

अर्थात : - हे इन्द्र  ( सेनापते ) आप हम लोगो को मत मारिए , दंड मत दीजिए , हमारे धन , भोजन , आदि को मत चोरिय हमारी स्त्रियों के गर्भ में स्थित अंडे में  शिशु को मत चिर फाड़ करे हम लोगो के सोने चांदी धन को मत लीजिए ।

* तो प्रिय मित्रों ये थी कुछ ज्ञान - विज्ञान  की बाते ज्ञान - विज्ञान के नाम उपर भले लोगो को मूर्ख बनाते है , अफसोस वेदों में केवल आतंक की शिक्षा और मार काट , लूट मार भरा पड़ा है जिसके फलस्वरूप आर्यों ने भारत पर आक्रमण  करके जो पर बताया गया है वे सब किया , दुसरो का शोषण  मानसिक और आर्थिक रूप में जिसका प्रमाण इतिहास में पन्नो के दर्ज है ,अलबत्ता सुशक्षित  गण भलीभांति जानते है । स्वतः को सर्वश्रेष्ठ और दूसरों को म्लेच्छ , राक्षस , पिशाच आदि आदि वाहहह क्या कहने ।

* बरहाल समझदार बंधुओं के लिए काफी होंगा वैदिक काल जो कि 2500 - 3000 पूर्व वे कलंकित युग था 
जिसमे  विधवा एंवम  सुंदर स्त्रियों के साथ यौनशोषण ऋषिमुनियों की आम बात थी उसकी में चलते नियोग 
प्रथा चलाई गई थी अपनी हवस पूरी करने के लिए 
चलो मित्रो कुछ नए तथ्यों के साथ पुनः जल्दी भेट होंगी । 

धन्यवाद 

सम्पूर्ण जानकारी





















4 comments:

  1. 🙏🙏 बहुत ही अच्छी पोस्ट है। इनका यह ही इतिहास है, झूट बोल के राज करो, दयानन्दी मत फेलाओ और खूब लोगो को मुर्ख बनाओ / प्रिय मित्र आप बहुत सही काम कर रहे हैं जो इनकी असलियत को अपने साइट के माध्यम से प्रकाशित कर रहे हैं।

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद भ्राता श्री 😇

      Delete
    2. सही बात है ��

      Delete
  2. अत्यन्त महत्वपूर्ण जानकारी है ।।। बहूत बढ़िया महोदय ��

    ReplyDelete

Veda bhashyakar

सायण भाष्य का महत्व सायणचार्य का जीवन परिचय * सायण ने अपनी रचनामे अपने जीवन चरित्र के विषय मे आवश्यक तथ्यों का निर्देश किय...