Dayanand saraswati biography 5

दयानंद सरस्वती भांग और तंबाकू का सेवन


Dayanand saraswati biography

असल वजह 


* इससे पहले जितने लेखो में दयानन्द की विचित्र स्वभाव का वर्णन किया गया है उसी असली वजह क्या थी इस लेख में उसका सारा का सारा राज खुल जाएंगा आये देखते है । 

भांग , तंबाकु और दयानन्द 


* उसके बाद जिस वस्तु की खोज मै था  उसके अर्थ जानने की लिए आगे की और चल दिया और असूज सुदी  २ सवंत  १९१३ को दुर्गाकुण्ड के मंदिर पर चण्डलगढ़  में पहुँचा  , वह १० दिन बिताये यहाँ मैंने चावल खाना पूरी तरह से छोड़ दिया ( जो आपके शरीर की अवस्था को देख कर पता चलता है  ) और दूध पीकर जीवन व्यतीत करने लगा अधययन और अभ्यास पर ध्यान देता था । 

* वह मुझे भांग पिने की आदत हो गई सो कई बार उसके प्रभाव ( असर के चलते ) में सर्वथा बेसुध हो जाया करता  ( पूरी तरीके से नशे में रहता )  
एक दिन मंदिर से निकल कर चण्डलगढ़ के पास ही एक गाँव था वह एक पुराना साथी मिल गया गाँव  की दूसरी और कुछ ही दूर शिवालय था वहाँ  जाकर मैंने रात काटी रात के समय भांग से उत्पन मादकता 
( नशे  ) के कारण में सो गया था मेरे स्वप्न में देखा । 

* वह  ऐसा था की मैंने महादेव  और उनकी पत्नी पार्वती को देखा वे दोनों आपस में बात चित कर रहते थे , की " दयानन्द  " को अब शादी  
( विवाह ) कर लेनी चाहिए परन्तु  देवता उस चीज में भेट प्रकट कर रहे थे 
( क्योंकर भांग के बारे कहेंगे वे स्वतः उस चीजों का सेवन किया करते थे )
मैं नीद से जगा और वर्षा भी जोरदार हो रही थीं । 

*  मैने उस बरामदे में जो मंदिर का मुख्य द्वार के सामने आराम किया वह नंदी देवता की एक बहुत बड़ी मूर्ति खड़ी थी उस पर अपने वस्त्र और पुस्तके आदि मूर्ति के पीठ पर रख दिया हुए उसके पीछे बैठ गया सहसा नंदी मूर्ति के  अदंर लग रहा था  कि कोई मनुष्य उसके भीतर है  मैंने अपना हाथ उसकी ओर फैलाया उस की वजह से अंदर बैठा व्यक्ति भयभित  हो गया  और जल्दी से छलाँग मारी और बिजली की तरह से गांव की तरफ भाग गया । 

* तब उसके जाने पर मैँ  स्वतः मूर्ति के अंदर जा बैठा और कुछ की समय बाद वहाँ  पर एक बूढी स्त्री आई उस ने देवताओ की पूजा की ऐसी अवस्था में उसी के अंदर बैठा था  कुछ देर बाद वह मेरे पास आई मेरी पूजा की गूढ़ और दही आदी निकट रखके उसने कहाँ आप इससे कुछ ग्रहण करे और इसमें से कुछ खाये मैंने नशे के कारण सब चीज खाली दही क्यों की बहुत खट्टा था , जिससे भांग का नशा जाता राहा मुझे बहुत आराम प्रतीत हुआ । 

* तो ये हल था दयानन्द जी  का भांग पिते रहो और अवारो की तरह से घूमते रहो इस के चलते ही नशे की हालत में वेदो का भाष्य कर बैठे जो की ना  तो निरुक्त ना की  निघण्टु  से कही भी नहीं मेल खाता और  नाशे  में ही चूत्यार्थ  अंधकार  लिख डाली  और कुछ मुर्ख उससे सत्य मान  बैठे  अरे मूर्खो वे सब नशे में लिख कर चले गये  और तुम उसमे प्रकाश ढूंढ़ने चले 
आज भी वक्त है सुधर जाओ नहीं तो  मरने के बाद पछताना पढ़ेगा  जैसे दयानन्द पछता राहा हो गया जरा पूछना  मोक्ष मिला या नहीं  सब पोपलीला है ।

* अगर किसी को मेरी बातों से कष्ट पंहुचा हो तो  , रोज होता रहे । 




0 comments:

कल्प की गणना

 कल्प की गणना सुर्ष्टि की उत्पत्ति के पूर्व *  सुर्ष्टि की उपत्ति के से पूर्व न अभाव वा असत्ता होता  और  न व्यक्त जगत र...