Biography of dayanand saraswati 1

Dayanand ka bachpan

दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय


*  एक मजेदार लेख !

*  दयानंद सरस्वती के जीवन  के बारे में संक्षेप में जानने की कोशिश करेंगे  जिसकी शुरुआत इस लेख से शुरु करते है , मेरे दिली इच्छा है कि आप लोगो को सत्य पता चले कि समाज सुधारक थे या लोगो को मूर्ख बनाने का षड्यंत्र  इनके विषय मे बरहाल अगर जिंदगी रही तो इसके कई भाग भविष्य में आते रहेंगे इस लेख में दयानंद सरस्वती का बचपन का दिलचस्प क़िस्सा खुद दयानंद सरस्वती की जुबानी आये देखते है ?


आपबीती और बच्चपन


* दयानंद सरस्वती स्वतः अपनी आपबीती और अपने अपवित्र मुख से वर्णन करते है ?

* संवत 1881 (1824 - 25 ई .वी ) के वर्ष में मेरा
 ( दयानंद ) का जन्म दक्षिण गुजरात के काठियावाड़ का मजिकठा मोर्वी के ब्राह्मण परिवार में हुआ था । आगे लिखता है , अपना पिता का निज निवास स्थान के प्रसिद्ध नाम इसलिए में नही लिखता की अगर माँ - पिता जीवित हो तो मेरे पास आवे तो सुधार ( असल मे नफरत फैलाने ) के काम मे विघ्न ( रुकावट ) हो क्योंकि मुझको उनकी सेवा करना उनके साथ घूमने में श्रम ( मेहनत , काम ) आद , धन आदि खर्च नही चाहता ।

* वाहहह गुरु जी क्या बात है , जिस माता पिता ने बच्चपन में पालन पोषण किया उनपर वक़्त , मेहनत और धन खर्च नही करना आपको और वही विघ्न डालेंगे वाहहह अपने जिम्मेदारी का समय आया और बुढ़ापे में सहारे की जरूरत है तो पीट फेर चले जो व्यक्ति अपने स्वतः के माता पिता का न हो सका वो समाज और धर्म सुधाकर हो सकता है भला क्या मिथ्या है ये वचन समझ से परे है और मूर्खता की हद्द है बरहाल आगे देखते है ?

" पिता धर्म : पिता स्वर्ग : पिता ही परमतप :
पितारी प्रीतिमापन्ने सर्वा : प्रियन्ति देवता : "

अर्थात : -  पिता की धर्म है , पिता ही सुख ( स्वर्ग )
और पिता ही सबसे श्रेष्ठ तपस्या है , पिता के प्रसन्न हो जाने पर सब देवता ( विद्वान लोग ) प्रसन्न हो जाते है ।

" न तो धर्म चरण किचिदस्ति महत्तरम ,
यशा पितरी शुश्रुषा तस्य व वचन क्रीपा । "

अर्थात : - पिता ही सेवा है अथवा उनकी आज्ञा का  पालन करने से बढ़कर कोई धर्माचरण नही है ।

"  पिता मूर्ति प्रजापते : "

अर्थात  : - पिता पालन करने से प्रजापति यानी राजा व वैदिक ईश्वर का मूर्तिरूप हैं ( प्रशंसीय व्यक्ति है )

" उपाध्यान्दशचार्य आचार्यणा शांतपित ,
सहस्त्र तू पितृन माता गौरवेपातीरियते "

अर्थात : - दस उपाध्यायो से बढ़कर आचार्य सौ आचार्य से बढ़कर पिता और 1000 पिताओं से बढ़कर माता गौरव से अधिक यानी बड़ी है ।

" धिक तँ सुतंय : पितृरिप्सीतार्य ,
क्षमोअपिसन्न  प्रतिपदयेद ,
जातने कीं तेन सुतेन कामं ,
पितुने चिंता ही  सतुधद्ररेदयः ।। "

अर्थात : - उस पुत्र को धिक्कार है , जो समर्थ होते हुए भी पिता के मनोरथ को पूर्ण करने में उघत नही होता जो पिता की चिंता को दूर नही कर सकता उस पुत्र के जन्म में क्या प्रयोजन है ? ( क्या फायदा है ऐसे पुत्र का  )

* और  ज्यादा जानकारी के लिए  यजुर्वेद  २ : ३४ और  आदि वेदो में  देख सकते है  इतनी बाते बता सकता हु , की इसी बातो पर एक लेख तैयार हो सकता है परन्तु आज का मुद्दा कुछ और है बरहाल मुद्दे  से  न भटकते हुए  सीधे  बात पर आते है  वेदभाष्यकार और धर्म के ठेकेदार खुद को बता ने  वाले इन  बात पर किसी भी तरीके से फिट नहीं बैठते  और महाशय  वेदो की शिक्षा  प्रचार करते थे  , क्या  मिथ्या  वाली बाते  है और जो ऊपर  श्लोक आदि दिए गए है  इसके राज आगे खुलते  जायेंगे  की दयानन्द जी की पोपलीला और गपोड़े बाजी  जो की  शुरुवात में ही अपने कड़वे  शब्दों में बयाना कर चुके है चलो आये मित्रो  दयानन्द  के जीवन के किस्से की शुरुवात करते है  ? 


* दयानंद अपनी आप बीती बताते हुए कहते है की जब मैं  5 वर्ष  का था  तो  देवनागरी  अक्षरों का आरंभ किया था कुल रीती  की शिक्षा भी माता पिता किया करते थे बहुत से धर्म शास्त्र के श्लोक और सुत्रादि भी  कण्डस्थ कराया करते थे फिर 8 वर्ष  की आयु में यजुर्वेद सहिंता का आरंभ किया और उससे पहले रुद्रधयाय  पढ़ाया गया था और मेरा परिवार  शिवमत  था  उसी की शिक्षा किया करते थे । 

* और पिता आदि लोग यह भी कहा करते थे की मट्टी का लिड बना के उसकी पूजा किया कर ( सत्य वचन जो की हिन्दुइस्म का एक अटूट अंग है ) पूजा करने के पहले ही मै भोजन कर लेता था माता कहती थी कि इससे पूजा न हो पायेगी ( अरे कठोर ह्रदय वाले मूढ़ व्यक्ति तुझे तनिक भर भी लज्जा नही आई माँ के बारे में भी नही सोचा ऐसे शब्द बोलने से पहले  जो लेख के प्रथम में लिखा है 👆👆 ) पिता जी हठ किया करते थे कि पूजा अवश्य ही करनी चाहिए क्योंकि परिवार की रीति है ।

* इस प्रकार 14 वर्ष की आयु के आरंभ तक यजुर्वेद की सहिंता सम्पूर्ण कर ली और कुछ अन्य वेदों का भी पाठ पूरा हो गया पिता जी जहाँ जहाँ शिवपुराण आदि की कथा होती  थी  वहा मुझ को पास बैठा कर सुनाया करते थे  घर में भिक्षा की जीविका नहीं थी पर जिम्मेदारी और लेन देन  से जीविका प्रबंध करके सब काम चला लिया करते थे  (दयानन्द जी को घर की हालत पता रहने के बाद भी बुढ़ापे में सहारा बनने की बजाये  मुँह मोड़ लिया आपको नर्क में भी जगह नहीं मिलेंगी अपने  कथनो के अनुसार निरुक्त में  नरक  का मतलब  न +अरक = नरक  निचे  की और  दुखो  का सागर  में पढ़े रहोंगे  और मोक्ष प्राप्ति शिक्षा देने चले  क्या मिथ्या  वाली बात है। 

* जब शिवरात्रि आई जब १३ त्रयोदर्शी के दिन कथा का माहात्म्य सूना करके  शिवरात्रि  के व्रत करने का निच्छय करा दिया ( पर पेटू लाला से कहा व्रत होने वाला था  ) जब  १४दर्शी  की शाम हुई तब बड़े -बड़े बस्ती के रईस  अपने पुत्रो के सहित मंदिरो में जागरण करने को गए वहाँ में भी अपने पिता के साथ गया और प्रथम प्रहर की पूजा भी करि दूसरे प्रहर की पूजा करके पुजारी लोग बाहेर निकलके  सो गए  मैं  पहले सुन रखा था की सोने से शिवरात्री  का फल नहीं मिलता इसीलिए अपनी आँखों में पानी के छींटे मार के जगता रहा और पिता भी सो गए थे  तब मुझे  शक हुआ की  जिसकी मैंने कथा सुनी थी वही महादेव है ,व अन्य कोई , क्यों की वह तो मनुष्य  के माफक एक देवता है वह बैल पर चढ़ता , चलता फिरता , खता पिता , त्रिशुल हाथ में रखता , डमरू बजाता , वर और शाप देता और कैलाश का मालिक है इत्यादि  प्रकार  का महादेव  कथा में सुना था । 




* तब पिताजी  को जगा के मैने पूछा की यह कथा वाला महादेव है व कोई दूसरा तब पिता ने कहा की क्यों पूछता है  ? तब मेने कहा की कथा का  महादेव  तो चेतन ( जीवित  )है  वह अपने ऊपर चूहों को क्यों चढ़ने देगा और इसके ऊपर चूहे फिरते है ।  

*  तब पिताजी ने कहा की कैलाश पर जो रहते है उनकी मूर्ति बना और आवाहन  करके पूजा करते है ।  अब  कलयुग  में  उस  शिव का साक्षात  दर्शन नहीं होता  इसलिय मूर्ति आदि बनाकर उसकी पूजा की जाति है  और उससे कैलाश का महादेव  प्रसन्न  होता है ऐसा सुनके मेरे मन में  भ्रम  हो गया  की इसमें कुछ गड़बड़ अवश्य है  और भूख भी लग रही थी , पिता से पूछा मै घर जाता हु पिता जी ने मेरे साथ २ सिपाही भेज दिए और कहा भोजन नहीं करना मैंने घर में जा कर माता से कहा मुझे भूख लगी है माता ने कुछ मिठाई  अदि  दी मैंने उसको खाके १ बजे सो गया पिता जी को पता चला की मैंने व्रत को तोड़ दी तो बहुत गुस्सा हुए  की तूने बहुत बुरा काम किया है तब मैने  कहा की वो कथा का महादेव नहीं है तू क्यों  मै  उसकी पूजा करू मन में तप  श्रद्धा  ही नहीं रही पर झूट कहा की मुझे पढ़े ने  की अवकाश  ( छुट्टी ) नहीं मिलती तो कहा से पूजा कर सकता हु फिर माता आदि चाचा ने समझाया की पढ़ने  दो जिसके वजह से  पिता  क्रोध शांत हुआ और कहा अच्छे से पढ़ो ।  


सत्यार्थ प्रकाश 11 समुल्लास पेज नंबर 250

* हिन्दू समाज अपना इतिहास लाखो साल पुराना बताते है , पर दयानंद सरस्वती में उनकी महेनत पानी फेर दिया और जैन धर्म खुद 2500 - 2800 साल पुराना है । 🤣🤣🤣

* आर्य समाज को प्रिय रखने वालों कभी ये तो जानो की वे लोग तुम्हारे बारे में क्या मत रखते है । जिसके लिए यहाँ देखे  👉👉 आर्य समाज और हिन्दू









*  अगर ये मुसलमान कहता तो बवाल मच जाता आस्था का मामला बन जाता 👇👇👇

सत्यार्थ प्रकाश 11 समुल्लास 

सत्यार्थ प्रकाश 11 समुल्लास 

सत्यार्थ प्रकाश 11 समुल्लास

* दयानंद सरस्वती के घर से भाग जाने का दिलचस्प किस्सा अगले भाग में देखतेे है ...............................






























2 comments:

कल्प की गणना

 कल्प की गणना सुर्ष्टि की उत्पत्ति के पूर्व *  सुर्ष्टि की उपत्ति के से पूर्व न अभाव वा असत्ता होता  और  न व्यक्त जगत र...