कल्प की गणना


 कल्प की गणना



सुर्ष्टि की उत्पत्ति के पूर्व




*  सुर्ष्टि की उपत्ति के से पूर्व न अभाव वा असत्ता होता  और  न व्यक्त जगत रहता है ,
न लोक रहता और न अंतरिक्ष रहता है , जो आकाश से  ऊपर निचे लोक - लोकान्तर  है , वे भी नही रहते , क्या किसको घेरता वा आवरत करता है , सब कुछ कुहरान्धकार 
 ( पूरा अंधकार होता है ) के गृह आवरण में रहता है , गहन गहरा क्योंकि रह सकता है । 
( ऋग्वेद 10 : 129 : 1)






* उस अवस्था में  न तो  मुर्त्यु रहती न ही काल व्यहार , न ही रात - दिन  का चिन्ह का नही रहता  । ( ऋग्वेद 10 : 129 : 2 )

 Note :-  जब कुछ नही रहता तो आत्म को कहा रखाता होगा  ?


 उसी प्रकार से मनुस्मृति में  भी ( 1 : 5 )


 मनुस्मृति



* जब ये सब हो रहा था तो वैदिक ईश्वर क्या करता है  ? 


 Sky
(अथर्वेद 4 : 1 : 6 )



Sky
( मनुस्मृति 1 : 74 )



* जब तक आराम से सोये थे , फिर नीद से उठे तो सबको रच दिया , क्या मिथ्या है ?






अब देखते है की पहले क्या बना फिर क्या बना फिर क्या  ?



* सबसे पहले आकाश बना !
 ( बल्कि आकाश कोई चीज नही होती और द्रव्य व्यक्त होता जो कि क़ुरान ने बताया , जो कि गैस आदि ही  हीलियम आदि  है , वेदों के अनुसार  आकाश दृढ़ ( कठोर ) है , बरहाल ये जगह नही है बयान करने की आगे देखते है  )





* फिर वायु यानी हवा आदी ! 




* फिर  अग्नि  ( आग ) !




* फिर पानी और धरती फिर सब ।
(मनुस्मृति 1 : 75 , 76 ,77 ,78 ) उसी प्रकार  (ऋग्विद 10 : 130 )  में  भी यही है और (अर्थवेद 11 : 3 :11 , 12 , 16 ) बात है की  धरती  बर्तन है सूर्य  ढकनी  , और आकाश चमचा है  और भी बहुत कुछ है।

* ये सब बाते  आपको आगे समझ में आएगी  ये सब ध्यान पुर्वक  समझे मुझे पता है कि कई लोगो के सिर के ऊपर से निकल रहा होगा पर बहुत ही आसान शब्दों में  बताने की कोशिश कर रहा हु ।

कल्प की गणना


* जो हिंदूइस्म के मानने वाले है उन्होंने कभी न कभी कल्प और ब्रह्मा दिवस के बारे में सुना ही होगा मुझे आशा है ,की आप इसके बारे में अवश्य जानते होगे  अगर न जानते है तो ध्यान पूर्वक सुने  और समझे ?






*  (अर्थवेद  8 : 2 : 21 ) इसी प्रकार से मनुस्मृति में भी काल गणन मोजूद है ।

* एक ब्रह्मा दिवस  में !

*  4 अरब 32 करोड़  मानव दिवस होते है ।
और उतनी ही रात्रि !

*  दिन      4 अरब  32 करोड़ 
  रात्रि     +  4  अरब  32 करोड़
---------------------------------------------------
                8 अरब 64 करोड़  = 1 कल्प 

* 1 कल्प में  = 8  अरब 64 करोड़  मानव दिवस ।

* जिसके बाद महाप्रलय  ।

* उसी प्रकार से  2 कल्प  के बाद फिर से  सुर्ष्टि की रचना का कार्य शुरू होता है जिसकी गणना इस तरीके से है यानी  ।

 8 अरब 64 करोड़
+ 8 अरब 64 करोड़ 
-----------------------------------------------------
17 अरब  28  करोड़ ( मानव दिवस )

* 2 कल्प की गणना है सही है या नही ?




* अब है एक प्रश्न उठता है ,की  महाप्रलय  के पश्चात  हर चीज़ और चोरों तरफ अंधकार और कुछ नही था  ऊपर विस्तापूर्वक बता चुका हूँ , तो ये 17अरब 28 करोड़ मानव दिवस का  अनुमान वैदिक ईश्वर  किस सूर्य से लगाता है ?

धन्यवाद


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Dayanand saraswati biography 5

दयानंद सरस्वती भांग और तंबाकू का सेवन


Dayanand saraswati biography

असल वजह 


* इससे पहले जितने लेखो में दयानन्द की विचित्र स्वभाव का वर्णन किया गया है उसी असली वजह क्या थी इस लेख में उसका सारा का सारा राज खुल जाएंगा आये देखते है । 

भांग , तंबाकु और दयानन्द 


* उसके बाद जिस वस्तु की खोज मै था  उसके अर्थ जानने की लिए आगे की और चल दिया और असूज सुदी  २ सवंत  १९१३ को दुर्गाकुण्ड के मंदिर पर चण्डलगढ़  में पहुँचा  , वह १० दिन बिताये यहाँ मैंने चावल खाना पूरी तरह से छोड़ दिया ( जो आपके शरीर की अवस्था को देख कर पता चलता है  ) और दूध पीकर जीवन व्यतीत करने लगा अधययन और अभ्यास पर ध्यान देता था । 

* वह मुझे भांग पिने की आदत हो गई सो कई बार उसके प्रभाव ( असर के चलते ) में सर्वथा बेसुध हो जाया करता  ( पूरी तरीके से नशे में रहता )  
एक दिन मंदिर से निकल कर चण्डलगढ़ के पास ही एक गाँव था वह एक पुराना साथी मिल गया गाँव  की दूसरी और कुछ ही दूर शिवालय था वहाँ  जाकर मैंने रात काटी रात के समय भांग से उत्पन मादकता 
( नशे  ) के कारण में सो गया था मेरे स्वप्न में देखा । 

* वह  ऐसा था की मैंने महादेव  और उनकी पत्नी पार्वती को देखा वे दोनों आपस में बात चित कर रहते थे , की " दयानन्द  " को अब शादी  
( विवाह ) कर लेनी चाहिए परन्तु  देवता उस चीज में भेट प्रकट कर रहे थे 
( क्योंकर भांग के बारे कहेंगे वे स्वतः उस चीजों का सेवन किया करते थे )
मैं नीद से जगा और वर्षा भी जोरदार हो रही थीं । 

*  मैने उस बरामदे में जो मंदिर का मुख्य द्वार के सामने आराम किया वह नंदी देवता की एक बहुत बड़ी मूर्ति खड़ी थी उस पर अपने वस्त्र और पुस्तके आदि मूर्ति के पीठ पर रख दिया हुए उसके पीछे बैठ गया सहसा नंदी मूर्ति के  अदंर लग रहा था  कि कोई मनुष्य उसके भीतर है  मैंने अपना हाथ उसकी ओर फैलाया उस की वजह से अंदर बैठा व्यक्ति भयभित  हो गया  और जल्दी से छलाँग मारी और बिजली की तरह से गांव की तरफ भाग गया । 

* तब उसके जाने पर मैँ  स्वतः मूर्ति के अंदर जा बैठा और कुछ की समय बाद वहाँ  पर एक बूढी स्त्री आई उस ने देवताओ की पूजा की ऐसी अवस्था में उसी के अंदर बैठा था  कुछ देर बाद वह मेरे पास आई मेरी पूजा की गूढ़ और दही आदी निकट रखके उसने कहाँ आप इससे कुछ ग्रहण करे और इसमें से कुछ खाये मैंने नशे के कारण सब चीज खाली दही क्यों की बहुत खट्टा था , जिससे भांग का नशा जाता राहा मुझे बहुत आराम प्रतीत हुआ । 

* तो ये हल था दयानन्द जी  का भांग पिते रहो और अवारो की तरह से घूमते रहो इस के चलते ही नशे की हालत में वेदो का भाष्य कर बैठे जो की ना  तो निरुक्त ना की  निघण्टु  से कही भी नहीं मेल खाता और  नाशे  में ही चूत्यार्थ  अंधकार  लिख डाली  और कुछ मुर्ख उससे सत्य मान  बैठे  अरे मूर्खो वे सब नशे में लिख कर चले गये  और तुम उसमे प्रकाश ढूंढ़ने चले 
आज भी वक्त है सुधर जाओ नहीं तो  मरने के बाद पछताना पढ़ेगा  जैसे दयानन्द पछता राहा हो गया जरा पूछना  मोक्ष मिला या नहीं  सब पोपलीला है ।

* अगर किसी को मेरी बातों से कष्ट पंहुचा हो तो  , रोज होता रहे । 




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Biography of dayanand saraswati 4

दयानन्द और पहाड़ियों का सफर 



Dayanand saraswati biography



* इस लेख के पहले दयानन्द  के बच्पन और  घर से भाग जाना  , अवरो की तरह से घूमना बता चुके हैं  आज देंखे की और क्या कारनामें करते है चलो आइये देखते है  .............

पहाड़ियों का सफर 



* उनसे अलग  होकर पुनः मैं  बद्रीनारायण को गया विद्वान रावलजी उस समय  उस मंदिर के मुख्य महंत  था  उसके साथ कही दिनों तक रहा फिर मैंने  पूछा की यहाँ पर कोई साधु योगी है या नहीं उन्होंने कहा नहीं परन्तु यहाँ पर कई आते है उस समय मैंने दृढ़ संकल्प किया की पर्वतो  ,पहाड़ो में किसी योगी पुरुष को अवश्य ढूंढ लूंगा। 

* फिर निकले सफर में  क्या पोपो है  ? सूर्योदय होते ही पर्वतो की और चल पढ़ा  और अलखांदा  नदी के तट  ( साहिल  ) पर जा पंहुचा।  उस नदी के बहते धरानुसार  पर्वतो की रह  में जंगलो की ओर बढ़ा पर्वत और सब रास्ते  हिम  ( बर्फ  ) से ढके थे और बहुत ज्यादा घनी बर्फ  उन रास्तो पर जमी हुई थी। 

*  अलखांदा नदी के स्त्रोत तक पंहुचा मुझको काफी कष्ट उठाना पढ़ा  ( क्योकर इसे काम करते थे  जिससे कष्ट हो ) पर जब वहाँ पंहुचा तो मै  सारी चीजों से अनजान था  , की चारो ओर ऊंचे - ऊंचे  पहाड़ और आगे रास्ता भी बंद था ।  कुछ समय पश्चात  वहाँ  उस जगह पर पहुंच गया जहाँ आगे कोई रास्ता ही नहीं बचा उस समय मै  विचार सोच में पढ़ गया  अब क्या करना चाहिए उसके बाद मैंने नदी पार करने का  इराधा किया , जो मैंने  अपने शरीर पर कपड़े पहने थे वे बिलकुल ही हलके और कम थे  ! 
 ( क्या लंगोट पर चल पढ़े थे  ? )    

* कुछ देर बाद ठण्ड और बढ़ चली जिसका सहन करना बड़ा ही मुश्किल था  भूख और प्यास भी काफी लगी थी जिसकी वजह से मैंने बर्फ खाना शुरू कर दिया  ( क्या मुर्ख व्यक्ति है  ये है समाज सुधारक  ) पर उस से मुझे कोई भी लाभ नहीं हुआ फ़ीर मैने  नदी में उतर कर उसे पार करने लगा कही -कही  नदी गहराई  १० हाथ  का कही ४ गज कही ५ गज और पूरी नदी बर्फ के छोटे छोटे टुकड़ो से भरी पढ़ी थी। 

* बर्फ के आड़े तिरछे टुकड़ो ने मेरे पाव घायल कर दिए थे पाव से खून बहने लगा था  बर्फ की ठंडक की वजह से पाव भी सुन्न हो गए थे  मुझे विचार आ रहा था की मैं नदी में ही दम तोड़ दूंगा किसी तरह से भाग दौड़  कर  नदी पार कर ली नदी के दूसरी तरफ जा कर मेरी कुछ ऐसी हालत  बनी जैसे  जीवित रहने के बाद भी मृत्य शव के  सामान । 

* तब मैंने अपने शरीरी के कपडे उतर कर पूर्णः नंग हो गया । क्या एक लंगोट पहनी थी वे भी उतार दी ।


Dayanand saraswati biography
दयानंद सरस्वती


* और उसको पाऊ ,जांघो  से लपेट दिया ऐसी हालत हो चुकी थी ,की ना तो हिल सकता था  ना  ही चल सकता था उस समय इतना असाहय था अगर किसी की  सहयता मिल जाये तो आगे की ओर चलू पर सहयता की कोई उम्मीद न थी मैंने चारो दिशाओ में देखा तो मुझे दो पहड़ि व्यक्ति नजर आये और वे लोग मेरे पास आये और कहाँ चलो हमारे घर हम तुम्हारी दवा करेंगे और खाने पिने को कुछ देंगे  पर मैंने मना कर दिया फिर वे लोग चल दिए उस समय मेरी अवस्था ऐसी थी कि हिल - ढुल ने से मर जाना बेहत्तर था । 

* जब मुझे शांति मिली तो थोड़े देर बाद मै फिर आगे की और बढ़ा  और पकस में ही बद्रीनारायण जा पहुँचा मुझे देख कर रावलजी और उनके साथी घबरा गए पूछने लगे तुम कहा थे ? ( रावलजी नशे की हालत निदियो में घूम फिर रहे थे और इनसे कोई दूसरी अपेक्षा रख सकते है आप ही बताये ?) फिर उन सब को पूरा किस्सा सुनाया फिर भोजन किया जिससे मुझ में फिर शक्ति आ गई । ( ओ हो सुपर मैन )

* फिर दूसरे दिन सूर्योदय के समय रावलजी से जाने की आज्ञा ली और अपनी यात्रा में लौटता हुआ रामपुर की और चल पड़ा चिल्का घाटी से उतर कर जल्द ही रामपुर पहुच गया वह पहुच कर मैंने प्रशिद्ध रामगिरि के स्थान पर निवास किया यह अति प्रशिद्ध व्यक्ति था  रातों में नही सोता था और रातों में ऊंची ऊंची आवाजो से चीखे मारता ( वाहहह दो एक जैसे आखिर कार मिल ही गये ) रातों को रोता और चीखे मारता
 ( एक को रात की तकफिल एक को दिन की बेचारे )

* फिर वहाँ से चल के काशीपुर गया वहा से द्रोणासागर जा पहुँचा वही मैने पूरा शरद ऋतु काटा अतः मुरादाबाद होते हुए सम्भल जा पहुँचा फिर में गंगा नदी के तट पर आ पहुँचा ( क्या हुआ नशेड़ी व्यक्ति क्योंकर इधर उधर दीवानों की तरह से घूमता था 🤔 😏 ) कुछ पुस्तकें मेरे पास थी जो मैं गाड़ियों में पढ़ा करता  ऐसा लंबा चौड़ा विवरण था कि मेरी बुद्धि में कभी न ला सका नहीं समझ सका ।

( तुम्हे स्वयं की भाषा वाली पुस्तकें  मंदबुद्धि में नही घुस सकी तो क़ुरआन तो दूर दूर तक तेरे दिमाग से बाहेर की है क्यों कि क़ुरान अक्ल मंदो के लिए है नाकि मूर्खो के लिए । )

दयानंद और हत्या


* एक दिन देव संयोग से एक शव ( लाश ) मुझे पानी मे बहता हुआ दिखा तब समुचित अवसर प्राप्त हुआ कि मै उसकी जांच करू और अपने मन में उन पुस्तकों के बारे में विचार उत्पन्न हो चुके थे ( वेद आदि ) उनका फैसला करता हु की वे सत्य है या असत्य ?

* जो भी ग्रन्थ मेरे पास थे सब मेरे  पास रख कर नदी में कूद लगा दी और जल्दी से शव के पास पहुंचा कर शव को जैसे तैसे नदी के तट पर ले आया , फिर एक नुकीले चाकू से उसके अंग काटना शुरू कर दिया काट पिट के उसका दिल निकाल के उसकी पूरी तरीके से जाँच की उसी प्रकार सिर आदि अंग काट काट के पृथक पृथक रख दिये  जितने ग्रन्थ थे उसमे जो लिखा था उसके आधार पर हर एक एक अंग की जांच की परतु बिल्कुल उसके विपरीत दिखा जितने ग्रन्थ थे सबको फाड़ फाड़ के शव के साथ नदी में फेंक दिए 
 अब भी कुछ शंका रहती है ये व्यक्ति के पागल होने में 

* उसी समय से मैंने यह परिणाम निकलता गया कि वेद , उपिनिषद , पतज्जल  और सांख्यशास्त्र के अतिरिक्त अन्य सभी पुस्तकें जो ज्ञान विज्ञान  में लिखी गई है वे सब मिथ्या और झुटे है !
( ये क्या कह रहे हो दयानंद जी होश में तो हो.......)
ऐसी ही कुछ दिनों में  विचरते हुए फरुर्खाबाद पहुँचा उर श्रुगिरामपुर से हो कर छावनी की पूर्व दिशा वाली सड़क से कानपुर जाने वाला था सवंत 1912 
( 1855 ईसवी ) विक्रम समाप्त हुआ उसके अगले 5 माह कानपुर और अन्य प्रशिद्ध स्थान देखे ।

* तो ये थे दयानंद जी अभी कोई शक रह जाता है इनका दीवाना होने में , एक दीवाना किस्सम का इन्शान था , जो आवरो कि तरह से घूमते फिरते थे , कभी बर्फ के  पहाड़ो में चले जा रहे है कही बर्फीली नदी में कूद रहे है कही लाश का पोस्टमार्टम कर रहे है कभी अपने ग्रन्थों को ही मिथ्या और झुट कह रहे है आखिर ये सब करने की वजह क्या है , वो अगले लेख में उसका राज खुलेगा ...................................


  1. दयानन्द जी का बच्चपन
  2. दयानन्द जी का घर से भाग जान
  3. मांसाहार और दयानंद बियोग्रफी 3
  4. सभी जानाकारी


धन्यवाद





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Biography of dayanand saraswati 3

हिन्दुइस्म का इतिहास 


Dayanand saraswati biography


 ये लेख से पहले दयानन्द सरस्वती के बच्चपन  और घर से भाग जाने का किस्सा बताया गया है अब देखते है उसके आगे अगर आप ने ना देखा हो तो यहाँ दोनों लेख पढ़ लीजिये जिसके पश्चात आपको आगे का किस्सा स्पष्ट रूप से समझ आ जाएगा ।

मांस ,मघ और हिन्दू ग्रंथ 


* फिर वहा ( हरिद्वार  ) से एक ब्रह्मचारी और दो पहाड़ी साधु मेरे साथ आये ,वहा बहुत साधु और  पंडितो का समगान हुआ वहाँ  एक पंडित ने मुझे और ब्रह्मचारी को अपने घर में भोजन के लिए निमंत्रण 
( दावत ) दिया।  समय होने पर एक व्यक्ति बुलाने आ गया तब मै और ब्रह्मचारी उसके घर भोजन करने को गए। 

* जब उसके घर  के दरवाजे में घुसे तो देखा की एक ब्रह्मण मांस को काट रहता था  उसको देख कर अंदर की ओर गया तब बहुत से पंडित को एक कमरे के अंदर  बैठे देखा और वहाँ बकरे का मांस ,चमड़ा और सिर रखा था  उसको देख के पीछे की ओर लौटा। 

*  ( सत्य वचन मांस खाना और चीजे हिन्दुइस्म का एक अटूट अंग है जिस के बारे में मनु आदि ग्रन्थ से भी प्रमाण मिलता है  परन्तु पशु हत्या ना करे ऐसा मंत्र जैन मत से लिया गया था  नहीं तो इतिहास साक्षी है इन बातों का की ऋषिमुनि आदि बलि प्रथा और मांस सेवन किया करते थे जो आज भी करते नजर आते है  बरहाल पूरी जानकारी के लिए ये प्रमाण और  गुरु जी को जरूर सुने 👇 ) 





Dayanand saraswati biography
मनु ५ अधय्या 

Dayanand saraswati biography
मनु ५ अधय्या

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ऋग्वेद  १ : १६२ : १३ 



* पंडित आते देख के बोला की आईये बैठिये तब मैंने उत्तर दिया आप अपना काम करे  ( किसी से बात करने का अंदाज  संस्कार दीखता है बातों से  ) बहार की और जाता हु ऐसा कह कर वापस लौट आया पर फिर से पंडित बुलाने आ गया हमने  कहाँ की आप हमें सूखा अन्न  भिजवा दीजिये हम स्वतः पका लेंगे
 ( परन्तु एक शंका है  ,की मांस पान करने वालो के हाथो से और उसके घर का सूखा अन्न की आज्ञा कौन देता है।  ) 

* परन्तु पंडित बोला ये सब पदार्थ आप के लिए ही पकाया गया था पर मैने उसे मना कर दिया  फिर उसने सूखा अन्न भेजवा दिया फिर वहाँ कुछ दिन रुक कर पंडितो से पूछा यहाँ कोई धर्म ग्रन्थ मिलेंगा उन्हें में देखना चाहता हु तब उन्होंने कहा की है व्यकरण  ,काव्य , कोष  , ज्योतिष और तंत्र - मन्त्र बहुत मिलते है । ( हा , अथर्ववेद  काले  जादू के लिए प्रशिद्ध है जिसका एक उद्धरण लेते चलते है  ) 



Dayanand saraswati biography
अथर्ववेद   १० : ३ : १४ 

* तब मैने कहा की मै तंत्र मन्त्र की पुस्तक को देखना चाहता हु उन्होंने मुझे वो ग्रंथ दे दिया उसमे लिखाता था की माता ,कन्या ,भगिनी , चमारी ,चंडली  ,आदि से संभोग करना चाहिए  ( जो की इतिहास से भी प्रमाणित है , की ये लोग करते थे  ) नग्गे होकर पूजा करना सत्य वचन जो की  मनुस्मुर्ती भी इसकी आज्ञा देती है ।  स्त्रियों से मैथुन करना इस पांच कामो से मुक्त होना चाहिए और वो ग्रंथो में क्या -क्या  है  यहाँ देख सकते है 👉👉   नंगा नाच



Dayanand saraswati biography
मनुस्मृति 11 : 201 


दयानन्द का सफर करना 


*  फिर वहां से श्री -नगर को जा कर केदार घाट के मंदिर में ठहरा और वहाँ भी तंत्र -मंत्र के ग्रन्थों को देखा और कई पंडितों से संवाद होता रहता इतने में एक गंगागिरी साधु जो कि पहाड़ो में ही रहते थे उनसे भेट हुई और योग विषय मे बात चीत हुई वे अच्छे साधु थे 




कई बार उससे बात चीत होती रहती थी , मैने उनसे पूछता वे उत्तर दिया करते थे , वो मुझ से पूछते मैं उत्तर दिया करता दोनों प्रसन्न हो कर 2 माह साथ रहे ।
( साथ रहे या साथ सोये , गुरुजी का विचार कुछ ठीक नही लग रहा है । )

* जब वर्षों ऋतु आई तब आगे रुद्र प्रयागादि देखता हुआ अगस्त मनु के स्थान पर पहुच कर उसके उत्तर पहाड़ पर एक शिवपुरी स्थान था , वहाँ 4 माह निवास करके पीछे उन साधुओ  और ब्रह्चारी को वहाँ छोड़कर  अकेला केदार की ओर चलता हुआ गुदा काशी  में पहुँचा ( क्यों गुरुजी  साधु और ब्रह्चरियो से मन भर गया और सही भी है कब रहते , तकलीफ होती होगी न , बरहाल समझदरों को इशारा काफी है  ) भीम गुफा देख कर थोड़े ही दिनों में केदार पहुच कर निवास किया ।

*  वहाँ कई एक साधु पण्डे और केदार के पुजारी
जड़म मत के थे उनसे मेलजोल हुआ फिर इच्छा हुई इन बर्फ के पहाड़ो में भी कुछ घूम के देखे की कोई साधु वगैरह रहता है या नही  ?

( दयानंद पागल सा प्रतीत होता है और पागलो की तरह से इधर उधर फिरता रहता था ) पर मार्ग (रास्ता ) कठिन था पर वहाँ जाने के बाद कोई न मिला ।
 ( अरे दीवाने क्योंकर कोई मिलेंगा तुझ जैसे  कोई थोड़ी  दीवाना है जो बर्फ में कोई रहे) 

* वहाँ 20 दिन रहकर पीछे की ऒर लौट गया फिर वहाँ से चलके तुड़नाप के पहाड़ पर चढ़ गया वहा पहुँच कर देखा कि बहुत मंदिर , पुजारी और मूर्तिया देख कर तीसरे दिन नीचे की और उतरा ( यही वजह थी कि दूसरे मत वालों के बारे मे अपनी मंधबुद्धि से लिख गये , इनका इलाज किसी हाकिम के पास करना बेहतर होता  , घूमघूम के बाहेर की हवा लग गई थी 😱 )

* वहा से दक्षिण -पच्छिम के बीच मे जाता हूआ मार्ग से चला आगे दूर जाके देखा तो जंगल और बहुत गहरा सूखा नाला था और उसमे रास्ता बंद था फिर वहाँ से  नीचे की और उतर कर वहाँ से नाले की दूसरी ऒर एक पहाड़ी थी पेड़ो , झाड़ियां आदि के सहारे चढ़ा जिसके फलस्वरूप शरीर के वस्त्र और शरीर काटो से फट गये और शरीरों पर भी कांटे चूब गए मुझे बहुत कष्ट हुआ ।


दयानंद सरस्वती man vs wild


* फिर उस पहाड़ी से उतर कर एक सड़क मिली और सूर्ययस्त भी हो गया था अंधेरा भी काफी ज्यादा था फिर सड़क पर चलते चलते एक जगह मिली वहाँ कुछ लोग थे उनसे पूछा ये सड़क कहा जाती है कहा कि ओखी मठ और रात भर वही रुक गया और दूसरे दिन सूर्य निकलते ही चल पढ़ा और ओखी मठ जा पहुंचा वहाँ बड़े बड़े पंडित , विद्वान थे जिन्होंने धर्म के नाम पर बड़े बड़े कारखाने खोले बैठे थे उन्होंने काहा हमारे चेले बन जाओ  ।

* पर मैने उनकी न मानी और जोशी मठ की ओर चला और वहाँ जाकर शास्त्री आदि संन्यासी से मिल कर ठहर गया । 


* ये थे समाज सुधारक  जो दीवानो की तरह से इधर उधर घूमते फिरते थे , आगे देखेंगे दयानंद सरस्वती और भांग का नशा करना और मूर्ति में छिप जाने का किस्सा  👉  आगे यहाँ देखे


  1. दयानन्द जी का बच्चपन
  2. दयानन्द जी का घर से भाग जान
  3. सभी जानाकारी

असली हिंदूइस्म  👇👇👇














  









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Niyog kya hai

नियोग विधि 




 नियोग क्या है ?


* आखिर नियोग क्या है ? ये बात पहले बता चुके है फिर भी संक्षेप परिभाषा समझना चाहते हो इतना ही काफी है  कोई विधवा स्त्री संतान ( बच्चे  ) की चाह रखती है तो वो अपने मरे हुए पति के छोटे भाई या बड़े भाई , किसी ब्रह्मण , साधु इत्यादि से मुँह काला करके बच्चा पैदा कर सकती है और एक वो जिसका पति नपुंसक हो उसकी औरत भी मुँह काला करा सकती है और साधरण भाषा में समझे तो ब्रह्मणो ने अपनी हवस पूरी करने के लिए ये प्रथा चलाई थी ।

* आज भी चल रही है जिसका उद्धरण आसाराम , रामरहीम और वर्तमान के समय ऐसी घटना सुनते और दीखाई देती है ऐसी नियोग की आज्ञा वैदिक ईश्वर २ पग पर चलने वाला मुर्ख मनुष्य जिसने वेदो को अपनी हवस और दुसरो का शोषण करने के लिए 3000 वर्ष पूर्व गढ़ी थी कुछ मुर्ख इसका पालन करते नजर आते है और उससे भी आसान शब्दों में समझा जाये तो नियोग यानि बलत्कार और वैश्या खाना से कुछ कम नहीं बरहाल आज नियोग की विधि क्या है ? ये जानेगे और नियोग  के बारे में जानना चाहते हो तो यहाँ देखे 👉  नियोग एक कलंक  अब देखते है आगे ......................................................


नियोग विधि 



 * हे स्त्री जीवित पति को लक्षय करके उठ खड़ी हो (यहा पर देवर,पंडित,ऋषि मुनि, इत्यदि की बात हो रही है।) मरे हुए पति के पास क्यों पड़ी है, आ हाथ ग्रहण करने वाले नियुक्त इस पति के साथ संतान जनने को लक्षय में रखकर संबंध कर।(नियोग कर) ( ऋग्वेद 10:18:8)






* जैसा कि पाण्डु राजा की स्त्री कुंती और माद्री आदि ने किया और जैसा व्यास जी ने  चित्राडद्र और विचित्रवीर्य के मारे जाने के बाद उन अपनी भाइयो की पत्नियों के साथ नियोग करके अम्बिका में धृतराष्ट्र और अम्बालिका में पाण्डु और दासी से विदुर की उत्पत्ति की ये सब नियोग से हुई संतान है इत्यादि बात इतिहास से प्रमाणित है । ( 4 समुल्लास  पेज नंबर 110 )

 " कालेSदाता पितावाच्यो वाच्यशचानुपयन  पतिः।  "

* अर्थात  : - विवाह की अवस्था ( १६ वर्ष या उसे भी काम )होने पर कन्या का विवाह न करने वाला पिता निंदनीय और दोषी होता है । 
 ( मनुस्मृति  ९ : ४ )


मनुस्मृति 9 : 90


मनुस्मृति 9 : 88




" नियोग के अनुसार उत्पन्न हुआ पुत्र पति का ही होता है ,नियोग में स्त्री के उत्त्पन हुआ पुत्र स्त्री का ही होता
है ।  ( मनुस्मृति  ९ : ३२ ,४९ , ५२   )







अर्थात  : -अगर पति नपुंसक है या बीमार है तो अपनी पत्नी को दूसरे मर्द से मुँह काला करा कर बच्चा पैदा करवा सकता है और उस से  जो बच्चा पैदा होगा वो असली पति यानि जो नपुंसक या बीमार ता उसका ही बच्चा माना जाएंगा जिसको हम लोगो आज की भाषा में हराम की ओलाद कहते है  जिससे कई बड़े बड़े  ऋषिमुनि पैदा हुई  जो ऊपर सत्यार्थ प्रकाश  का प्रमाण दिया गया है उसी प्रकार कोई विधवा अपनी हवस पूरी करके बच्चा पैदा करना  चाहती  तो वो भी किसी पुरुष के साथ मुँह काला करा के जो बच्चा पैदा होगा वो स्त्री का होगा बच्चा किसी का भी हो यहाँ पर ब्रह्मण और देवर आदि का काम तो हो गया। 

* स्त्रियाँ खेती के समान है और पुरुष बीज के  
( मनुस्मृति  ९ : ३३  )



* अगर कोई विधवा हो और कोई रंडवा हो दोनों में समझौता हो जाये की बच्चा दोनों का होगा तो दोनों का माना जाएंगा ( मनुस्मृति  ९ : ५३   )



रात में सैया दिन में भैया 


* अब देखे अश्लीलता की हद पार कर दी है  रात में नियोग नाम पर व्यभिचार और बलात्कार और दिन में भाभी और बहू ।

देवर की परिभाषा  ?

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिक नियोग विषय


* नियोग का काम जिससे लिया गया हो और विधवा का दूसरा पति देवर कहलाता है । 


निरुतकम 3 : 15

मनुस्मृति 9 अधयाय



* बड़ा भाई छोटे भाई की स्त्री के साथ और छोटा भाई बड़े भाई की स्त्री के साथ नियोग द्वारा विधिपूर्वक और संभोग करे  और नियोग के अलावा अपराधी माना गया है । ( मनुस्मृति 9 : 58 )

* रात में औरतों की अदला बदली करो दिन में देवर भाभी और अपराधी क्या मिथ्या है ।

* नियोग का काम हो जाने के बाद देवर और भाभी , बड़ा भाई पुत्रवधु के समान व्यवहार करें ।

( मनुस्मृति 9 : 62 , 63 )



नियोग में 11पति और 10बच्चे पैदा की आज्ञा

* नियोग में एक स्त्री 11 से काम ले सकती है ।







 अगर पति दूसरे देश जाए तो 


* अगर पती धर्म के काम से बाहर जाए तो 8 वर्ष तक उसकी प्रतीक्षा करे , और पढ़ने की वजह
( विद्या प्रप्ति ) के लिए बाहर गया होता 6 वर्ष प्रतीक्षा करे और कमाई के लिए गया है तो 3 वर्ष फिर ना आये तो नियोग से बच्चे पैदा करले  ( मनुस्मृति 9 : 75-76 )

 हिंदूइस्म और बहुविवाह


मनुस्मृति 9 : 80

* अगर स्त्री केवल पुत्री ही पुत्री जने तो दूसरा विवाह कर लेना चाहिए 👇👇👇



मनुस्मृति 9 : 81



मनुस्मृति 9 : 82

* तो ये थे बलात्कार और हराम की औलाद पैदा करने का तरीका अब मेरे प्यारे मूर्ख मित्रो को लगेंगा की मिलावटी मनु है जो कि ये बोलते नजर आते है क्यों कि इनको अपने इतिहास से नफरत है इनका धर्म 130 -140 साल पहले शुरू हुआ था अभी तक वही चल रहा है पहले न तो कोई मनु थी ना ही कोई वेद ,बरहाल इसलिए स्क्रीन शॉर्ट दिया है और हा घबराओ नही ये तुम्हारी खुद की घर की लिखी हुई मनु है इसलिए एक एक प्रमाण घर मे बैठ कर  स्वतः देख ले धन्यवाद ।


















































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Biography of dayanand saraswati 2




Dayanand saraswati ka

 ghar se bhag jana







दयानन्द  सरस्वती  का  घर से भाग जाना 


* इस से पहले दयानन्द जी के बचप्पन का किस्सा संक्षेप में वर्णन किया गया है अगर न देखा होतो यहाँ  देख सकते है  क्लीक देखे है आगे .....


* फिर निघण्टु निरुक्त  और पूर्व मीमांसा  आदि शास्त्रों के पढ़ने की इच्छा करके आंरभ करके पढ़ता रहा और कर्मकाण्ड विषय पढ़ता रहा मुझसे एक छोटी बहन फिर उससे छोटा भाई फिर एक भाई फिर एक बहन  कुल मिला कर  ४  भाई बहन  और में सबसे बड़ा था  मतलब २ भाई २ बहन  हुए थे  तब तक मेरी आयु १६ वर्ष थी पीछे मुझसे छोटी बहन १४ वर्ष की उसको हैजा ( Cholera ) हो गया एक रात्रि नाच गाना हो रहा था नौकर खबर दी की हैजा हुआ है तक तल्कालिन  हकिम बुलाया गया पर औषधि  मिल ने के बाद भी ४ घंटे में उसकी मौत हो गई । 

* सब लोग रोने लगे परन्तु मेरे  ह्रदय में ऐसा धक्का लगा मै  भी मर जाऊंगा सोच विचार में पढ़ गया  मुक्ति के लिए कुछ उपाय करना आवश्यक है  परन्तु ये बात मैंने अपने मन मे रखी किसी से कुछ भी न कहा ।

* इतने में 19 वर्ष की आयु हो गई तब तो मुझे प्रेम करने वाले चाचा थे उनकी भी मृत्यु हो गई मेरे ह्रदय में और भय आने लगा  ( फट गई ) ये बात तो मैंने माँ बाबा से तो नही की किंतु मित्र जनो के पास कहा कि ये संसार कुछ सब को मृत्यु अवश्य है ( गुरुजी आपको पता चला मौत क्या है मोक्ष मिला या नही 😂😂 )
मेरा मन गृहाश्रम ( घर संसार ) मे नही लग रहा बाबाजी जी को मुफ़्ती रोटी खानी थी इसलिए संन्यासी बनने का विचार मन मे आने लगा कोई की वहाँ भिक्षा से काम चल जाता है बाबाजी की जिम्मेदारी से भागना था भाई बन्दू में सबसे बड़े होने के बाद भी बरहाल आगे देखते है ये बात माँ पीता को बताई तो उन्होंने काहा इसका विवाह कर देना चाहिए ।

* जब मुझे मालूम हुआ कि 20 वर्ष में मेरा विवाह कर देंगे तब मित्रो से काहा की मेरे माता पिता को समझओ अभी विवाह न करे । तब उन्होंने जैसे तैसे 1 साल विवाह रोक दिया तब मैंने पिता जी से कहाँ की मुझे काशी में भेज दो व्याकरण आदि पढ़ आऊँ ( पिता जी  को पता था कि तुम्हारा शैतानी दिमाग मे क्या चल रहा है जिम्मेदरी से जान छुड़ाना चाहता है ) इसलिए कहाँ की कही नही जाना है जो पढ़ना है यही पढ़ो और अगले साल तेरा विवाह भी होगा लड़की वाले नही मानते और हमको अधिक पढ़ा कर क्या करना है ?
( लोगो को गुमराह और क्या ) जितना पढ़ लिया वही बहुत है फिर ( शैतानी दिमाग ने चाल चली ) पिता आदि से कहाँ की मैं पढ़कर आऊँ तो मेरा विवाह कर देना ।

*  तब माता भी विपरीत हो गई कि हम कही नही भेजते और अभी विवाह करेंगे तब मैंने चाहा अब सामने अच्छा नही फिर 3 कोश ग्राम में एक अच्छा पंडित था वहा जा कर पढ़ने लगा पर वहा जाकर की यही कहने लगा कि मुझे गृहाश्रम में मन नही लगता
( क्यों कि खाखा कर तोन जो निकल गई थी  तो काम काज काहाँ से होता भला दिमाग मे भिक्षा जो भरी थी जो मनु महाराज की आज्ञा है )


मनुस्मृति 6 : 43

मनुस्मृति 6 : 55

* फिर माता पिता ने मुझे बुलाकर विवाह की तैयारी कर दी तब तक मे 21 वर्ष का हो गया था । जब में ये समझ गया था कि अब ये मुझे विवाह करा कर छोड़ेगे 
फिर  सवंत 1903 ( 1846 ईस .वी सन ) के वर्ष घर छोड़ के शाम के समय मे भाग उठा ( अफसोस बेचारे माता पिता क्योंकर ऐसे संतान को जन्म दिया )


" धिक तँ सुतंय : पितृरिप्सीतार्य ,
क्षमोअपिसन्न  प्रतिपदयेद ,
जातने कीं तेन सुतेन कामं ,
पितुने चिंता ही  सतुधद्ररेदयः ।। "

अर्थात : - उस पुत्र को धिक्कार है , जो सामर्थ होते हुए भी पिता के मनोरथ को पूर्ण करने में उघत नही होता जो पिता की चिंता को दूर नही कर सकता उस पुत्र के जन्म में क्या प्रयोजन है ?
 ( क्या फायदा है ऐसे पुत्र का  )

* 4 -5 किलोमीटर एक गांव था वहाँ जा कर रात में रुक गया फिर दूसरे दिन शाम के समय वहाँ से निकल कर 15 किलोमीटर चला  बीच बीच मे नित्य चलने का आरंभ किया तीसरे दिन मैंने किसी व्यक्ति से सुना कि किसी का लड़का घर छोड़कर भाग गया है उसकी तलाश में पैदल और घोड़ सवार आये थे ।

* मेरे पास कुछ रुपये , अंगूठी और भूषण 
( लॉकेट वगैरा ) लुटेरों ने लूट लिया बेचारा 😂😂😂
फिर  वहाँ एक ब्रह्मचारी ( बलात्कारी ) मिला उसने कहा तुम ब्रह्चारी ( बलात्कारी ) बन जाओ
 ( बलात्कारी इस लिये नियोग में इनका उपयोग ज्यादा होता है 1st ऑप्शन ) उसने मुझे दीक्षा दी और नाम चैतन्य रखा और काषाय वस्त्र भी करा दिए ।



* जब मै वहा अहमदाबाद के पास कोठा गांगड जो कि एक छोटासा राज्य है वहाँ कोई जान पहचान का मिल गया तो उन्होंने पूछा तुम यहाँ क्या कर रहे हो और काहा जाना चाहते हो ( जहन्नुम में 😂 ) मैने कहा घर से आया हु देश भ्र्मण ( घूमना ) चाहता हु ( झुट वैदिक ईश्वर क्षमा भी नही करता पता है न ) उसने कहा कि तूने काषाय वस्त्र पहन कर घर छोड़ दिया है मैंने कहाँ की मैंने घर छोड़ दिया है ( क्यूंकि मुझसे काम काज न हो सकेगा 😎 ) फिर वहां से निकल कर  नीलकण्ड महादेव की ओर गया जहाँ कई स्वमी और ब्रह्मचारी 
(बलात्कारी ) थे उनके पास गया और उनसे सत्संग किया ।

* जो व्यक्ति मुझे मिला उसने पिता जी को पत्र लिखा कि मुझे तुम्हारा पुत्र मिला है और संन्यासी बन चुका है , तो पिता जी ने कुछ सिपाही लेकर वहाँ पहुचे और वहा खोज की मै पंडितों के बीच मे बैठा था वहा पहुँच के बोले तू हमारे परिवार में कलंक लगाने वाला पैदा हुआ है ( अंकल जी परिवार में नही पूरी मानव जाति पर कलंक है ये व्यक्ति  )  फिर झुट मैने कहाँ किसी आदमी के बहकावे में चला आया और मैने बहुत दुख पाया अब मैं घर आना चाहता हूँ । 

* परंतु आप आये यह अच्छा हुआ तो मै आपके साथ साथ घर चलूँगा तो भी क्रोध के मारे मेरे गेरू के रंगे कपड़े और एक तंबू को तोड़ फाड़ कर के फेक दिया और वहाँ भी बहुत खरी - खरी  सुनाई और बोले कि तू अपनी माँ की जान लेना चाहता है मैंने कहा अब में घर को चलूँगा ( जो व्यक्ति स्वयं के माता पिता का न हो सका वो किसका हो सकता है भला फिर शैतानी दिमाग चलने लगा ) उस पहर रात का समय था परंतु में भागने का उपाय देख रहा था ।  ( झुट वैदिक ईश्वर क्षमा भी नही करता पता है न ) 

* सो जब 3 रात के 3 बजे के पीछे  प्रहर  में लघुशंका ( पैशाब , पाखाना ) का बहाना बनाकर भाग गया और 1/2 किलोमीटर पर एक मंदिर था उसके ऊपरी भाग में एक गुफा  में पेड़ के सहारे चढ़ गया और पानी से भरा लोटा भर के छिप कर बैठ रहा , जब चार बजे का समय हुआ तब मैंने उन्ही सिपाहियों मे से मेरे बारे में पूछता सुना तब मैं और भी छुप गया ऊपर बैठा सुनता रहा ( वाहहह क्या कहानी बनाई है 👌👌 🚑 ) वे लोग ढूंढ के चले गये मैं उसी मंदिर के शिखर पर दिन भर बैठा रहा जब अंधेरा हुआ तब उस पर से उतरा , और किसी पूछकर 2 किलोमीटर पर एक गांव था उसमें रुक के अहमदाबाद होता हुआ बड़ोदरे शहर में आकर ठहरा ।

* फिर किसी दक्षिण पंडित से संन्यासी की दीक्षा ली
तब उन्होंने मान लिया और उसी ठिकाने तीसरे दिन संन्यास की दीक्षा दण्ड ग्रहण कराया और दयानंद सरस्वती नाम रखा ( तंबाकू , गांजा और हुक्का पीने वाले बाबाजी ) तो ये थी घर से भाग जाने का किस्सा तो सोचों मित्रो जो माता पिता के बारे जरा नही सोच सकता झुट की सीमा पार कर दी और ये दुनिया का कोनसा  धर्म है जो इसी शिक्षा देता है कि माँ बाप को छोड़ के ऐसा काम करो या ऐसी शिक्षा देता भी हो ये आप समझे  और  भी ऐसे किस्से आगे आते
 रहगे ........................ धन्यवाद 

दयानंद सरस्वती का बच्चपन


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