Ved aur Aatankwad

वेद और आतंकवाद




हिंदूइस्म


*  अहिंसा परमो धर्म के गुण गाने वाले कुछ लोग नजर आते है और आप लोगो ने भी कभी न कभी यह श्लोक सुना होगा  और ये भी सुना ही होगा कि  हिन्दूू  वो है जो एक चींटी को मारना भी पाप  समझता है वगैरह वगैरह  ये सुनने में कीतना भाता है , ऐसा प्रतीत होता है , की वाहह क्या शिक्षा है , पर सत्य तो बिल्कुल इसके विपरीत है ,प्यारे नादान कभी वेदों पर भी नजर डालता वाह तो अहिंसा शब्द छोड़ कर हर चीज़ है यानी हिंसा ही हिंसा ।

* ये भगवा आतंकवाद का 3 भाग हैं , इससे पहले भगवा आतंकवाद के दो भाग आ चुके है । जो यहाँ देख सकते है 👇👇👇👇




* और  समय - समय पर  कई भाग आते रहंगे इंशालल्लाह इसमे कोई शक नही की वेद आतंकवाद की शिक्षा देता है और अनार्य ( जो आर्य नही है ) लोगो को मारने , आर्थिक और मानशिक शोषण करने की
आज्ञा देता है  आये जानते है , वैदिक शिक्षा , भगवा आतंकवाद  के कुछ उदाहरण ०

भगवा आतंकवाद  ( वेद और आतंकवाद )


*  " त्वमसि सहमनोs............ हिष्महि "।। 5 ।।
 ( अथर्वेद 19 : 32 : 5 ) 

* अर्थात : - है वैदिक ईश्वर तू वश ( कब्जे ) में करने वाला है  और में भी बलवान ( ताकतवर) हु ,हम दोनों बलवान हो कर विरोधियों को हम वश में करे  !

* भावार्थ : -  वीर पुरुष वैदिक ईश्वर के साथ मिल के और सब साथियो को मिला कर शत्रुओं का नाश कर !

* Note : - शत्रु यानी हम जो वेदों की निंदा करे , वेद विरोध है और जो वेदों को नही मानते , जो अनार्य है वे सब इन के शत्रु ( दुश्मन ) है !

" सहस्व नो ............. में बहुनकृधी " ।। 6 ।।
 ( अथर्वेद 19 : 32 : 6 ) 

* अर्थात : - हे वैदिक ईश्वर हमारे शत्रुओं को हरा और
सेना चढ़ने वालो को हरा , सब दुष्ट ( अनार्य ) वालों को हरा मेरे लिए बहुत अच्छी शांति कर ।

* दयानंद सरस्वती अपनी किताब सत्यार्थ  प्रकाश के 14 समुल्लास में कहता है कि वो पालनहार कभी नही हो सकता जो मनुष्यों का शत्रु हो वही पालनहार का शत्रु भी हो क्यों कि पालनहार के नजदीक  सब एक से है  और पालनहार किसी को शत्रु नही रखता मतलब ऊपर☝️ मंत्रो के अनुसार जो आर्यो ( ब्रह्मणो ) के शत्रु है , वही वैदिक ईश्वर का भी शत्रु है और दोनों मिलकर दुसरो को मारने की भी शिक्षा दे रहे है , इसलिए वेदों का ईश्वर कभी पालनहार नही हो सकता दयानंद सरस्वती के अनुसार क्यों कि सच्चे पालनहार के ये गुण नही है , बरहाल आगे देखते है ?

*  " इमं बध्नामि..........हद : " ।। 1 ।। 
 ( अथर्वेद 19 : 28 : 1 )

* अर्थात : - तेरे जीव और तेज के लिए इस मनिरूप
( अति प्रशनशिय ) शत्रु को दबाने वाले और विरोधियों के दिल को तपाने वाले शत्रु विदारक लोगो को  में 
( वैदिक ईश्वर ) नियुक्त ( तैनात ) करता हु ।

* जो भी मोब लॉन्चिंग का असली गुनहगार वेदों का ईश्वर है , उसने ही ऐसी आज्ञा दी है , लोगो को शत्रु यानी हमे मारने की !

*  " द्विषतस्ताप्यंह्र्द.........संतापयन " ।। 2 ।।
 ( अथर्वेद 19 : 28 : 2 )

* अर्थात : - विरोधियों के ह्रदय को तपाता हुआ और शत्रुओ  के मन को तपाता हुआ ये सब दुष्ट (अनार्य )को ग्रीष्म  ऋतु ( summer ) के समान तपाता हुआ तो हो ।

* भावार्थ : - जिस तरह गर्मियों के मौसम में धूप हरि भरी घास को तपा कर सुखों देता है और नष्ट कर देता है उसी प्रकार से आर्य अपनी शत्रुओं ( अनार्य ) को सदा कष्ट देते रहे और उनको नाश कर । वाहह क्या शिक्षा है । 

* " घमईवाभीतपंदर्भ.......... बलम  "   
( अथर्वेद 19 : 28 : 3 )

* अर्थात  : - ये सेनापति  ( आर्य  ) ग्रीष्म  ( आग  )के समान  तपाता  हुआ  विरोधियो  को सन्ताप  ( दुख  , कष्ट , कलेश  ) देता हुआ  , तू दूसरे को नष्ट  करते हुए  इन्द्र  के समान  वेरियो  ( दुश्मनो  ) के तोड़  दे !

* भावार्थ  : -   दुश्मनो  को नष्ट  करके  हरा दे  !

" भिन्धिददर्भ  .........  पातय  " 
( अथर्वेद 19 : 28 : 4  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  
( अनार्य  ) विरोधियो  के दिल को  तोड़  दे उठता हुआ  भूमि की  त्वचा  के समाना  इन  शत्रुओ  के शिर को गिरा दे  !


Bhagwa Aatankwad


* आर्य  शत्रुओ  में  आपस में फुट  डालकर  घास  फुस  के  समान  नाश कर  ! ( वाह्ह  क्या बात है वेद छल  - कपट  और मक्कारी  भी सीखाता है  जिस के चलते  3 .5 % ब्रह्मण  दलितों को हिन्दू  शब्द  के जल में फसा  कर  मुस्लिमो  के खिलाफ  फुट डाल कर राज  करना चाहता  है  ये है वैदिक  शिक्षा  !

" भिन्धिद दर्भ  .........  मणे   "
 ( अथर्वेद 19 : 28 : 5 )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को तोड़  दे  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को तोड़  दे ! मेरे लिए  उनके  दिलो को  तोड़ दे  ! मेरे
लिए  दुश्मनो  को  तोड़ दे  ! 

* वैदिक  शिक्षा और ज्ञान -विज्ञानं वाह्ह दुसरो  के कंधे  पर  बन्दुक  रख  कर गोली  चलाओ  !


" छीन्धिद दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 28 : 6  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  छेद  डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को छेद  डाल ! मेरे लिए उनके  दिलो
को  छेद  डाल  ! मेरे लिए  दुश्मनो  को  छेद  डाल  ! 

" वृशच दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 28 : 7  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  काट डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को काट   डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को  काट  डाल  ! मेरे लिए  दुश्मनो  को  काट   डाल  ! 

" कृन्त  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 28 : 8   )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  कतर  डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को कतर  डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को  कतर  डाल  ! मेरे लिए  दुश्मनो  को  कतर  डाल  ! 

" पिंश  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 28 : 9  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  बोटी - बोटी  कर  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को  बोटी - बोटी  कर  ! मेरे लिए  उनके दिलो
को   बोटी - बोटी  कर मेरे लिए  दुश्मनो  को   बोटी - बोटी  कर  ! 

" विध्य  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 28 : १०  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को    , वेध  धसाना  , घायल  करना ) डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को  वेध  धसाना  , घायल  करना ) डाल  ! मेरे लिए  उनके दिलोको   वेध  ( धसाना   ,
घायल  करना ) डाल  ! मेरे लिए  दुश्मनो  को   वेध  धसाना  , घायल  करना ) डाल  !

" निक्ष   दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 1 )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  कोंच  डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को कोंच डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को कोंच  डाल  ! मेरे लिए  दुश्मनो  को  कोंच  डाल  ! 


"  तृनिधद्र  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 2 )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  चीर डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को चीर डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को चीर  डाल  ! मेरे लिए  दुश्मनो  को  चीर डाल  ! 

"  रुनिधद्र    दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 3  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  रोक दे ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को रोक दे रोक दे  ! मेरे लिए  उनके दिलो
को रोक दे   ! मेरे लिए  दुश्मनो  को  रोक दे   !
 ( डर  भी लगता  है , रोक दे   एक्शन  का रिएक्शन  तो होगा  )


"  मृण  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 4  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  मार डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को रोक दे मार डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को मार डाल  मेरे लिए  दुश्मनो  को  मार डाल  !


"  मन्थ  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 5 )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  मथ  डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को रोक दे मथ  डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को मथ  डाल  मेरे लिए  दुश्मनो  को  मथ  डाल  !

"  पिणिढड   दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 6 )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  पीस  डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को पीस  डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को पीस  डाल  मेरे लिए  दुश्मनो  को  पीस  डाल  !

"  ओष  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 7  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  जला  डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को रोक दे जला  डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को जला  डाल  मेरे लिए  दुश्मनो  को  जला  डाल  !

"  दह  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 8  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  दाह  ( जला दे , भस्म  कर दे ) ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को रोक दे दाह ( जला दे , भस्म  कर दे )  ! मेरे लिए  उनके दिलोको दाह ( जला दे , भस्म  कर दे )मेरे लिए  दुश्मनो  को  दाह  ( जला दे , भस्म  कर दे )  !

" जहि  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 9 )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  नाश  का दे  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को रोक दे नाश  का दे  ! मेरे लिए  उनके दिलो
को नाश  का दे  मेरे लिए  दुश्मनो  को  नाश  का दे  !

" त्वामा   .........  राक्षसी     "
( अथर्वेद 19 : 30 : 3 )

अर्थात : - हे दर्भ , तुमने विद्ववानों का कवच तुझे वेद का रक्षक  वे लोग कहते है , तुझे इंद्रा का कवच वे लोग कहते है , जो आर्यो की रक्षा करता है ।

*  24 आयत का सेट वालों  की आत्मा  शांति मिले  ये है  अहिंसा परमो धर्म का मिथ्या  है । 


Bhagwa aatankwad
मनुस्मृति 4 : 33

* अधार्मिक यानी हम लोगो से जो अनार्य है उन लोगो से मिल जोल न रखे , पराई स्त्री लिखा है पर नियोग चलता है ।


* अनार्य यानी जो आर्य नही है , मुस्लिम , ईसाई , जो जो धर्म वेदों नही मानते।


Bhagwa aatankwad
मनुस्मृति 1 : 130






* इस लेख का मकसद किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नही बल्कि उन इस्लाम विरोधीयो  को जवाब देना है  जो खुद की धार्मिक ग्रंथो की मान्यता को नही जानते और इस्लाम और मुसलमानों के ऊपर तानाकाशी करते है। अगर किसी को ठेस  पहुंची  होतो क्षमा चाहता  हु  !

धन्यवाद 








































































0 comments:

Veda bhashyakar

सायण भाष्य का महत्व सायणचार्य का जीवन परिचय * सायण ने अपनी रचनामे अपने जीवन चरित्र के विषय मे आवश्यक तथ्यों का निर्देश किय...