Indra devta

सोमरस


इन्द्र देव

इन्द्र देवता


जैसे कि आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती  ने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम  समुल्लास में लिखा है , की इन्द्र , शिव , विष्णु , गणपति आदि नाम वैदिक ईश्वर के ही है ! वैसे सब जानते है , की दयानन्द और आर्य समाजियों ने वेदों के अर्थ का अनर्थ कर दिया है  वेदो और पुराणों दोनों में सोमरस का जिक्र मिलता है , वेदों के अनुसार इन्द्र और पुराणों के अनुसार सभी  देवी देवता सोमरस का पान करते थे , सब जनाते है कि सोमरस क्या है ? परंतु इन्हें ये बात हजम नहीं हो रही थी कि सोमरस  यानी शराब  जिस के चलते इन लोगो ने उसका अर्थ महा औषधीय कर दिया क्या मिथ्या है , क्योंकि इन्हें अपनी शक्ल आईने में पसंद नही आ रही , बरहाल आज भी इनके बड़े बुढो को पूछा जाए कि दादा सोमरस यानी क्या वो कहते नजर आते है ,की  शराब और आज भी शिव के भक्त मजे से सोमरस का सेवन करते है , बरहाल आर्य समाजी और कई हिन्दू  अपनी धार्मिक पुस्तको  की नही मानते कहते है ये ऐसा नही वैसा आज तुम अपनी बातो को साबित करने की नाकाम कोशिश कर रहे हो , पर प्यारे इतिहास के पन्नो में तुम्हारा चिट्ठा बिट्ठा लिख चुका है और इतिहास गवाह है इन बातों का  और  यज्ञ के नाम पर क्या क्या होता था तुम खुद भली भांति जानते हो ।

* चलो एक क्षण के लिए मान ले की सोमरस यानी महाऔषधि होती है तो वह कहा मिलती है , तो पता चलता है , की वो अफगानिस्तान की पहाड़ियों पर मिलती है , जो की भारत का हिस्सा नही अगर ये दावा है , की वो अखंड भारत का हिस्सा है , तो मुगल आदि विदेशी कैसे हुए ,वो तो भारत वासी थे या फिर आर्य , ब्रह्मण और देवी - देवता विदेशी थे , ये आप समझे सब पोपलीला है ।

*  जैसे ऊपर बताया है कि इंद्र आदि वैदिक ईश्वर का नाम है , जिसके मुताबिक वैदिक ईश्वर शराब पीते थे ,
और  दूसरे भी उन्हें शराब पिलाते थे , इन्द्र की नशेड़ी होने के कुछ प्रमाण वे भी वेदों से , वैसे कई  बाते है परंतु कुछ ही प्रस्तुत करने की कोशिश करूँगा उससे  पहले यज्ञ में क्या क्या होता था यहाँ  नीचे देख सकते है ?  👉👉👉   ( नंगा नाच )


* जिस तरह दयानंद सरस्वती ने कहा है कि इंद्र आदि नाम वैदिक ईश्वर के ही है जिसके कई प्रमाण वेदों में भी है कि इन्द्र ही वैदिक ईश्वर है ये कुछ प्रमाण है 👇






सोमरस 


1 . " अयं  त  इन्द्र सोमो ............. द्रवा  पिब  
( अर्थववेद  २० : 5 : 5  )

* अर्थता  : - हे  इंद्र ( वैदिक ईश्वर  ) तेरे लिए यह छाना  हुआ  सोम ( शराब ) बढ़िया  आसन  के ऊपर है तू आ  अब  दौड़  और  इसका  पान  कर  ( पी  )  !

* वैदिक ईश्वर को पैर भी है दौड़ ने को  वाह्ह.................


2 . " शचीगों.................  हूयसे  "
( अर्थववेद  २० : 5 : 6 )


अर्थता  : - हे स्पष्ट वाणी वाले सत्कार  वाले  यह  सोमरस  ( शराब ) तेरे लिए  रण  ( युद्ध  ) जितने के लिए सिद्ध किया है  , हे शत्रु  के  तहस नहस  करने वाले  आवाहन ( बुलाया , पुकारा ) जाता है  ! 
 ( शराब  पीके  लड़ो  )


3 ." यस्ते ................. मनः  "
( अर्थववेद  २० : 5 : 7 )

अर्थता  : -  हे तेज की वृष्टि  ( पानी बरसाने वाले ) न  गिरने वाले  अतिशय  करके  न गिरने वाले  रक्षा  करने वाले  सोमरस  पिने का  व्यवहार ( काम में लाना, प्रयोग ) है  उसके मन को में धारण  करता हु  !

* मतलब  शराब पिने वालो को पसंद  करता है  !

4  ." आ  याहि  .................मम  "
( अर्थववेद  २० : 47 : 7 ) 

अर्थता  : -  हे  इंद्र तू आ क्योकि ,तेरे लिए  हमने सोमरस  ( शराब ) सिद्ध किया है  इस रस को पी  मेरे इस उत्तम  आसन पर बैठ  !

5 ." दधिषवा   .................इन्दवः  "
( अर्थववेद  २० : 6  : 5 )

अर्थता  : - हे इंद्र अड़ीकार करने योग्य है  सिद्ध किये हुए सोमरस  ( शराब ) को  पेट में धर व्यवहार ( काम में लाना, प्रयोग ) में रहने वाले  सब चीज तेरे लिए है  !

6  ." गिर्वण : ..............त्वदातामिदशः   "
( अर्थववेद  २० : 6  : 6  )

अर्थता  : हे वाणियो से  सेवन योग्य हमारे ऐश्वरयो की रक्षा कर मधुर रस की  धाराओं  ( शराब की नदिया  )करके प्राप्त किया जाता है , हे इंद्र  सब तेरा  ही दिया हुआ यश  ( एहसान , महिमा  )  है  ! 
( क्या बात है पियो और पिलाओ  )

7   ." अभी ........... वावृधे   "
( अर्थववेद  २० : 6  : 7 )

अर्थता  :- सेवक लोग न घटने वाले धनो  को देखकर  इंद्र से  मिलते है  सोमरस  ( शराब )पीकर बढ़ा  है  !

* वाह्ह  वाहह  क्या तरक्की  का साधन  है  !

8  ." ऋजीषी ...........मत्सदीइन्द्रः   "
( अर्थववेद  २० : 12 : 7 )

अर्थता  :- महाधनि  व्रजधारी  ( हाथो  में हथियारों पकड़ा  हुआ  ) बलवान हिंसक  शत्रुओ  का हारा ने  वाला बलवान सेना का राजा  दुश्मनो को  मारने  ने वाला  सोमपावा  { सोम ( शराब ) का पिने वाला  } इंद्र  दो घोड़ो  से जोत  कर सामने आवे  और मध्याह  में यज्ञ  के बीज  आनंद  पावे  !

* वैदिक ईश्वर ( इंद्र  )शरीर धारी भी है  जो की ऊपर वाले मंत्रो से स्पष्ट  हो रहा है  और आगे भी देखेंगे  शरीर धारी  होंने के प्रमाण  ?

9   ." उत्ती  ..........सुतम    "
( अर्थववेद  २० : 42 : ३  )

अर्थता  :- हे इंद्र पराक्रम  के साथ  उठते  हुए  तूने  सिद्ध किया हुआ सोम ( शराब )पीकर  दोनों  जबड़ो  को हिलाया है !

Vedraj indra


10 ." दाना .......... स्योजसा   "
( अर्थववेद  २० : 53 : 2 ) 
 ( अर्थववेद  २० : 57 :12 ) 

अर्थता  :-जिस तरह से हाथी  मद के कारण बहुत प्रकार से झपट  लगाता  है वैसे ही तुझे कोई नहीं रोक सकता  रस  को  तू प्राप्त  कर  महान  हो कर तू बल के साथ  विचरता है  !

* जिस तरह  हाथी  के सोबत  के  दिन आते है  तो उसके कान के  से मद  बहता है जिस के  कारण  वो बे काबू  हो  जाता  सब चीज तहस नहस  कर देता  है उसी प्रकार से  सोमरस पिने के बाद  पागलो की तरह से  हरकते  करो ! सब पोपलीला  है  !

11  ." समी  .......... स्मृतिभिः   "
( अर्थववेद  २० : 54 : 2 ) 

अर्थता  :- पुकारने वाले प्रजागण सोम ( शराब ) के पिने  के लिए जब  इंद्र  को मिलकर पुकारने लगे  बढ़ती  के लिए  नियम  धारण  करने वाला  सब मिल कर पुकारने लगे ! वाह रे  शराबियो  की टोली  खुद  भी पियो  और इंद्र  को  भी पिलाओ  वाह्ह  वैदिक  ईश्वर वाह्ह  क्या लीला  है  !

वैदिक  ईश्वर शरीरधारी  


Vedraj indra


*  हे बृहस्पति और इंद्र आनंद देने वाले बलवान विरो को निवास कराने वाले तुम दोनों सोमरस को इस यज्ञ में पीओ । ( अर्थववेद 20 : 13 : 1 )

* आगे बढ़ो और  आकाश में आओ जाओ तुम्हारे लिए स्थान बनाया गया है  (अर्थववेद 20 : 13 : 2 )

* ☝️ उड़ने वाले घोड़े से आकाश में आते जाते थे  🤔 कभी घोड़ा कभी हाथी क्या तमाशा लगा रखा है वैदिक ईश्वर ने ?

* इन्द्र के दो हाथ है जो अवसर आने पर उसका उपयोग करता है ।  (अर्थववेद 19 : 13 : 1 )

* हे इन्द्र  धन के लिए जोड़े  गये  सुंदर केशो ( बाल )
वाले रथ चलने वाले दो घोड़े  तुझको सब ओर ले चले 
 (अर्थववेद 20 : 38 : 2 )  (अर्थववेद 20 : 47 : 28 )

* व्रजधारी ( हाथों में हथियार वाला ) तेजोमय इन्द्र ही हवा नित्य मिले हुए दोनों संयोग वियोग गुणों का मिलाने वाला है और वचन का योग्य बनाने वाला है ।  
(अर्थववेद 20 : 38 : 5 )

* क्या पोपलीला है वैदिक ईश्वर कभी  घोड़े पर सवारी कभी
कभी व्रजधारी क्या मिथ्या है निराकार की 🙄

*  और कई सौ उदहारण है शरीर धारी होने के परंतु अक्ल मंदो के लिए इतना काफी है वैदिक ईश्वर ( इन्द्र ) नशेड़ी होने के साथ साथ बलात्कारी भी था 👇👇👇👇




* तो ये थे वैदिक ईश्वर के शरीर धारी और नशेडी होने के कुछ प्रमाण क्या बात है ये तो चंद ही है नही तो वेद अश्लीलता और ऐसी बातों से भरा पड़ा है । चलो एक क्षण के लिए मान लिया कि सोमरस का मतलब ओषधि है , पर ये तो सिद्ध हुआ कि वैदिक ईश्वर  शरीरधारी है और वेदों का बनावटी ईश्वर निराकार नही बल्कि दो पैरो पर चलने कोई मूर्ख मनुष्य है जिसने अपने स्वार्थ के लिए वेदों की रचना की थी , नियोग के नाम पर अपनी हवस पूरी करना अपने आपको श्रष्ट बनाने के लिए  शुद्र आदि के नाम देना और बहुत कुछ केवल अपने मतलब के लिए 😢




प्रथम समुल्लास

प्रथम समुल्लास

* इस लेख का मकसद किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नही बल्कि उन इस्लाम विरोधीयो  को जवाब देना है  जो खुद की धार्मिक ग्रंथो की मान्यता को नही जानते और इस्लाम और मुसलमानों के ऊपर तानाकाशी करते है। अगर किसी को ठेस  पहुंची  होतो क्षमा चाहता  हु  !

धन्यवाद

























































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Ved aur Aatankwad

वेद और आतंकवाद




हिंदूइस्म


*  अहिंसा परमो धर्म के गुण गाने वाले कुछ लोग नजर आते है और आप लोगो ने भी कभी न कभी यह श्लोक सुना होगा  और ये भी सुना ही होगा कि  हिन्दूू  वो है जो एक चींटी को मारना भी पाप  समझता है वगैरह वगैरह  ये सुनने में कीतना भाता है , ऐसा प्रतीत होता है , की वाहह क्या शिक्षा है , पर सत्य तो बिल्कुल इसके विपरीत है ,प्यारे नादान कभी वेदों पर भी नजर डालता वाह तो अहिंसा शब्द छोड़ कर हर चीज़ है यानी हिंसा ही हिंसा ।

* ये भगवा आतंकवाद का 3 भाग हैं , इससे पहले भगवा आतंकवाद के दो भाग आ चुके है । जो यहाँ देख सकते है 👇👇👇👇




* और  समय - समय पर  कई भाग आते रहंगे इंशालल्लाह इसमे कोई शक नही की वेद आतंकवाद की शिक्षा देता है और अनार्य ( जो आर्य नही है ) लोगो को मारने , आर्थिक और मानशिक शोषण करने की
आज्ञा देता है  आये जानते है , वैदिक शिक्षा , भगवा आतंकवाद  के कुछ उदाहरण ०

भगवा आतंकवाद  ( वेद और आतंकवाद )


*  " त्वमसि सहमनोs............ हिष्महि "।। 5 ।।
 ( अथर्वेद 19 : 32 : 5 ) 

* अर्थात : - है वैदिक ईश्वर तू वश ( कब्जे ) में करने वाला है  और में भी बलवान ( ताकतवर) हु ,हम दोनों बलवान हो कर विरोधियों को हम वश में करे  !

* भावार्थ : -  वीर पुरुष वैदिक ईश्वर के साथ मिल के और सब साथियो को मिला कर शत्रुओं का नाश कर !

* Note : - शत्रु यानी हम जो वेदों की निंदा करे , वेद विरोध है और जो वेदों को नही मानते , जो अनार्य है वे सब इन के शत्रु ( दुश्मन ) है !

" सहस्व नो ............. में बहुनकृधी " ।। 6 ।।
 ( अथर्वेद 19 : 32 : 6 ) 

* अर्थात : - हे वैदिक ईश्वर हमारे शत्रुओं को हरा और
सेना चढ़ने वालो को हरा , सब दुष्ट ( अनार्य ) वालों को हरा मेरे लिए बहुत अच्छी शांति कर ।

* दयानंद सरस्वती अपनी किताब सत्यार्थ  प्रकाश के 14 समुल्लास में कहता है कि वो पालनहार कभी नही हो सकता जो मनुष्यों का शत्रु हो वही पालनहार का शत्रु भी हो क्यों कि पालनहार के नजदीक  सब एक से है  और पालनहार किसी को शत्रु नही रखता मतलब ऊपर☝️ मंत्रो के अनुसार जो आर्यो ( ब्रह्मणो ) के शत्रु है , वही वैदिक ईश्वर का भी शत्रु है और दोनों मिलकर दुसरो को मारने की भी शिक्षा दे रहे है , इसलिए वेदों का ईश्वर कभी पालनहार नही हो सकता दयानंद सरस्वती के अनुसार क्यों कि सच्चे पालनहार के ये गुण नही है , बरहाल आगे देखते है ?

*  " इमं बध्नामि..........हद : " ।। 1 ।। 
 ( अथर्वेद 19 : 28 : 1 )

* अर्थात : - तेरे जीव और तेज के लिए इस मनिरूप
( अति प्रशनशिय ) शत्रु को दबाने वाले और विरोधियों के दिल को तपाने वाले शत्रु विदारक लोगो को  में 
( वैदिक ईश्वर ) नियुक्त ( तैनात ) करता हु ।

* जो भी मोब लॉन्चिंग का असली गुनहगार वेदों का ईश्वर है , उसने ही ऐसी आज्ञा दी है , लोगो को शत्रु यानी हमे मारने की !

*  " द्विषतस्ताप्यंह्र्द.........संतापयन " ।। 2 ।।
 ( अथर्वेद 19 : 28 : 2 )

* अर्थात : - विरोधियों के ह्रदय को तपाता हुआ और शत्रुओ  के मन को तपाता हुआ ये सब दुष्ट (अनार्य )को ग्रीष्म  ऋतु ( summer ) के समान तपाता हुआ तो हो ।

* भावार्थ : - जिस तरह गर्मियों के मौसम में धूप हरि भरी घास को तपा कर सुखों देता है और नष्ट कर देता है उसी प्रकार से आर्य अपनी शत्रुओं ( अनार्य ) को सदा कष्ट देते रहे और उनको नाश कर । वाहह क्या शिक्षा है । 

* " घमईवाभीतपंदर्भ.......... बलम  "   
( अथर्वेद 19 : 28 : 3 )

* अर्थात  : - ये सेनापति  ( आर्य  ) ग्रीष्म  ( आग  )के समान  तपाता  हुआ  विरोधियो  को सन्ताप  ( दुख  , कष्ट , कलेश  ) देता हुआ  , तू दूसरे को नष्ट  करते हुए  इन्द्र  के समान  वेरियो  ( दुश्मनो  ) के तोड़  दे !

* भावार्थ  : -   दुश्मनो  को नष्ट  करके  हरा दे  !

" भिन्धिददर्भ  .........  पातय  " 
( अथर्वेद 19 : 28 : 4  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  
( अनार्य  ) विरोधियो  के दिल को  तोड़  दे उठता हुआ  भूमि की  त्वचा  के समाना  इन  शत्रुओ  के शिर को गिरा दे  !


Bhagwa Aatankwad


* आर्य  शत्रुओ  में  आपस में फुट  डालकर  घास  फुस  के  समान  नाश कर  ! ( वाह्ह  क्या बात है वेद छल  - कपट  और मक्कारी  भी सीखाता है  जिस के चलते  3 .5 % ब्रह्मण  दलितों को हिन्दू  शब्द  के जल में फसा  कर  मुस्लिमो  के खिलाफ  फुट डाल कर राज  करना चाहता  है  ये है वैदिक  शिक्षा  !

" भिन्धिद दर्भ  .........  मणे   "
 ( अथर्वेद 19 : 28 : 5 )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को तोड़  दे  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को तोड़  दे ! मेरे लिए  उनके  दिलो को  तोड़ दे  ! मेरे
लिए  दुश्मनो  को  तोड़ दे  ! 

* वैदिक  शिक्षा और ज्ञान -विज्ञानं वाह्ह दुसरो  के कंधे  पर  बन्दुक  रख  कर गोली  चलाओ  !


" छीन्धिद दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 28 : 6  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  छेद  डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को छेद  डाल ! मेरे लिए उनके  दिलो
को  छेद  डाल  ! मेरे लिए  दुश्मनो  को  छेद  डाल  ! 

" वृशच दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 28 : 7  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  काट डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को काट   डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को  काट  डाल  ! मेरे लिए  दुश्मनो  को  काट   डाल  ! 

" कृन्त  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 28 : 8   )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  कतर  डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को कतर  डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को  कतर  डाल  ! मेरे लिए  दुश्मनो  को  कतर  डाल  ! 

" पिंश  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 28 : 9  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  बोटी - बोटी  कर  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को  बोटी - बोटी  कर  ! मेरे लिए  उनके दिलो
को   बोटी - बोटी  कर मेरे लिए  दुश्मनो  को   बोटी - बोटी  कर  ! 

" विध्य  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 28 : १०  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को    , वेध  धसाना  , घायल  करना ) डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को  वेध  धसाना  , घायल  करना ) डाल  ! मेरे लिए  उनके दिलोको   वेध  ( धसाना   ,
घायल  करना ) डाल  ! मेरे लिए  दुश्मनो  को   वेध  धसाना  , घायल  करना ) डाल  !

" निक्ष   दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 1 )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  कोंच  डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को कोंच डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को कोंच  डाल  ! मेरे लिए  दुश्मनो  को  कोंच  डाल  ! 


"  तृनिधद्र  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 2 )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  चीर डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को चीर डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को चीर  डाल  ! मेरे लिए  दुश्मनो  को  चीर डाल  ! 

"  रुनिधद्र    दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 3  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  रोक दे ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को रोक दे रोक दे  ! मेरे लिए  उनके दिलो
को रोक दे   ! मेरे लिए  दुश्मनो  को  रोक दे   !
 ( डर  भी लगता  है , रोक दे   एक्शन  का रिएक्शन  तो होगा  )


"  मृण  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 4  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  मार डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को रोक दे मार डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को मार डाल  मेरे लिए  दुश्मनो  को  मार डाल  !


"  मन्थ  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 5 )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  मथ  डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को रोक दे मथ  डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को मथ  डाल  मेरे लिए  दुश्मनो  को  मथ  डाल  !

"  पिणिढड   दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 6 )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  पीस  डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को पीस  डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को पीस  डाल  मेरे लिए  दुश्मनो  को  पीस  डाल  !

"  ओष  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 7  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  जला  डाल  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को रोक दे जला  डाल ! मेरे लिए  उनके दिलो
को जला  डाल  मेरे लिए  दुश्मनो  को  जला  डाल  !

"  दह  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 8  )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  दाह  ( जला दे , भस्म  कर दे ) ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को रोक दे दाह ( जला दे , भस्म  कर दे )  ! मेरे लिए  उनके दिलोको दाह ( जला दे , भस्म  कर दे )मेरे लिए  दुश्मनो  को  दाह  ( जला दे , भस्म  कर दे )  !

" जहि  दर्भ  .........  मणे   "
( अथर्वेद 19 : 29 : 9 )

* अर्थात  : - हे  दर्भ  ( सेनापति  आर्य  )  दुश्मनो  को  नाश  का दे  ! मेरे लिए  सेना  चढाने  वालो को रोक दे नाश  का दे  ! मेरे लिए  उनके दिलो
को नाश  का दे  मेरे लिए  दुश्मनो  को  नाश  का दे  !

" त्वामा   .........  राक्षसी     "
( अथर्वेद 19 : 30 : 3 )

अर्थात : - हे दर्भ , तुमने विद्ववानों का कवच तुझे वेद का रक्षक  वे लोग कहते है , तुझे इंद्रा का कवच वे लोग कहते है , जो आर्यो की रक्षा करता है ।

*  24 आयत का सेट वालों  की आत्मा  शांति मिले  ये है  अहिंसा परमो धर्म का मिथ्या  है । 


Bhagwa aatankwad
मनुस्मृति 4 : 33

* अधार्मिक यानी हम लोगो से जो अनार्य है उन लोगो से मिल जोल न रखे , पराई स्त्री लिखा है पर नियोग चलता है ।


* अनार्य यानी जो आर्य नही है , मुस्लिम , ईसाई , जो जो धर्म वेदों नही मानते।


Bhagwa aatankwad
मनुस्मृति 1 : 130






* इस लेख का मकसद किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नही बल्कि उन इस्लाम विरोधीयो  को जवाब देना है  जो खुद की धार्मिक ग्रंथो की मान्यता को नही जानते और इस्लाम और मुसलमानों के ऊपर तानाकाशी करते है। अगर किसी को ठेस  पहुंची  होतो क्षमा चाहता  हु  !

धन्यवाद 








































































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Vedic ishwar

वैदिक ईश्वर 



Vedic ishwar


वैदिक ईश्वर  कौन  है  ?


* वेदो  का  ईश्वर  वेदो  में क्या कहता  है  ? ये जानने  की  कोशिश  करते है  और सृष्टि  की रचना  किस  तरह  हुई  इत्यादि  जानते है  आये देखते है ,वेदो का ज्ञान विज्ञानं क्या कहते है ? की वेदो को  खुद  वैदिक  ईश्वर  ने बनाया  है ये मेरा  दावा  नहीं बल्कि वेदो  का और  दयानंद  चरस्वति  अरे माफ़ करना  सरस्वती वो  दयानन्द  जी तबाकू  आदि का सेवन  करते थे  इसलिए  चरस्वति  लिख  दिया  क्षमा  चाहता हु  !


वैदिक  ईश्वर ने  क्या पता वेदो को  कैसे दिया होगा वो चार ऋषिमुनियो को  दयानन्द  की विश्व  प्रशिद्ध  पुस्तक  चूत्यार्थ  प्रकाश  अरे फिर  सत्यार्थ  प्रकाश  वैसे  वह पुस्तक  में  सत्य  छोड़ कर  हर चीज  है और  प्रकाश  शब्द  नाम  मात्र है  और अँधेरा  ही  अँधेरा  है  बरहाल  उसमे में दयानद  लिखता  है की जिस तरह से  कोई  शिष्य  को  गुरु  की  आवशकता  होती है  ज्ञान प्राप्त  करने के लिए  उसी  प्रकार  से जो चार  ऋषिमुनियों  को  वेद  प्राप्त  होए  उन्हें  भी तो  गुरु  की आवशकता  थी  जिस तरह से कोई गुरु अपने  शिष्य  को पढता  है उसी प्रकार वैदिक ईश्वर  ने  उन  चारो  को पढ़ाया  और  पूछा जाये  वैदिक  ईश्वर तो  निराकार कर है तो मुँह  से कैसे पढ़ाया होगा ?  कहते दिल में बैठाल  दिया  तो फिर मुर्ख आदमी  ऐसा  क्यों  कर  कहा की जैसे  कोई गुरु पढता है उसी तरह  गुरु तो हाथ  से लिख  कर और मुँह से बोल कर समझता है  और पढ़ता है  वाह क्या कहने  बरहाल आज का मुद्दा  कुछ और है  इन शार्ट  बात करते है  तो जवाब देते है की वो  सर्वशक्तिमान  है उसके  के लिए  कोई काम क्यों कर मुश्किल हो भला  !


* और जब ये जवाब हम देते है , तो  कहते तर्क पर बैठना  चाहिए ये काहानी  है मूर्खो  की  बरहाल कोई नहीं  आर्य  समाजी और वैदिको  के दिमाग में गोबर भरा  है जिसके चलते  जब भी मुँह खोलते है बदबू ही आती है  यानि मन्दबुद्धि सवाल करते है  जिनकी  डिसनरी  में  २ + २ = 5  होते है उनके बारे क्या कहा जाये  और जब हम सवाल पूछते है तो  कहते  है , की  उसका ज्ञान हमें नहीं जिसका उद्धरण  महाप्रलय की तारिख  कहते है पता नहीं  , वो चार ऋषिमुनि  फिर धरती पर कब  पुनर्जन्म लेंगे  और कहा  और एक  लंबी लिस्ट हैं सवालो  की ये  क्या इनके बाप दाद भी  हमारे सवालो के  जवाब नहीं दे सकते और तर्क  की बात  करते है मुर्ख  और अपने  समय पर सर्वशक्तिमान  का गुण गाते  नजर आते है अरे मूर्खो  तुम्हारा  दवा है की तुम  और वेद शाश्वत  हो  यानि कल भी थे आज भी है  और रहेंगे  दुनिया की उत्पत्ति  के शुरुवात में  वेद ही था और तुम्ही थे आएसा  तुम्हारा  दावा है तो सवाल किस्से होगा जो पहले आया या फिर बाद में तुम्हारे अनुसार और इस्लाम कब से है  कई  आर्टिकल  में बता चूका हु  और खुद ३००० साल  पूराने हो और लाखो  साल पहले की बात कर रहे हो  बरहाल बात काफी लंबी  होते जा रही है  आज का मुद्दा कुछ और ही है  , आज देखेंगे की  वेदो के अनुसार  वैदिक ईश्वर की पूरी  कहानी  ? 

सृष्टि  की रचना 


*  सबसे  पहले देखते है की सृष्टि उत्पन्न  होने से पहले क्या था ?





*  सुर्ष्टि की उत्पत्ति  के से पूर्व न अभाव वा असत्ता होता  और  न व्यक्त जगत रहता है , न लोक रहता और न अंतरिक्ष रहता है , जो आकाश से  ऊपर निचे लोक - लोकान्तर  है , वे भी नही रहते , क्या किसको घेरता वा आवरत करता है , सब कुछ कुहरान्धकार 
 ( पूरा अंधकार होता है ) के गृह आवरण में रहता है , गहन गहरा क्योंकि रह सकता है ।
 ( ऋग्वेद 10 : 129 : 1)






* उस अवस्था में  न तो  मृत्यो रहती न ही काल व्यहार , न ही रात - दिन  का चिन्ह का नही रहता  । 

( ऋग्वेद 10 : 129 : 2 )




 मनुस्मृति
 मनुस्मृति    १  : ५ 


* तो ये सब था और चारो  तरफ कुलंध्कार  था तो  वैदिक ईश्वर क्या कर  रहा था ?



* " नुनं तदस्य  काव्यो ..........अर्धे विषिते सस्न्नू । "
( अर्थर्वेद ४ : १ : ६  )


* अर्थात : - वैदिक  ईश्वर  प्रलय  की  अवस्था  में सोता सा था फिर उसने सबको  रच दिया। 



वैदिक  ईश्वर
मनुस्मुर्ती १ : ७४ 



* महाराजा सो रहे थे जब आँखे खुली तो देखा मैं  तो सो रहा था और जब सो कर  उठे तो सोच रहे थे क्या करो तो ये किया ?



* " व्रात्य ...........  समरयत।"  ( अर्थवेद १५ : १ : १ )

  अर्थात : - पहले वो अकेला  था  !




* " स प्रजापति........... जनयत ! "
  ( अर्थवेद १५ : १ : २  )


 अर्थात  : - उसने अपने देखा  और सोच कर प्रकट किया !



* " तदेकम  ................... प्रजायत "  
( अर्थवेद १५ : १ : ३  )

अर्थात  : - और जो भी प्रकृति के कण सूक्षम अवस्था में थे उसमे घुस गया



*  " स उदतिष्ठत्स प्राची दिशमणु व्य चलत " 
 ( अर्थवेद १५ : २  : १  )

 अर्थात  : - घुसने के बाद खड़ा हुआ  और पूर्व  दिशा  की और चला। 

निराकार को खड़े  होने के लिए पैर  किसने प्रदान किये  ? क्या उससे भी  पहले और कोई था जिसने पैर दिए ?



*  " तं बृहच्च ........... देवा अनुव्य चलन।"   
( अर्थवेद १५ : २  : २ )  


 अर्थात  : - और वैदिक ईश्वर के पीछे  आकाश  , सूर्य आदि  पीछे पीछे  चले। 



* और घोड़े और बेल की सवारी पर बैठ कर  वहा थोड़ा बहुत रच ( कुछ बना ) दिया। 
  ( अर्थवेद १५ : २  : ३,४ ,५,६,७ ,८ )



" स उदतिष्ठत्स दक्षिणा दिशमणु व्य चलत "  
( अर्थवेद १५ : २  : ९   )


अर्थात : - फिर वाह  से खड़ा  हुआ और दक्षिण दिशा की और चला !

* पूर्व पच्चिम आदि दिशा  का अंदाज  कहा से लगाया होगा अंतरिक्ष  में ना तो  कोई ऊपर निचे ना  ही कोई दिशा  होती है पता नहीं  कोनसा विज्ञानं  है वेदो मेंआगे देखते  है ?



* " तं यज्ञायज्ञीय च  वामदेव्य ......... चलन।
  ( अर्थवेद १५ : २  : १० )


 अर्थात : - यज्ञ और वामवेद  ,यजमान यज्ञ करने  वाला और सब जिव जन्तु उसके साथ पीछे पीछे हो चले। 



* फिर घोड़े और बेल की सवारी पर बैठ कर  वह थोड़ा बहुत रच दिया।  ( अर्थवेद १५ : २  : १२ ,१३ ,१४, )




 " स उदतिष्ठत्स प्रतीची दिशमणु व्य चलत "  
( अर्थवेद १५ : २  : १५   )

अर्थात : - फिर वाह  से खड़ा  हुआ और पच्चिम  दिशा की और चला ?



* जिस तरह सूरज आदि साथ पीछे-पीछे उसी तरह से साथ ऋषि , विरुप , वेराज और कुछ लोग 
( मनुष्य  ) पीछे पीछे  चेले   ( अर्थवेद १५ : २  : १६ )



* फिर घोड़े और बेल की सवारी पर बैठ कर  वह थोड़ा बहुत रच दिया।  ( अर्थवेद १५ : २  : १८ ,१९ ,२० )



" स उदतिष्ठत्स उदीची दिशमणु व्य चलत "  
( अर्थवेद १५ : २  : २१ )

अर्थात : - फिर वाह  से खड़ा  हुआ और उत्तर  दिशा की और चला ?




* श्येत और नौधस और ७ ऋषि और थोड़े बहुत मनुष्य भी पीछे  पीछे हो चले  ( अर्थवेद १५ : २  : २२ )



* फिर घोड़े और बेल की सवारी पर बैठ कर  वह थोड़ा बहुत रच दिया।  ( अर्थवेद १५ : २  : २४ से २८  )



* ये देखो  वेदो का सर्वशक्तिमान  वैदिक  ईश्वर जो खुद जा जा कर बनाना रहा है ,इधर  उधर घूम रहा  है , सब पॉप लीला  है ये है ज्ञान विज्ञानं ?




ऋतुओ की रचना 



* " स संवत्सरमू ............. तिष्टसीती ! "  
( अर्थवेद १५ : ३  : १  )

अर्थात : - वह वैदिक  ईश्वर वर्ष भर तक ऊंचा  खड़ा रहा उससे  देवताओ  ने बोलो  क्यों अब तू खड़ा  है  !








* पुरे  साल  खड़े खड़े  पैर  दर्द न दिए ! लगता  है भूल गए थे  की अब क्या करना है  उसी के चकर  में खड़े थे फिर देवताओ  ने बताया की तू अब तक क्यों खड़ा  है  अब आगे  ..........




* " सो sss  ब्रिविदासन्दीं  में सं भरत्विति "    
( अर्थवेद १५ : ३  : २ )


अर्थात : -  वो वैदिक ईश्वर  बोला सिंहासन  ( बैठने  के लिए कुर्सी ) तू देवता धरो ! 




shihasan



* बहुत जरुरी  है जल्दी करो पैर दर्द  जो दे रहे होंगे और ये कैसा सर्वशक्तिमान  है जो अपने लिए  कुर्सी  को इंतजाम  नहीं कर सकता ? अफ़सोस यहाँ वैदिक  ईश्वर कम जोर निकला  जल्दी करो देवताओ  वर्ष भर से खड़े  थे कही बेहोश  हो के गिर न जाये ?




* " तस्मै  व्रात्ययासन्दी सम्भरन  "   
( अर्थवेद १५ : ३  : ३ )


अर्थात  : - देवताओ ने वैदिक ईश्वर के लिए सिंहासन मिलकर रखा !


* अच्छा हुआ रख दिया अब जल्दी से उनको  बैठा दो और जरा पानी वाणी पिलाओ प्यासे  होंगे वर्ष भर से खड़े  थे !



*  " तस्या ग्रीष्मश्च  वर्षांश्च दौ ! "   
 ( अर्थवेद १५ : ३  : ४ )


अर्थात : - वसंत ऋतू और घाम ऋतू उस कुर्सी के दो पैर  और वरसा , शरद ऋतू  दो पैर होये !

* क्या लीला है , वैदिक ईश्वर की A . C  और हीटर  दोनों के मजे पर ऐसी कुर्सी का अविष्कार किस वैज्ञानिक ने किया था सब पोपलीला है ?





वैदिक ईश्वर



वैदिक ईश्वर





 *  " वेद आस्तरण ब्रह्मापबहणम !  "    
( अर्थवेद १५ : ३  : ७  )


अर्थात : - धन ( हिरे , जवाहरत आदि ) सिंहासन का बिछौना  ( कुर्सी की गद्दी ) और अन्न ( खाने पिने की पिने कि चीजे  ) सिरना !


* क्या बता है ? पिछवाड़े के नीचे हिरे जवाहरात की गद्दीया है और पीछे टेका लगा कर फलो के मजे वाह्ह  क्या मजे है महाराजा के !


* " सामासाद उद्रीथो sssss  पश्रय: ! "  
 ( अर्थवेद १५ : ३  : ८ )


अर्थात : - सामवेद बैठने का स्थान और ओ३म सहारा था !


* सामवेद ऋषियों  को मिल गया था और इतनी पवित्र पुस्तक जगह मतलब सब सामवेद पर खड़े थे और ऑक्सीज़ंन के रूप में ओ३म का उच्चारण चालू  था वर्ष भर खड़े थे इसलिए घबराहट  चालू  होगी और हा सब हॉस्पिटलों से ऑक्सीज़ंन (  O 2  ) के सिलेंडर हटाकर टेप रिकॉर्डर में ओ३म लगा दो सब मरीज ठीक हो जायेंगे क्या मिथ्या है !

आखिरकार वैदिक ईश्वर 



* " तामासन्दी  व्रात्य  आरोंहत ! "   
 ( अर्थवेद १५ : ३  : ९ )


अर्थात : - उस सिंहासन  पर वैदिक ईश्वर चढ़ गया  !


* होओओओ  अच्छा हुआ चढ़  गए नहीं तो घबराहट के मारे  निचे गिर पढ़ते , पानी वाणी  पिलाओ और भूख  भी लगी होगी फलो  का जूस वगैरा  दो  चिकन की बूटी- वूटी अरे माफ़ करना  शाकाहारी होंगे  अगर मांस  खाया तो वैदिक ईश्वर  खुद  राक्षस  हो जायेंगे  कृपया  मत खिलाना  !


* " तस्य देवजना : परिष्ट्कंदा आसनतसंकल्पा: प्राहाय्या ३ विशवानी भूतान्युपसद : ! " 
 ( अर्थवेद १५ : ३  : १०  )


अर्थात  : - देवता  उसके सेवक ( नौकर ) और कुछ दूत ( सन्देश पहुंचने वाले ) बाकि उसके पास बैठ गए !


* वाह्ह बाबूजी  जी के पास नौकर  चाकर है क्या बात है , वर्ष भर से खड़े थे पैरो की मालिश वालिश  कर दो थोड़ा  आराम हो जाएंगे और बाकि उनके पास बेठ कर क्या कर  रहे हो अपने अपने काम में लगो घर में बच्चे रो रहे  होंगे  उन्हें  सम्भालो  नहीं तो रात की रोटी नहीं मिलने वाली !


Note : - ये लेख  सिर्फ उन भगवा आतंकवादी और आर्य समाजी के लिए है जो क़ुरान और अल्लाह की शान  में गुस्ताखियाँ  करते है सिर्फ उनके लिए नाकि पुरे हिन्दू  के लिए क्या करे  उनको उनकी भाषा  में जवाब न दिया जाये जब तक  उन्हें समझ मे नहीं आता इसलिए जो जैसी भाषा  समझता है उसे उसी भाषा  में समझाना  पढता है उन मूर्खो के चकर  में सब हिन्दू की धुलाई  हो जाती है , पर क्या करे मित्रो आर्य समझी  और  भगवा आतंकवादीयो  का इन्ही किताबो का दवा है , वेद और  ज्ञान विज्ञानं क्या मिथ्या 
( मजाक , झूट , बनावट , और सब कुछ )  है !



* इस लेख का मकसद किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नही बल्कि उन इस्लाम विरोधीयो  को जवाब देना है  जो खुद की धार्मिक ग्रंथो की मान्यता को नही जानते और इस्लाम और मुसलमानों के ऊपर तानाकाशी करते है। अगर किसी को ठेस  पहुंची  होतो क्षमा चाहता  हु  !

धन्यवाद 
























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