NABI IBRAHIM KON

PROPHET ABRAHAM 3 
नबी इब्राहीम 3




* हज़रत इब्राहिम अलेहसल्लाम  को तौहिद का पैगाम  फैलाने के लिए अरब की सरजमी के तरफ अपने  छोटे से बच्चे को और हज़रत हाजरा को ले कर रवाना होए । 

* और रास्ते पर  एक जगह  एक चटियल मैदान के पास पहुंचे थे , की हज़रत जिब्रिल  आ पहुचे  और कहा की अल्लाह का हुक्म है , आप ये दोनों माँ - बेटे को इसी जगह पर छोड़ कर वापिस लौट जाए ।

* जब हज़रत इब्राहीम ने हज़रत हाजरा को ये पैगाम बताया कि ऐसा अल्लाह का हुक्म है तो हज़रत हाजरा ने खुशी खुशी राजी हो गई 

* जब आप अकेली  वहाँ  रह गईं तो न वहाँ पर कोई  दूर दूर तक कोई आदमी ,घर , मकान ,पानी कुछ था खाली चोरों और रेत ही रेत की  आपने सब्र का दामन थामा और  हज़रत इब्राहीम ने उन्हें कुछ खजूरे और थोड़ा सा पानी दिया था उसी पर दिन किटने लगी ।

* और आप इब्राहिम ने जाते समय अल्लाह की बारगाह में गिड़गिड़ा कर दुआ की थी कि ये मेरे रब  इस जगह को जल्द आबाद कर देना  ।

* और कुछ दिनो बाद खजूरे और बचा हुआ पानी भी खत्म हो गया , और आप ईस्माइल को प्यास लगी और वे प्यास की शिदत से बिलक बिलक के तड़पने लगे , हज़रत हाजरा  को आपकी चिंता हुई  और उन्हें ये महसूस हुआ कि अगर इसे पानी नही मिला तो  इसके जान पर बन आ सकती है ।

* और पानी की खोज में  साफा पहाड़ी पर पहुची , और चोरों तरफ देखने लगी  एक जगह रोक गई और जब पानी न मिला , न कोई आबादी न थी तो , तो वहाँ से मरवा पहाड़ी की तरफ भागी  और प्यास -प्यास कहकर अल्लाह को पुकारती , और मरवा पहाड़ी पर भी जा कर आप रोक गई  और वह भी पानी का नामो निशान नजर न आया और फ़ौरन बच्चे का खयाल आया नीचे की और दौड़ी और देखा क्या हाल है वे प्यास की सिद्त से तड़प रहे थे फिर साफ़ा पहाड़ी की तरफ दौड़ लगाई , इसी तरह से साफा से मरवा पहाड़ी के 7 चकर लगाए पर पानी का  कोई निशान न था ।

* हर बार बच्चे के पास आ जाती  और उन्हें सीने से लगा कर दिलाशा देती  , हज़रत ईस्माइल प्यास की वजह से एडियां जमीन पर जोर जोर से रगड़ ते थे ।

* आखिर कर अल्लाह का एहसान हुआ और ईस्माइल के पैर मुबारक की बरकत से अल्लाह ने पानी का एक चश्मा जारी व सारी फ़रमा दिया । ( सुब्हान अल्लाह )


Jam jam


* हज़रत हाजरा  इस बीच पानी की खोज में इधर से उधर भागी फिर रही थी , और जब आप बच्चे के पास आई तो देखा कि एक पानी का चश्मा बहरा है , और अपने फ़रमा जमजम ( यानी रोक जा ) और अपने पहले हज़रत  ईस्माइल को पानी पिया और फिर खुद ने पानी पिया और अपने पानी के बर्तन 
भरने लगी ।

* उसी वक़्त ग़ैब से आवाज़ आई  कि ये अल्लाह की रहमत है , कभी  इसमे कमी नही आएंगी और इसका सिलसिला कभी खत्म न होगा । 

* और ये कयामत तक जारी व सारी रहेंगा , 
और ईस्माइल और इब्राहिम यहाँ पर खाने एं काबा की तामीर करेंगे , और पूरी दुनिया के ईमान वाले  यहा का हज करेंगे  ।

 * हज़रत हाजरा  इस बात को सुनकर अल्लाह का शुक्र अदा किया और खुसी से दिन बिताने लगी  और वहाँ से कुछ व्यपारी एक मुल्क से दूसरे मुल्क कारोबार करने की गरज से जाया करते थे , तो उन लोगो ने देखा कि वहाँ पर एक पाक खातून और एक छोटा सा बच्चा उनके पास है , और एक पानी का चश्मा जारी है ये मोजेजा देख कर सब वहा रोक गए और पूछने लगे आखिर क्या माजरा है ,अपने उन्हें पूरा किस्सा सुनाया और और उन लोगो ने पूरा वाकिया देख सुनकर वही रोक गए और वही बस गए और  वहा बस्तियां आबाद हो गई ।

* माशाल्लाह  ! अल्लाह को हज़रत हाजरा की दौड़ ने का अंदाज इतना पसंद आया कि अल्लाह ने ता कयामत  तक हज यात्रियों पर साफा और मरवा का चक्र लगाना वाजिब कर्रा कर दिया जब तक कोई व्यक्ति ये न करेंगा जब तक उसका हज नही हो सकता  ।

कयामत का दिन और हश्र का मैदान 


क्या मुसलमान काबे की पूजा करते है इस्लाम का  सच्च यहाँ देखे @

हज़रत ईस्माइल  की कुर्बानी और हज़रत इब्राहीम की आज़माइश ?

* यहा पहले में  हज़रत इस्लाइल का पूरा वाकिया बताने की कोशिश कर रहा हु फिर हज़रत इसहाक का बयान करेंगे इंशाल्लाह ।

* जब आप ईस्माइल  नोजवान होने की  कतार में थे , तो  अल्लाह ने आप इब्राहिम को हज़रत ईस्माइल से मिलने की इज्जत दी और आप बाप बेटे मिले ,  फिर एक दफा रात में खवाब  में दिखा की  आप इब्राहिम हज़रत इस्लाइल को जिब्ह कर रहे है , और नबी के ख्वाब सच्चे होते है , जो कि इस तरह  से है ? फिर अल्लाह ने क्या मर्तबा आता किया आपको सुब्हान अल्लाह  आये देखते है ।


فَلَمَّا بَلَغَ مَعَهُ ٱلسَّعْىَ قَالَ يَٰبُنَىَّ إِنِّىٓ أَرَىٰ فِى ٱلْمَنَامِ أَنِّىٓ أَذْبَحُكَ فَٱنظُرْ مَاذَا تَرَىٰ قَالَ يَٰٓأَبَتِ ٱفْعَلْ مَا تُؤْمَرُ سَتَجِدُنِىٓ إِن شَآءَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلصَّٰبِرِينَ

फिर जब इस्माईल अपने बाप के साथ दौड़ धूप करने लगा तो (एक दफा) इबराहीम ने कहा बेटा ख्वाब मैं (वही के ज़रिये क्या) देखता हूँ कि मैं तो खुद तुम्हें ज़िबाह कर रहा हूँ तो तुम भी ग़ौर करो तुम्हारी इसमें क्या राय है इसमाईल ने कहा अब्बा जान जो आपको हुक्म हुआ है उसको (बे तअम्मुल) कीजिए अगर खुदा ने चाहा तो मुझे आप सब्र करने वालों में से पाएगे ।


فَلَمَّآ أَسْلَمَا وَتَلَّهُۥ لِلْجَبِينِ
फिर जब दोनों ने ये ठान ली और बाप ने बेटे को (ज़िबाह करने के लिए) माथे के बल लिटाया ।


وَنَٰدَيْنَٰهُ أَن يَٰٓإِبْرَٰهِيمُ
और हमने (आमादा देखकर) आवाज़ दी ऐ इबराहीम ।


قَدْ صَدَّقْتَ ٱلرُّءْيَآ إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ
तुमने अपने ख्वाब को सच कर दिखाया अब तुम दोनों को बड़े मरतबे मिलेगें हम नेकी करने वालों को यूँ जज़ाए ख़ैर देते हैं ।



إِنَّ هَٰذَا لَهُوَ ٱلْبَلَٰٓؤُا۟ ٱلْمُبِينُ
इसमें शक नहीं कि ये यक़ीनी बड़ा सख्त और सरीही इम्तिहान था।


وَفَدَيْنَٰهُ بِذِبْحٍ عَظِيمٍ
और हमने इस्माईल का फ़िदया एक ज़िबाहे अज़ीम (बड़ी कुर्बानी) क़रार दिया ।




وَتَرَكْنَا عَلَيْهِ فِى ٱلْءَاخِرِينَ
और हमने उनका अच्छा चर्चा बाद को आने वालों में बाक़ी रखा है ।

سَلَٰمٌ عَلَىٰٓ إِبْرَٰهِيم
कि (सारी खुदायी में) इबराहीम पर सलाम (ही सलाम) हैं ।


كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ
हम यूँ नेकी करने वालों को जज़ाए ख़ैर देते हैं


إِنَّهُۥ مِنْ عِبَادِنَا ٱلْمُؤْمِنِينَ
बेशक इबराहीम हमारे (ख़ास) ईमानदार बन्दों में थे । ( 37 : 102 से 111 )

* जो कि आप इब्राहिम की सुन्नत अदा की जाती है , क़ुरबानी करके । 

मनुष्य  शाकाहारी है या मांसाहारी 
यहा देखे @


* आप इब्राहिम इस आजमाइश में भी सफल हो गए  और उसके बाद काबे खाने की तामीर का किस्सा जो कि इस तरह से है ।

* काबे खाने की तामीर का हुक्म 


قُلْ صَدَقَ ٱللَّهُ فَٱتَّبِعُوا۟ مِلَّةَ إِبْرَٰهِيمَ حَنِيفًا وَمَا كَانَ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ
(ऐ रसूल) कह दो कि ख़ुदा ने सच फ़रमाया तो अब तुम मिल्लते इबराहीम (इस्लाम) की पैरवी करो जो बातिल से कतरा के चलते थे और मुशरेकीन से न थे । ( 3 : 95 )


إِنَّ أَوَّلَ بَيْتٍ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذِى بِبَكَّةَ مُبَارَكًا وَهُدًى لِّلْعَٰلَمِينَ

लोगों (की इबादत) के वास्ते जो घर सबसे पहले बनाया गया वह तो यक़ीनन यही (काबा) है जो मक्के में है बड़ी (खैर व बरकत) वाला और सारे जहॉन के लोगों का रहनुमा । ( 3 : 96 )




अब देखते है आगे  हमारे प्यारे नबी  के लिए आप इब्राहिम और ईस्माइल की दुआ 

وَإِذِ ٱبْتَلَىٰٓ إِبْرَٰهِۦمَ رَبُّهُۥ بِكَلِمَٰتٍ فَأَتَمَّهُنَّ قَالَ إِنِّى جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا قَالَ وَمِن ذُرِّيَّتِى قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِى ٱلظَّٰلِمِينَ


 (ऐ रसूल) बनी इसराईल को वह वक्त भी याद दिलाओ जब इबराहीम को उनके परवरदिगार ने चन्द बातों में आज़माया और उन्होंने पूरा कर दिया तो खुदा ने फरमाया 
  मैं तुमको (लोगों का) पेशवा बनाने वाला हूँ (हज़रत इबराहीम ने) अर्ज़ की और मेरी औलाद में से फरमाया (हाँ मगर) मेरे इस अहद पर ज़ालिमों में से कोई शख्स फ़ायज़ नहीं हो सकता । (.2 : 124 )



وَإِذْ جَعَلْنَا ٱلْبَيْتَ مَثَابَةً لِّلنَّاسِ وَأَمْنًا وَٱتَّخِذُوا۟ مِن مَّقَامِ إِبْرَٰهِۦمَ مُصَلًّى وَعَهِدْنَآ إِلَىٰٓ إِبْرَٰهِۦمَ وَإِسْمَٰعِيلَ أَن طَهِّرَا بَيْتِىَ لِلطَّآئِفِينَ وَٱلْعَٰكِفِينَ وَٱلرُّكَّعِ ٱلسُّجُودِ


(ऐ रसूल वह वक्त भी याद दिलाओ) जब हमने ख़ानए काबा को लोगों के सवाब और पनाह की जगह क़रार दी और हुक्म दिया गया कि इबराहीम की (इस) जगह को नमाज़ की जगह बनाओ और इबराहीम व इसमाइल से अहद व पैमान लिया कि मेरे (उस) घर को तवाफ़ और एतक़ाफ़ और रूकू और सजदा करने वालों के वास्ते साफ सुथरा रखो ।
( 2 : 125 )


وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِۦمُ رَبِّ ٱجْعَلْ هَٰذَا بَلَدًا ءَامِنًا وَٱرْزُقْ أَهْلَهُۥ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ مَنْ ءَامَنَ مِنْهُم بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْءَاخِرِ قَالَ وَمَن كَفَرَ فَأُمَتِّعُهُۥ قَلِيلًا ثُمَّ أَضْطَرُّهُۥٓ إِلَىٰ عَذَابِ ٱلنَّارِ وَبِئْسَ ٱلْمَصِيرُ

और (ऐ रसूल वह वक्त भी याद दिलाओ) जब इबराहीम ने दुआ माँगी कि ऐ मेरे परवरदिगार इस (शहर) को पनाह व अमन का शहर बना, और उसके रहने वालों में से जो खुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान लाए उसको तरह-तरह के फल खाने को दें खुदा ने फरमाया (अच्छा मगर) वो कुफ्र इख़तेयार करेगा उसकी दुनिया में चन्द रोज़ 
(उन चीज़ो से) फायदा उठाने दूँगा फिर (आख़ेरत में) उसको मजबूर करके दोज़ख़ की तरफ खींच ले जाऊँगा और वह बहुत बुरा ठिकाना है।
( 2 :  126 )

وَإِذْ يَرْفَعُ إِبْرَٰهِۦمُ ٱلْقَوَاعِدَ مِنَ ٱلْبَيْتِ وَإِسْمَٰعِيلُ رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّآ إِنَّكَ أَنتَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ


और (वह वक्त याद दिलाओ) जब इबराहीम व इसमाईल ख़ानाए काबा की बुनियादें बुलन्द कर रहे थे (और दुआ) माँगते जाते थे कि ऐ हमारे परवरदिगार हमारी (ये ख़िदमत) कुबूल कर बेशक तू ही (दूआ का) सुनने वाला (और उसका) जानने वाला है ।
( 2 : 127 )








ऐ हमारे रब! हम दोनों को अपना आज्ञाकारी बना और हमारी संतान में से अपना एक आज्ञाकारी समुदाय बना; और हमें हमारे इबादत के तरीक़े बता और हमारी तौबा क़बूल कर। निस्संदेह तू तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है।( 2:128)


* ऐ हमारे रब! उनमें उन्हीं में से एक ऐसा रसूल उठा जो उन्हें तेरी आयतें सुनाए और उनको किताब और तत्वदर्शिता की शिक्षा दे और उन (की आत्मा) को विकसित करे। निस्संदेह तू प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है । (2:129)


हज  और क़ुरबानी  


और (ऐ रसूल वह वक्त याद करो) जब हमने इबराहीम के ज़रिये से इबरहीम के वास्ते ख़ानए काबा की जगह ज़ाहिर कर दी 
(और उनसे कहा कि) मेरा किसी चीज़ को शरीक न बनाना और मेरे घर को तवाफ और क़याम और रूकू सुजूद करने वालों के वास्ते साफ सुथरा रखना ( 22 : 26 )


और लोगों को हज की ख़बर कर दो कि लोग तुम्हारे पास (ज़ूक दर ज़ूक) ज्यादा और हर तरह की दुबली (सवारियों पर जो राह दूर दराज़ तय करके आयी होगी चढ़-चढ़ के) आ पहुँचेगें  । ( 22 : 27)



ताकि अपने (दुनिया व आखेरत के) फायदो पर फायज़ हों और खुदा ने जो जानवर चारपाए उन्हें अता फ़रमाए उनपर 
(ज़िबाह के वक्त) चन्द मुअय्युन दिनों में खुदा का नाम लें तो तुम लोग कुरबानी के गोश्त खुद भी खाओ और भूखे मोहताज को भी खिलाओ ।
 ( 22 :28 )



फिर लोगों को चाहिए कि अपनी-अपनी (बदन की) कसाफ़त दूर करें और अपनी नज़रें पूरी करें और क़दीम (इबादत) ख़ानए काबा का तवाफ करें यही हुक्म है ।
 ( 22: 29 )


और इसके अलावा जो शख्स खुदा की हुरमत वाली चीज़ों की ताज़ीम करेगा तो ये उसके पवरदिगार के यहाँ उसके हक़ में बेहतर है और उन जानवरों के अलावा जो तुमसे बयान किए जाँएगे कुल चारपाए तुम्हारे वास्ते हलाल किए गए तो तुम नापाक बुतों से बचे रहो और लग़ो बातें गाने वग़ैरह से बचे रहो ।
 ( 22 : 30 )


निरे खरे अल्लाह के होकर (रहो) उसका किसी को शरीक न बनाओ और जिस शख्स ने (किसी को) खुदा का शरीक बनाया तो गोया कि वह आसमान से गिर पड़ा फिर उसको (या तो दरमियान ही से) कोई
 (मुरदा ख्ववार) चिड़िया उचक ले गई या उसे हवा के झोंके ने बहुत दूर जा फेंका
 ( 22 :31 )



ये (याद रखो) और जिस शख्स ने खुदा की निशानियों की ताज़ीम की तो कुछ शक नहीं कि ये भी दिलों की परहेज़गारी से हासिल होती है । ( 22 :32 )


और इन चार पायों में एक मुअय्युन मुद्दत तक तुम्हार लिये बहुत से फायदें हैं फिर उनके ज़िबाह होने की जगह क़दीम (इबादत) ख़ानए काबा है  । ( 22 : 33 )


और हमने तो हर उम्मत के वास्ते क़ुरबानी का तरीक़ा मुक़र्रर कर दिया है ताकि जो मवेशी चारपाए खुदा ने उन्हें अता किए हैं उन पर (ज़िबाह के वक्त) ख़ुदा का नाम ले ग़रज़ तुम लोगों का माबूद (वही) यकता खुदा है तो उसी के फरमाबरदार बन जाओ । 
( 22 : 34 )


और (ऐ रसूल हमारे) गिड़गिड़ाने वाले बन्दों को (बेहश्त की) खुशख़बरी दे दो ये वह हैं कि जब (उनके सामने) खुदा का नाम लिया जाता है तो उनके दिल सहम जाते हैं और जब उनपर कोई मुसीबत आ पड़े तो सब्र करते हैं और नमाज़ पाबन्दी से अदा करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दे रखा है उसमें से (राहे खुदा में) ख़र्च करते हैं । ( 22 : 35 )


और कुरबानी (मोटे गदबदे) ऊँट भी हमने तुम्हारे वास्ते खुदा की निशानियों में से क़रार दिया है इसमें तुम्हारी बहुत सी भलाईयाँ हैं फिर उनका तांते का तांता बाँध कर ज़िबाह करो और उस वक्त उन पर खुदा का नाम लो फिर जब उनके दस्त व बाजू काटकर गिर पड़े तो उन्हीं से तुम खुद भी खाओ और केनाअत पेशा फक़ीरों और माँगने वाले मोहताजों (दोनों) को भी खिलाओ हमने यूँ इन जानवरों को तुम्हारा ताबेए कर दिया ताकि तुम शुक्रगुज़ार बनो । ( 22 : 36 )


खुदा तक न तो हरगिज़ उनके गोश्त ही पहुँचेगे और न खून मगर (हाँ) उस तक तुम्हारी परहेज़गारी अलबत्ता पहुँचेगी ख़ुदा ने जानवरों को (इसलिए) यूँ तुम्हारे क़ाबू में कर दिया है ताकि जिस तरह खुदा ने तुम्हें बनाया है उसी तरह उसकी बड़ाई करो ।
 ( 22 : 37 )

* क़ुरबानी का गोश्त  सिर्फ हमारे  फायदे के लिए है  । 


मनुष्य  शाकाहारी है या मांसाहारी 
* और जो जीवहत्या का गुण गाते है उनके लिए ये है !


* और अधिक जानकारी के लिए ये पुस्तक पढे की ऋषिमुनी और  सब मांस का सेवन करते थे ।



*  कहते है ना झुट कितना भी छुपा लो एक न एक दिन सामने आ ही जाता है  ,
इन महाशय को पूरा सुने ये क्या कहते 
है ।





* एक दफा इब्राहीम अलेहसल्लाम ने  अल्लाह से पूछा  या अल्लाह तू कयामत के रोज मुर्दे कैसे  जिलायेंगा  जो कुछ इस तरह से है ? 

* आप इब्राहिम अलेहसल्लाम  खेती  और  बकरियां चराने  का काम किया करते थे  । 
जो की हदीस शरीफ में आप नबी सल्लल्लाहु  अलैह वसल्लम फ़रमा की आदम से लेकर मुझतक ऐसा कोई नबी नही जिसने बकरी चरने  का काम न किया हो ।



وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِۦمُ رَبِّ أَرِنِى كَيْفَ تُحْىِ ٱلْمَوْتَىٰ قَالَ أَوَلَمْ تُؤْمِن قَالَ بَلَىٰ وَلَٰكِن لِّيَطْمَئِنَّ قَلْبِى قَالَ فَخُذْ أَرْبَعَةً مِّنَ ٱلطَّيْرِ فَصُرْهُنَّ إِلَيْكَ ثُمَّ ٱجْعَلْ عَلَىٰ كُلِّ جَبَلٍ مِّنْهُنَّ جُزْءًا ثُمَّ ٱدْعُهُنَّ يَأْتِينَكَ سَعْيًا وَٱعْلَمْ أَنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ


और (ऐ रसूल) वह वाकेया भी याद करो जब इबराहीम ने (खुदा से) दरख्वास्त की कि ऐ मेरे परवरदिगार तू मुझे भी तो दिखा दे कि तू मुर्दों को क्योंकर ज़िन्दा करता है ख़ुदा ने फ़रमाया क्या तुम्हें (इसका) यक़ीन नहीं इबराहीम ने अर्ज़ की (क्यों नहीं) यक़ीन तो है मगर ऑंख से देखना इसलिए चाहता हूं कि मेरे दिल को पूरा इत्मिनान हो जाए फ़रमाया (अगर ये चाहते हो) तो चार परिन्दे लो और उनको अपने पास मॅगवा लो और टुकड़े टुकड़े कर डालो फिर हर पहाड़ पर उनका एक एक टुकड़ा रख दो उसके बाद उनको बुलाओ (फिर देखो तो क्यों कर वह सब के सब तुम्हारे पास दौड़े हुए आते हैं और समझ रखो कि ख़ुदा बेशक ग़ालिब और हिकमत वाला है । ( 2 : 260 )



अब देखते है  हज़रत इसहाक  अलेहसल्लाम
का वाकिया 

* अल्हम्दुलिल्लाह इसमे पहले हज़रत इस्लाइल का बयान बताने की कोशिश की है जो आप इब्राहिम के बड़े बेटे थे  , जो हज़रत हाजरा से थे ,और हमारे  नबी मोहम्मद सलल्ललाहु  अलैहि वसल्लम बनू  ईस्माइल में से है ।

* जब अल्लाह की रजा पर जो राजी रहता है , तो अल्लाह तआला उसको अपनी नेअमतों से कितना नवाज़ था है  , जिस उदाहरण आप इब्राहीम है , अल्लाह की रजा पर राजी थे तो आप इब्राहिम को ओलाद की नेअमत से आपको नवाज़ और बुढापे की हालत में हज़रत सारा की गोद भी अल्लाह भर दी ।


وَٱمْرَأَتُهُۥ قَآئِمَةٌ فَضَحِكَتْ فَبَشَّرْنَٰهَا بِإِسْحَٰقَ وَمِن وَرَآءِ إِسْحَٰقَ يَعْقُوبَ

और इबराहीम की बीबी (सायरा) खड़ी हुई थी वह (ये ख़बर सुनकर) हॅस पड़ी तो हमने (उन्हेंफ़रिश्तों के ज़रिए से) इसहाक़ के पैदा होने की खुशख़बरी दी और इसहाक़ के बाद याक़ूब की । ( 11 : 71 )

قَالَتْ يَٰوَيْلَتَىٰٓ ءَأَلِدُ وَأَنَا۠ عَجُوزٌ وَهَٰذَا بَعْلِى شَيْخًا إِنَّ هَٰذَا لَشَىْءٌ عَجِيبٌ

वह कहने लगी ऐ है क्या अब मै बच्चा जनने बैठॅूगी मैं तो बुढ़िया हूँ और ये मेरे मियॉ भी बूढे है ये तो एक बड़ी ताज्जुब की बात है ।
( 11 : 72 )


قَالُوٓا۟ أَتَعْجَبِينَ مِنْ أَمْرِ ٱللَّهِ رَحْمَتُ ٱللَّهِ وَبَرَكَٰتُهُۥ عَلَيْكُمْ أَهْلَ ٱلْبَيْتِ إِنَّهُۥ حَمِيدٌ مَّجِيدٌ

वह फरिश्ते बोले  तुम ख़ुदा की कुदरत से ताज्जुब करती हो ऐ अहले बैत (नबूवत) तुम पर ख़ुदा की रहमत और उसकी बरकते (नाज़िल हो) इसमें शक़ नहीं कि वह क़ाबिल हम्द (वासना) बुज़ुर्ग हैं । ( 11 : 73 )


وَبَشَّرْنَٰهُ بِإِسْحَٰقَ نَبِيًّا مِّنَ ٱلصَّٰلِحِينَ


और हमने इबराहीम को इसहाक़
 (के पैदा होने की) खुशख़बरी दी थी ।
 ( 37 : 112 )


وَبَٰرَكْنَا عَلَيْهِ وَعَلَىٰٓ إِسْحَٰقَ وَمِن ذُرِّيَّتِهِمَا مُحْسِنٌ وَظَالِمٌ لِّنَفْسِهِۦ مُبِينٌ



जो एक नेकोसार नबी थे और हमने खुद इबराहीम पर और इसहाक़ पर अपनी बरकत नाज़िल की और इन दोनों की नस्ल में बाज़ तो नेकोकार और बाज़ (नाफरमानी करके) अपनी जान पर सरीही सितम ढ़ाने वाला ।

( 37 : 113 )



* पाक पालनहार ने आप इब्राहिम को  हज़रत इसहाक  आता किये और उनके बाद हज़रत याकूब  और जिनकी आल से बनी 

इस्राइल में नबी आये । 

बनी  इस्राइल कौन है  और यहूदी क्या है ?
यहा देखे @


* और आप  इब्राहीम पर ईमान  लाने वाले हजरत लूत अलेहसल्लाम थे जो पहले बता दिया गया है , और फिर अल्लाह ने हज़रत लूत  को भी नुबुव्वत आता कि और एक बस्ती की तरफ भेजा जो कि इतनी बदबाक लोग थे कि उनसे पहले वो काम किसी ने नही किया था , मूर्तियों की पूजा करते और मर्द और मर्द बद फैली का काम करते । 
( अल्लाह की पन्हा ) और उस कोम  पर अज़ाब और  हज़रत इब्राहीम का किस्सा कुछ इस तरह से है । 

فَلَمَّا ذَهَبَ عَنْ إِبْرَٰهِيمَ ٱلرَّوْعُ وَجَآءَتْهُ ٱلْبُشْرَىٰ يُجَٰدِلُنَا فِى قَوْمِ لُوطٍ

फिर जब इबराहीम (के दिल) से ख़ौफ जाता रहा और उनके पास (औलाद की) खुशख़बरी भी आ चुकी तो हम से क़ौमे लूत के बारे में झगड़ने लगे । ( 11 : 74 )

إِنَّ إِبْرَٰهِيمَ لَحَلِيمٌ أَوَّٰهٌ مُّنِيبٌ

बेशक इबराहीम बुर्दबार नरम दिल 
(हर बात में ख़ुदा की तरफ) रुजू (ध्यान) करने वाले थे ( 11 : 75 )


يَٰٓإِبْرَٰهِيمُ أَعْرِضْ عَنْ هَٰذَآ إِنَّهُۥ قَدْ جَآءَ أَمْرُ رَبِّكَ وَإِنَّهُمْ ءَاتِيهِمْ عَذَابٌ غَيْرُ مَرْدُودٍ


(हमने कहा) ऐ इबराहीम इस बात में हट मत करो (इस बार में) जो हुक्म तुम्हारे परवरदिगार का था वह क़तअन आ चुका और इसमें शक़ नहीं कि उन पर ऐसा अज़ाब आने वाले वाला है । ( 11 : 76 )


وَلَمَّا جَآءَتْ رُسُلُنَا لُوطًا سِىٓءَ بِهِمْ وَضَاقَ بِهِمْ ذَرْعًا وَقَالَ هَٰذَا يَوْمٌ عَصِيبٌ

जो किसी तरह टल नहीं सकता और जब हमारे भेजे हुए फरिश्ते (लड़को की सूरत में) लूत के पास आए तो उनके ख्याल से रजीदा हुए और उनके आने से तंग दिल हो गए और कहने लगे कि ये (आज का दिन) सख्त मुसीबत का दिन है । ( 11 : 77 )


وَجَآءَهُۥ قَوْمُهُۥ يُهْرَعُونَ إِلَيْهِ وَمِن قَبْلُ كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ٱلسَّيِّـَٔاتِ قَالَ يَٰقَوْمِ هَٰٓؤُلَآءِ بَنَاتِى هُنَّ أَطْهَرُ لَكُمْ فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَلَا تُخْزُونِ فِى ضَيْفِىٓ أَلَيْسَ مِنكُمْ رَجُلٌ رَّشِيدٌ

और उनकी क़ौम 
(लड़को की आवाज़ सुनकर बुरे इरादे से) उनके पास दौड़ती हुई आई और ये लोग उसके क़ब्ल भी बुरे काम किया करते थे लूत ने (जब उनको) आते देखा तो कहा ऐ मेरी क़ौम ये मारी क़ौम की बेटियाँ (मौजूद हैं) उनसे निकाह कर लो ये तुम्हारीे वास्ते जायज़ और ज्यादा साफ सुथरी हैं तो खुदा से डरो और मुझे मेरे मेहमान के बारे में रुसवा न करो क्या तुम में से कोई भी समझदार आदमी नहीं है । ( 11 : 78 )


قَالُوا۟ لَقَدْ عَلِمْتَ مَا لَنَا فِى بَنَاتِكَ مِنْ حَقٍّ وَإِنَّكَ لَتَعْلَمُ مَا نُرِيدُ

उन (कम्बख्तो) ने जवाब दिया तुम को खूब मालूम है कि तुम्हारी क़ौम की लड़कियों की हमें कुछ हाजत (जरूरत) नही है और जो बात हम चाहते है वह तो तुम ख़ूब जानते हो  ( 11 : 79 )


قَالَ لَوْ أَنَّ لِى بِكُمْ قُوَّةً أَوْ ءَاوِىٓ إِلَىٰ رُكْنٍ شَدِيدٍ

लूत ने कहा काश मुझमें तुम्हारे मुक़ाबले की कूवत होती या मै किसी मज़बूत क़िले मे पनाह ले सकता । ( 11 : 80 )


قَالُوا۟ يَٰلُوطُ إِنَّا رُسُلُ رَبِّكَ لَن يَصِلُوٓا۟ إِلَيْكَ فَأَسْرِ بِأَهْلِكَ بِقِطْعٍ مِّنَ ٱلَّيْلِ وَلَا يَلْتَفِتْ مِنكُمْ أَحَدٌ إِلَّا ٱمْرَأَتَكَ إِنَّهُۥ مُصِيبُهَا مَآ أَصَابَهُمْ إِنَّ مَوْعِدَهُمُ ٱلصُّبْحُ أَلَيْسَ ٱلصُّبْحُ بِقَرِيبٍ


वह फरिश्ते बोले ऐ लूत हम तुम्हारे परवरदिगार के भेजे हुए 
(फरिश्ते हैं तुम घबराओ नहीं) ये लोग तुम तक हरगिज़ (नहीं पहुँच सकते तो तुम कुछ रात रहे अपने लड़कों और  घर वालो समैत निकल जाओ और तुममें से कोई इधर मुड़ कर भी न देखे मगर तुम्हारी बीबी कि उस पर भी यक़ीनन वह अज़ाब नाज़िल होने वाला है जो उन लोगों पर नाज़िल होगा और उन 
(के अज़ाब का) वायदा बस सुबह है क्या सुबह क़रीब नहीं ।

( 11 : 81 )



فَلَمَّا جَآءَ أَمْرُنَا جَعَلْنَا عَٰلِيَهَا سَافِلَهَا وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهَا حِجَارَةً مِّن سِجِّيلٍ مَّنضُودٍ

फिर जब हमारा (अज़ाब का) हुक्म आ पहुँचा तो हमने (बस्ती की ज़मीन के तबके) उलट कर उसके ऊपर के हिस्से को नीचे का बना दिया और उस पर हमने खरन्जेदार पत्थर ताबड़ तोड़ बरसाए । ( 11 : 82 )

* मुनकिर खुदा का यही अंजाम होता है , पहले अल्लाह अपने नबियो के जरिये  से उन्हें समझता है , और न माने तो खूब ढील देता है फिर आखिरकार उनकी गुनाहों की सजा  अज़ाब देता है ।



* तर्जुमा :- यदि अल्लाह मानव के एक झुंड को  दूसरे  झुंड  के द्वारा हटाता नही रहता
धरती  बिगाड़ से भर जाती , किंतु अल्लाह 
संसारवालो  के  उदार के लिए है ।

( 2 : 251)

इस्लाम और जिहाद 



وَوَهَبْنَا لَهُۥٓ إِسْحَٰقَ وَيَعْقُوبَ وَجَعَلْنَا فِى ذُرِّيَّتِهِ ٱلنُّبُوَّةَ وَٱلْكِتَٰبَ وَءَاتَيْنَٰهُ أَجْرَهُۥ فِى ٱلدُّنْيَا وَإِنَّهُۥ فِى ٱلْءَاخِرَةِ لَمِنَ ٱلصَّٰلِحِينَ



इसमे शक नहीं कि वह ग़ालिब (और) हिकमत वाला है और हमने इबराहीम को इसहाक़ (सा बेटा) और याक़ूब (सा पोता) अता किया और उनकी नस्ल में पैग़म्बरी और किताब क़रार दी और हमने इबराहीम को दुनिया में भी अच्छा बदला अता किया और वह तो आख़ेरत में भी यक़ीनी नेको कारों से हैं । ( 29 : 27 )



हज़रत याकूब अलेहसल्लाम  ने अपने आखरी  वक़्त में  अपने बेटों से वादा ।



أَمْ كُنتُمْ شُهَدَآءَ إِذْ حَضَرَ يَعْقُوبَ ٱلْمَوْتُ إِذْ قَالَ لِبَنِيهِ مَا تَعْبُدُونَ مِنۢ بَعْدِى قَالُوا۟ نَعْبُدُ إِلَٰهَكَ وَإِلَٰهَ ءَابَآئِكَ إِبْرَٰهِۦمَ وَإِسْمَٰعِيلَ وَإِسْحَٰقَ إِلَٰهًا وَٰحِدًا وَنَحْنُ لَهُۥ مُسْلِمُونَ


(ऐ यहूद) क्या तुम उस वक्त मौजूद थे जब याकूब आखरी ( मौत के ) वक्त उन्होंने अपने बेटों से कहा कि मेरे बाद किसी की इबादत करोगे कहने लगे हम आप के माबूद और आप के बाप दादाओं इबराहीम व इस्माइल व इसहाक़ के माबूद व यकता खुदा की इबादत करेंगे और हम उसके फरमाबरदार हैं ।
( 2 : 133 )


आप इब्राहिम कौन थे ? 


مَا كَانَ إِبْرَٰهِيمُ يَهُودِيًّا وَلَا نَصْرَانِيًّا وَلَٰكِن كَانَ حَنِيفًا مُّسْلِمًا وَمَا كَانَ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ


 अर्थात : - इबराहीम न तो यहूदी थे और न नसरानी ( ईसाई )  बल्कि निरे खरे हक़ पर थे  (मुसलमान) फ़रमाबरदार (बन्दे) थे और मुशरिकों ( बहुदेव के पुजारी )  से भी न थे ।
( 3 : 67 )


* यहूदीयो और ईसाईयो की ये मान्यता है कि वे इब्राहिम उनके धर्म को मानने वाले थे ? 



وَقَالُوا۟ كُونُوا۟ هُودًا أَوْ نَصَٰرَىٰ تَهْتَدُوا۟ قُلْ بَلْ مِلَّةَ إِبْرَٰهِۦمَ حَنِيفًا وَمَا كَانَ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ


(यहूदी और  ईसाई मुसलमानों से) कहते हैं कि यहूद या नसरानी हो जाओ तो राहे रास्त पर आ जाओगे (ऐ रसूल उनसे) कह दो कि हम इबराहीम के तरीक़े पर हैं जो बातिल से कतरा कर चलते थे और मुशरेकीन से न थे ।
(  2 : 135 )


इब्राहिम

أَمْ تَقُولُونَ إِنَّ إِبْرَٰهِۦمَ وَإِسْمَٰعِيلَ وَإِسْحَٰقَ وَيَعْقُوبَ وَٱلْأَسْبَاطَ كَانُوا۟ هُودًا أَوْ نَصَٰرَىٰ قُلْ ءَأَنتُمْ أَعْلَمُ أَمِ ٱللَّهُ وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن كَتَمَ شَهَٰدَةً عِندَهُۥ مِنَ ٱللَّهِ وَمَا ٱللَّهُ بِغَٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ

 अर्थात : - क्या तुम कहते हो कि इबराहीम व इसमाइल व इसहाक़ व आलौदें याकूब सब के सब यहूदी या नसरानी थे ?
 (ऐ रसूल उनसे) पूछो तो कि तुम ज्यादा वाक़िफ़ ( जानते )  हो या खुदा ( पालनहार ) और उससे बढ़कर कौन ज़ालिम होगा जिसके पास खुदा की तरफ से गवाही (मौजूद) हो (कि वह यहूदी न थे) और फिर वह छिपाए और जो कुछ तुम करते हो खुदा उससे बेख़बर नहीं । ( 2 : 140 )

मुसलमान  =  ईमान वाला , एक पालनहार पर विश्वास रखने वाला ।

इब्राहिम



ईमान की दौलत 

وَمَا يُلَقَّىٰهَآ إِلَّا ٱلَّذِينَ صَبَرُوا۟ وَمَا يُلَقَّىٰهَآ إِلَّا ذُو حَظٍّ عَظِيمٍ


ये बात बस उन्हीं लोगों को हासिल हुई है जो सब्र करने वाले हैं और उन्हीं लोगों को हासिल होती है जो बड़े नसीबवर हैं । ( 41 : 35 )


يَمُنُّونَ عَلَيْكَ أَنْ أَسْلَمُوا۟ قُل لَّا تَمُنُّوا۟ عَلَىَّ إِسْلَٰمَكُم بَلِ ٱللَّهُ يَمُنُّ عَلَيْكُمْ أَنْ هَدَىٰكُمْ لِلْإِيمَٰنِ إِن كُنتُمْ صَٰدِقِينَ


(ऐ रसूल) तुम पर ये लोग (इसलाम लाने का) एहसान जताते हैं तुम (साफ़) कह दो कि तुम अपने इसलाम का मुझ पर एहसान न जताओ (बल्कि) अगर तुम (दावाए ईमान में) सच्चे हो तो समझो कि, ख़ुदा ने तुम पर एहसान किया कि उसने तुमको ईमान का रास्ता दिखाया । ( 49 : 17 )



असल कामयाबी


وَٱلْعَصْرِ



अस्र की क़सम


إِنَّ ٱلْإِنسَٰنَ لَفِى خُسْرٍ


बेशक इन्सान घाटे में है ।

إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّٰلِحَٰتِ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلْحَقِّ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلصَّبْرِ

मगर जो लोग ईमान लाए, और अच्छे काम करते रहे और आपस में हक़ का हुक्म और सब्र की वसीयत करते रहे । ( सूरह 103 )

क्या  मुह से  कह देना काफी है कि हम ईमान आये ?

أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تَدْخُلُوا۟ ٱلْجَنَّةَ وَلَمَّا يَأْتِكُم مَّثَلُ ٱلَّذِينَ خَلَوْا۟ مِن قَبْلِكُم مَّسَّتْهُمُ ٱلْبَأْسَآءُ وَٱلضَّرَّآءُ وَزُلْزِلُوا۟ حَتَّىٰ يَقُولَ ٱلرَّسُولُ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ مَتَىٰ نَصْرُ ٱللَّهِ أَلَآ إِنَّ نَصْرَ ٱللَّهِ قَرِيبٌ

क्या तुम ये ख्याल करते हो कि बेहश्त में पहुँच ही जाओगे हालॉकि अभी तक तुम्हे अगले ज़माने वालों की सी हालत नहीं पेश आयी कि उन्हें तरह तरह की तक़लीफों
 (फाक़ा कशी मोहताजी) और बीमारी ने घेर लिया था और ज़लज़ले में इस क़दर झिंझोडे ग़ए कि आख़िर (आज़िज़ हो के) पैग़म्बर और ईमान वाले जो उन के साथ थे कहने लगे देखिए ख़ुदा की मदद कब (होती) है देखो (घबराओ नहीं) ख़ुदा की मदद यक़ीनन बहुत क़रीब है । ( 2 : 214 )


أَحَسِبَ ٱلنَّاسُ أَن يُتْرَكُوٓا۟ أَن يَقُولُوٓا۟ ءَامَنَّا وَهُمْ لَا يُفْتَنُونَ

क्या लोगों ने ये समझ लिया है कि (सिर्फ) इतना कह देने से कि हम ईमान लाए छोड़ दिए जाएँगे और उनका इम्तेहान न लिया जाएगा । ( 29 : 2 )

وَلَقَدْ فَتَنَّا ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ فَلَيَعْلَمَنَّ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ صَدَقُوا۟ وَلَيَعْلَمَنَّ ٱلْكَٰذِبِينَ


और हमने तो उन लोगों का भी इम्तिहान लिया जो उनसे पहले गुज़र गए ग़रज़ ख़ुदा उन लोगों को जो सच्चे (दिल से ईमान लाए) हैं यक़ीनन अलहाएदा देखेगा और झूठों को भी (अलहाएदा) ज़रुर देखेगा । ( 29 : 3 )

उसी तरह  से ये आयेते भी 
( 3 : 186 )( 39 : 49 )( 18 : 7 )(22 : 11)

पहले सब एक ही दिन पर थे ।



إِنَّ هَٰذِهِۦٓ أُمَّتُكُمْ أُمَّةً وَٰحِدَةً وَأَنَا۠ رَبُّكُمْ فَٱعْبُدُونِ

बेशक ये तुम्हारा दीन (इस्लाम) एक ही दीन है और मैं तुम्हारा परवरदिगार हूँ तो मेरी ही इबादत करो । ( 21 : 92 )

وَتَقَطَّعُوٓا۟ أَمْرَهُم بَيْنَهُمْ كُلٌّ إِلَيْنَا رَٰجِعُونَ


और लोगों ने बाहम (इख़तेलाफ़ करके) अपने दीन को टुकड़े -टुकड़े कर डाला (हालाँकि) वह सब के सब हिरफिर के हमारे ही पास आने वाले हैं ।
 ( 21 : 93 )



كَانَ ٱلنَّاسُ أُمَّةً وَٰحِدَةً فَبَعَثَ ٱللَّهُ ٱلنَّبِيِّۦنَ مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ وَأَنزَلَ مَعَهُمُ ٱلْكِتَٰبَ بِٱلْحَقِّ لِيَحْكُمَ بَيْنَ ٱلنَّاسِ فِيمَا ٱخْتَلَفُوا۟ فِيهِ وَمَا ٱخْتَلَفَ فِيهِ إِلَّا ٱلَّذِينَ أُوتُوهُ مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْهُمُ ٱلْبَيِّنَٰتُ بَغْيًۢا بَيْنَهُمْ فَهَدَى ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لِمَا ٱخْتَلَفُوا۟ فِيهِ مِنَ ٱلْحَقِّ بِإِذْنِهِۦ وَٱللَّهُ يَهْدِى مَن يَشَآءُ إِلَىٰ صِرَٰطٍ مُّسْتَقِيمٍ


(पहले) सब लोग एक ही दीन रखते थे (फिर आपस में झगड़ने लगे तब) ख़ुदा ने नजात से ख़ुश ख़बरी देने वाले और अज़ाब से डराने वाले पैग़म्बरों को भेजा और इन पैग़म्बरों के साथ बरहक़ किताब भी नाज़िल की ताकि जिन बातों में लोग झगड़ते थे किताबे ख़ुदा (उसका) फ़ैसला कर दे और फिर अफ़सोस तो ये है कि इस हुक्म से इख्तेलाफ किया भी तो उन्हीं लोगों ने जिन को किताब दी गयी थी और वह भी जब उन के पास ख़ुदा के साफ एहकाम आ चुके उसके बाद और वह भी आपस की शरारत से तब ख़ुदा ने अपनी मेहरबानी से (ख़ालिस) ईमानदारों को वह राहे हक़ दिखा दी जिस में उन लोगों ने इख्तेलाफ डाल रखा था और ख़ुदा जिस को चाहे राहे रास्त की हिदायत करता है ।
( 2 : 213 )



شَهِدَ ٱللَّهُ أَنَّهُۥ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ وَٱلْمَلَٰٓئِكَةُ وَأُو۟لُوا۟ ٱلْعِلْمِ قَآئِمًۢا بِٱلْقِسْطِ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ

ज़रूर ख़ुदा और फ़रिश्तों और इल्म वालों ने गवाही दी है कि उसके सिवा कोई माबूद क़ाबिले परसतिश नहीं है और वह ख़ुदा अद्ल व इन्साफ़ के साथ (कारख़ानाए आलम का) सॅभालने वाला है उसके सिवा कोई माबूद नहीं (वही हर चीज़ पर) ग़ालिब और दाना है (सच्चा) दीन तो ख़ुदा के नज़दीक यक़ीनन (बस यही) इस्लाम है ।
( 3 : 18 )


إِنَّ ٱلدِّينَ عِندَ ٱللَّهِ ٱلْإِسْلَٰمُ وَمَا ٱخْتَلَفَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَٰبَ إِلَّا مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَهُمُ ٱلْعِلْمُ بَغْيًۢا بَيْنَهُمْ وَمَن يَكْفُرْ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ فَإِنَّ ٱللَّهَ سَرِيعُ ٱلْحِسَابِ

और अहले किताब ने जो उस दीने हक़ से इख्तेलाफ़ किया तो महज़ आपस की शरारत और असली (अम्र) मालूम हो जाने के बाद (ही क्या है) और जिस शख्स ने ख़ुदा की निशानियों से इन्कार किया तो (वह समझ ले कि यक़ीनन ख़ुदा (उससे) बहुत जल्दी हिसाब लेने वाला है । ( 3 : 19 )


قُل لَّئِنِ ٱجْتَمَعَتِ ٱلْإِنسُ وَٱلْجِنُّ عَلَىٰٓ أَن يَأْتُوا۟ بِمِثْلِ هَٰذَا ٱلْقُرْءَانِ لَا يَأْتُونَ بِمِثْلِهِۦ وَلَوْ كَانَ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ ظَهِيرًا


(ऐ रसूल) तुम कह दो कि 
(अगर सारे दुनिया जहाँन के) आदमी और जिन इस बात पर इकट्ठे हो कि उस क़ुरान का मिसल ले आएँ तो (ना मुमकिन) उसके बराबर नहीं ला सकते अगरचे 
(उसको कोशिश में) एक का एक मददगार भी बने । ( 17 : 88 )

मुसलमानों का बुरा चर्चा करने वाला का अंजाम

إِنَّ ٱلَّذِينَ يُحِبُّونَ أَن تَشِيعَ ٱلْفَٰحِشَةُ فِى ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْءَاخِرَةِ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ


जो लोग ये चाहते हैं कि ईमानदारों में बदकारी का चर्चा फैल जाए बेशक उनके लिए दुनिया और आख़िरत में दर्दनाक अज़ाब है और ख़ुदा (असल हाल को) ख़ूब जानता है और तुम लोग नहीं जानते हो ।
( 24 : 19 )



इस्लाम मे मस्जिद कहा ? और मंदिर 
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कयामत इंसाफ का दिन
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*  हक़ क़ुरआन लौहे महफूज में है ।(85:21,22)

* बेशक़ क़ुरआन फैसले की बात है ।
( 86:13,14) ( 15 : 1 से 15 )

* बेशक़ क़ुरआन सीधा रास्ता देखता है ।
( 15:9 )

 *وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُضِلَّ قَوْمًۢا بَعْدَ إِذْ هَدَىٰهُمْ حَتَّىٰ يُبَيِّنَ لَهُم مَّا يَتَّقُونَ إِنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌ

अर्थात :-  अल्लाह की ये शान नहीं कि किसी क़ौम को जब उनकी हिदायत कर चुका हो उसके बाद बेशक अल्लाह उन्हें गुमराह कर दे हत्ता (यहां तक) कि वह उन्हीं चीज़ों को बता दे जिससे वह परहेज़ करें बेशक ख़ुदा हर चीज़ से (वाक़िफ है)       ( 9 :15 )

* हम ने ( अल्लाह ) उनकी जबान में ही कई नबी भेजे । ( 14 : 4 )

* हक़ बात( इस्लाम ) कोई जबरदस्ति नही।(2-256).  

 *पालनहार आज्ञा देता है नेकी का और बेहयाई को नापसंद करता है।(16:90).    


*नसीहत उनके लिए सीधे मार्ग पर चलना चाहे। 
(81:27,28,29)(40:28)

           
* ये मानव तुम लोग पालनहार(अल्लाह) के मोहताज हो और अल्लाह बे-नियाज़ है(सर्वशक्तिमान) है नसीहत वो मानते है जो अक्ल वाले है (13:19).     

     
 * और हरगिज अल्लाह को बे-खबर ना जानना जालिमो के काम से उन्हें ढील नही दे राहा है, मगर ऐसे दिन के लिए जिसमे आंखे खुली की खुली राह जांयेंगी।(14:42)


*कोई आदमी वह है, की अल्लाह के बारे में झगड़ाता है, ना तो कोई इल्म, ना कोई दलील और ना तो कोई रोशन निशानी।

(22:8)(31:20)(52:33,34)(23:72)(23:73).                                                      

*कह दो,"सत्य आ गया और असत्य मिट 
गया, असत्य तो मिट जाने वाला ही होता है।
(17:81)        

            Note:-  या अल्लाह लिखने में 
बयान करने में कोई शरियन गलती हुई हो ,तो मेरे मालिक तू दिलो के राज जानने वाला है माफ फ़रमा दे।(आमीन)     

* अल्लाह से दुआ है , की हक़ को मानने , और समझने  को तौफीक आता फरमाए ,  ज़ुबान पर हक़ बोलने  की ताकत दे , और उसे ज्यादा उस चीज पर अमल करने की तौफीक दे  , या अल्लाह दुनिया मे रख ईमान पर , और मरते वक़त  कलम ए हक़ आत फ़रमा ।  

(अमीन )





                                        

    अल्हम्दुलिल्लाह


नबी इब्राहिम  1

नबी इब्राहिम  2 

नबी इब्राहिम 3


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