Quran aur jihad

इस्लाम , जिहाद और आतंकवाद





" जिहाद "

*  तो आज जिहाद को जानने की कोशिश करते है ।

* जिहाद का अर्थ  ?


1. नैतिक मूल्यों के संरक्षण के लिए की जाने वाली जदोजहद या संघर्ष 
(अपने हक़ के लिए संघर्ष करना )

2 . किसी जायज  मांग के लिए भरपूर कोशिश करना या आंदोलन करना ।

3 .  धर्म  की  रक्षा  के  लिए की जाने वाली कोशिश ।

*  नबी  ए  पाक  का  इरशादे  पाक *
(सल्लाल्लाहु अलैही वसल्लम)

* जिहाद ए अकबर  (  यानी  बड़ा युद्ध )
अपने  ना - जायज  इच्छाओं  का  पालनहार की आज्ञा  से  उस  चीज़  का  दहन  करना ।

*  जिहाद ए असगर ( छोटा युद्ध) स्वयं की  रक्षा  के  लिए  युद्ध ।

* जिसका  पर्वधन  संविधान  में भी  है ।

* अगर  हम  स्वयं  की  रक्षा  के  लिए  के  लिए  दूसरो  को  मार  भी  देते  है  तो भी अपराधी  नही  ।

* उदहारण ० हर  देश  की  कोई  न कोई सेना होती  है  वैसे  ही   हमारे  हिन्द  की  ही  लेलो अगर  हिन्द  की  फ़ौज  पर  कोई आक्रमण करेंगा  उसे  देश  की  रक्षा  के  लिए  उसे धूल चटानी ही  पड़ती है ।

* उसी  तरह  इस्लाम  पर  कोई  आक्रमण  करे  तो  उससे  भी  धूल  चाटना  ना ही  पड़ता  है । जिसको  आम  भाषा मे  जिहाद 
भी  कह  सकते  है ।

* अब  देखते  है  कि  अल्लाह  के  पाक  कलाम  में  इस  बारे  में  क्या  क्या  है  ।





*  इसी कारण हम ने (अल्लाह) बानी इस्राइल में लिख दिया था की जिसने किसी व्यक्ति को खून का बदला लेने या जमीन में फ़साद फैलाने के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाले तो मानो उसने सारी इंशानो की हत्या कर दी और जिसने एक व्यक्ति को जीव प्रदान की उसने सारी इंशानो को जीव दान दिया  (5:32)



*  अल्लाह  ने  वर्जित ( हराम ) किए  जीव  का  नाहक़  क़त्ल  नही  करते  ,  और  न  व्यभिचार  करते  है  ये  काम  जो  कोई  करेगा
वह  अपने  पाप  का  बदला  पाएगा । 
( सुरह  25 : 68 ) 



* ये  नबी  उन से कहो कि  आओ में  तुम्हे बताओ   , तुम्हारे  मालिक  ने तुम पर क्या - क्या  पाबन्दीया  ( किस - किस  चीजो की आज्ञा  दी  है  ।  )  लगाई है , यह कि  उसके साथ किसी को  साझेदारी  न  बनाओ और  माँ - बाप  के साथ अच्छा व्यवहार करो  और
अपनी औलाद को  मोहताजी  के भय से  कत्ल  न करो । हम  तुमको  भी  रोजी 
देते  है  और  उनको  भी  देंगे  और गंदी  बताओ  के  करीब  भी  न  जाओ  चाहे  वे खुली  हुई   हो  या  छिपी ।  और  किसी  जीव की ( व्यक्ति ) , जिस अल्लाह ने  आदरणीय  ठहराया है , हत्या  न  करो , सिवाय  इस  स्थिति  के  की  ऐसा  करना सत्य  को  उचित  हो । ये  बाते है ,जिनको आदेश  उसने  तुम्हे  दिया  है , शायद की तुम सूज - बुझ  से  काम लो । ( सूरह 6 :151)

  हदीस ०

हज़रत  अनस  बिन  मालिक  रिजिअल्लाहु  अन्हु  से  रिवायत  है  , की  नबी ए करीम (सल्लाल्लाहु अलैही वसल्लम) 
ने  फरमाया  की " बड़े  पापो  में  सबसे बड़ा पाप  अल्लाह ( एक पालनहार )  के साथ किसी  को  सहभागी  ठहराए  और मनुष्यों  की जीव हत्या  और  माता  के  साथ  दूरव्यहार , झुट बोलना ।

*  एक  हदीस   में  ये  भी  है  कि  महशर में सबसे  पहले  फैसला  ना हक़ कत्ल का होगा।

*  हज़रत  इब्ने  उमर  रिजिअल्लाहु अन्हु  से रिवायत   है , की  नबी  पाक
  (सल्लाल्लाहु अलैही वसल्लम) ने  इरशाद  फ़रमाया  की  " ईमान वाला  जब तक ईमान पर मजबूती से रहता  है  जब तक कोई  भी  नाहक़  खून  नही  बहाता ।


अब आगे देख थे  है और  क्या  है  ?

"  यदि  सत्य और  न्याय  के  लिए   मजबूर  हो तो  अपराधी  को  कत्ल  भी  किया  जा सकता  है  अन्यथा  शन्ति  के  जगह  पर अशांति   हो  जायेगी  ।



ऐ मोमिनों जो लोग (नाहक़) मार डाले जाएँ उनके बदले में तुम को जान के बदले जान लेने का हुक्म दिया जाता है आज़ाद के बदले आज़ाद और ग़ुलाम के बदले ग़ुलाम और औरत के बदले औरत पस जिस (क़ातिल) को उसके ईमानी भाई तालिबे केसास की तरफ से कुछ माफ़ कर दिया जाये तो उसे भी उसके क़दम ब क़दम नेकी करना और ख़ुश मआमलती से (ख़ून बहा) अदा कर देना चाहिए ये तुम्हारे परवरदिगार की तरफ आसानी और मेहरबानी है फिर उसके बाद जो ज्यादती करे तो उस के लिए दर्दनाक अज़ाब है। ( 2 : 178 )




 *  बुद्धि और समझवालों ! तुम्हारे लिए हत्यादंड (क़िसास) में जीवन है, ताकि तुम बचो ।
( 2 : 179 )( 5  : 4 )


* नबी पाक
(सल्लाल्लाहु अलैही वसल्लम)

का  इरशादे  पाक  है ," अपने  भाई  की 
सहायता करो ,चाहो अत्यचारी हो या अत्यचार  से  पीड़ित हो ।


सुनने वालो को आश्चर्य हुआ की अत्यचार -पीड़ित  उचित  है ।

किंतु  की अत्यचारी की सहायता  कैसे  ?
पूछा या रसूलअल्लाह हम अत्यचार - पीड़ित  की  सहायता  तो अवश्य करेंगे ।

किंतु अत्यचारी की सहायता किस तरह करे  

तो  आप  ने  कहा " इस तरह की तू उसका हाथ पकड़  ले  और  उसे  अत्यचार  करने  से  रोक  दे  अतः वस्तुतः जालिम  को  जुल्म  से रोकने  के लिए अगर  सख्ती   भी 


तो  वो  सकती  नही  बल्कि  वह  नरमी है ।






* कथन ये ख़लीफ़ा ए अवल अबुबक्र

रिजिअल्लाहु  अन्हु  इनकार  करने  वालो  से 

जिहाद करना छोटा जिहाद है ,अपने अस्तित्व ( नफ़्स ) से  जिहाद  करना बड़ा जिहाद है ।



*  जालिम  पर  रहम  करना  मजलुमो  पर  जुल्म  है ।



* आज - कल  जाहिल लोग  या कह लीजिए अति विद्धवान लोग  24 आयतों  का सेट लेके  घुमते रहते और  अपने  आपको  क़ुरान  का  अलीम  समझे  बैठे  है  मुझे तो 

उन  बेचारो  तरस  आता  है  की  इनको क्या




जवाब  दिया  जाए जो  हवा में तैरने की कोशिश कर रहे है ।  



* बरहाल कोई मसला नही अगर 24 आयात  क्या  2400  सो भी  लाओगे  तो भी  जवाब  देने  की ताकत रखते है ।



* पर अल्लाह जिस से काम लेना चाहिए अगर  24 आयतों का जवाब भी जानना चाहते हो तो " स्वमी लक्षमी शंकराचार्य जी "

की पुस्तक एक बार पढ़ लेना ।








*  अगर उससे  भी  मन  ना भरे  तो  मेरा वो 

 लेख पढे ।  भगवा आतंकवाद



 आशा  है कि  24 आयतों  वालो  की  आत्मा  को शांति मिल जाएंगी  ।


* जिहाद की आवश्यकता क्यों ?






* तर्जुमा :- यदि अल्लाह मानव के एक झुंड को  दूसरे  झुंड  के द्वारा हटाता नही रहता

धरती  बिगाड़ से भर जाती , किंतु अल्लाह 

संसारवालो  के  उदार के लिए है ।

( 2 : 251)








* तर्जुमा  :- " वे  जब भी  युद्ध के लिए आग भड़काते  है , अल्लाह  उसको बुझा देता है वे धरती  में फ़साद फैलाने के लिए प्रयास कर है , हालांकि फसाद फैलाने वालो को अल्लाह  पसंद नही करता ।  ( 5 : 64 )



 ( सुरह 22 : 39 '40)




(सुरह 4 : 75) 

 ( सुरह 2 : 76 )

 ( सुरह 61 : 10 '11)

 (  सुरह 61 : 4 )

*  ( सूरह  9 : 19 ' 20 )  इत्यादि  इस  मे  
भी  वही  है  सत्य  के  लिए  असत्य  से  युद्ध 
करना  ही पड़ता है । सत्य और असत्य कभी भी एक जगह जमा नही हो सकते । इसको जिहाद कहते है । 


 * जिहाद  ए  मुक़दस  भी एक इबादत है । 
पर  कुछ  नासमझ  लोग  फ़साद  फैलाने  में लगे है ।

* मुझे  लगता  है समझदारों के  लिए  इतना 
काफी है  नही तो  पूरी जिंदगी भी कम  पढ़ जांयेंगी इस पाक चीज का बयान करने में  !

* जंग के आदाब 

1 . स्त्री , बच्चे और बुढो को किसी भी तरीके की हानी  नही होनी चाहिए ।

2 . किसी की धार्मिक ग्रथो
 ( उसकी बे हुरमती नही करना ) का अपमान नही करना ।

3 . जंग के बाद किसी  मारे शव की बे हुर्मति न करे ।

4  . उनके चेहरे को न बिगड़े ।

5 . उसके  गुप्त स्थान को किसी प्रकार से हानि न दे ।

6 .रास्ते के किसी पेड़ ,पौधों ,जनवरो ,खेतियों को नष्ट न करे ।

7 . मुसाफिर और  रहवासी को किसी  प्रकार के हानि न करे ।

8 . केवल उससे  युद्ध जो तुमसे युद्ध करना चाहते है । आदि आदि ।

  नबी पाक( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के जमाने मे और खलीफा के जमाने मे कुल मिला कर 30 जंग होइ है। जिस में केवल 10000 लोग की मोत वो भी दोनों तरफ के मिलाकर।जंग शिर्फ़ सेल्फ डिफेंस में कर सकते है इस्लाम मे। वरना वर्जित है युद्ध करना। और आज के टाइम फिलेंसतीन में ही 3,लाख। शिराया इत्यदि जगहों पर हजारों लाखों , मुसलमान को जानवरों के जैसा मारा जा रहा है। दुनिया का सबसे बडा यहूदी आतंक  है जो ये  कर  रहा  हैं।


इस्लाम को दुनिया मे बाद नाम करने के लिए । इराक,सऊदी के तेल के कुआँ पर कब्जा करने के लिए अमरीका, और इस्राइल ने इस्लामिक आतंकवाद का प्रोपोगंडा रचा है। पैसे देकर काम कर आते है ये 2 स्टेट । जाहिल और ग्वार लोग जो इस्लाम (a) भी नही जानते  उन्हें पैसे का लालच दे कर। ये इस्लाम को बदनाम कर रहे है । दुनिया का सबसे बड़ा एलेक्ट्रोनिक मीडिया यहूदियों के है। 

वही मीडिया को पैसे दे कर इस्लाम को बद नाम कर व रहा है। आप लोग मीडिया, सोशल मीडिया ।की बात को जल्दी अस्पेट करते हो क्योंकि टेनॉलॉजी ने इन्शान का दिमाग को परालैस कर दिया है। पहले के लोग किताबो से पढ़कर कोई फैसला करते थे। आज जो मीडिया ने कहा दिया पत्थर की लकीर हो गई है। पहले के लोग ex.32+18=? फैट से 50 बोलते थे आज पहले कलकोलेटर निक है। हमे अपने दिमाग इस्तमाल करना छोड़ दिया है।ये सब चाल  यहूदियों की हैं पूरी दुनिया पर राज करना चाहती है। 

खुद सिगरेट बनाती है। पर खुद नही पीते।खुदने बैंकिंग सिस्टम खोल है। पूरी दुनियाभर भर ब्याज को आम कर दिया। खुद आपस मे ब्याज का लेन देन नही करते।ये है यहूदी इसलिए (हिटलर)कहता था में इन्हें क्यों मरता हु तुमहे भविष्य में पता चलेगा । 

* तो अब सवाल पूछना बनता ही  नही है ।
की  ISIS इत्यादि  ये  सब  यहूदियों  के अजेंड है ।

* हा और ये जो 24 आयत वाले है , खुद को नीच और दुष्ट समझते है तो ये आयते अपने ऊपर फिट कर सकते है ?

  * हक़ बात ( इस्लाम ) कोई जबरदस्ति नही।(2-256).  


 *पालनहार आज्ञा देता है नेकी का और बेहयाई को नापसंद करता है।(16:90).    
 *नसीहत उनके लिए सीधे मार्ग पर चलना चाहे।  (81:27,28,29)(40:28)
       
 * ये मानव तुम लोग पालनहार(अल्लाह) के मोहताज हो और अल्लाह बे-नियाज़ है (सर्वशक्तिमान) है नसीहत वो मानते है जो अक्ल वाले है (13:19).     
    
 * और हरगिज अल्लाह को बे-खबर ना जानना जालिमो के काम से उन्हें ढील नही दे राहा है, मगर ऐसे दिन के लिए जिसमे आंखे खुली की खुली राह जांयेंगी।(14:42)

 *कोई आदमी वह है, की अल्लाह के बारे में झगड़ाता है, ना तो कोई इल्म, ना कोई दलील और ना तो कोई रोशन निशानी।(22:8)(31:20)(52:33,34)(23:72)(23:73).                                                      
*कह दो,"सत्य आ गया और असत्य मिट 
गया, असत्य तो मिट जाने वाला ही होता है।
(17:81) 

All post
       

Previous
Next Post »

Dharm kise kahate hain

धर्म क्या है ? धर्म का अर्थ    अब हंसी ना आए तो क्या आए जो दिन और रात , गौ-मूत्र ,गोबर में लदे रहते हैं अर्थात उसे खाते पीते ह...