Vedo me ashlilta वेद और अश्लीलता

अश्लीलता


अश्लीलता


* आज कल  इस्लाम को  बदनाम करने के लिए नाकाम कोशिश जारी और सारी है ।

* इस्लाम में  अश्लीलता का झूठा  सडयंत्र
रचकर क्या बताना चाहते है ??

* बरहाल इस्लाम विरोधियों को कोई न कोई मुद्दा चाहिए ही  ! 

*काफी दिनों सोच रहा हु की ये लोग झुट बाते फैलाकर क्या साबित करना चाहते हैं ,इनके घरों में अंधेरा है और  दुसरो के घरों में उजाला करने की कोशिश कर रहे है ।


* ये लेख बनाने का मकशद किसी को नीचा दिखाना नही है बल्कि की सच्च का आईना दिखाना है , ये लेख बनाना मेरी मजबूरी है ।
😢😢😢😢

* अब देखते है , वेदों में अश्लीलता के घिनौने कुछ प्रमाण ?


*ये पति की कामना करती हुई कन्या आयी है और  पत्नी की कामना करता हुआ  मैं आया हु एश्वर्य के साथ आया हु जैसे हिंसता हुआ घोड़ा । ( अर्थवेद 2 : 30 :5 )





* पति उस पत्नी को प्ररणा कर जिस में मनुष्य लोग वीर्य डाले जो हमारी कामना करती हुई दोनों जंघाओ  को फैलावे और जिस मेंं कामना  करते हुए हम लोग उपस्थेेेन्द्रिय का प्रहरण करे ।
( अथर्वेद 14 : 2 : 38 )


* तू जांघो के ऊपर आ हाथ का सहारा दे और प्रसन्न  चित होकर तू पत्नी को आलीडन कर !

भावर्थ :- पति पत्नी दोनों प्रसन्न वदन होकर मुह से सामने मुह , नाक के सामने नाक  इत्यादि को  पुरूष के प्रशिप्त वीर्य को खेंचकर स्त्री की गर्भशय में  स्थिर कर ।
( अथर्वेद 14 : 2 : 39 )


* ब्रह्चाये कन्या युवा पति को पाती है , बैल और घोड़ा  ब्रह्चाये ( कन्या ) के साथ घास सिंचना ( गर्भधान करना ) चाहता है ।
( अर्थवेद 11 : 5 : 18 )





* वेदों के अनुसार स्त्री केवल संतान उत्पादन का  यंत्र है 


 (ऋग्वेद 10 : 85 : 45 )

* 10 बच्चे पैदा कर  😢😢😢
जनसंख्या नियंत्रण कानून  लागू करने की बात ।
😊😊😊😊😊


दोनों  प्रकाश की किरण ( ****)
फैले हुए है , उन दोनों को पुरूष पिसता है ।
हे कुमारी निश्चय  करके वह  वैसा नही है  ।
हे कुमारी जैसा तू मानती है ।


 ( अर्थवेद 20 : 133 : 1 )
मुझे बताने में भी लज्जा आ रही है आप खुद 
चेक करले ।
( अर्थवेद 20 : 133 - 1 - 6 )

* किस तरीके से किया जाए ?


  (अर्थवेद 4 : 5 : 8 )
बड़ी चालाकी से अर्थवेद के (4 : 5 ) के पूरे मंत्रो का अर्थ बदल  दिया है पर कब तक आगे देखे ? 😊😊😊😊




* स्त्री पुरुष  मुह के साथ मुह ,आंख के साथ  आंख , शरीर के साथ शरीर  के साथ करे ।
(यजुर्वेद 19 : 88 )

* स्त्री अपने पति से योनि  के भीतर पुण्यरूप गर्भ को धारण करती है ।
( यजुर्वेद 19 : 94 )

* पुरुष का लिंग स्त्री की योनि में  प्रवेश करता हुआ वीर्य को छोड़ता है । 
( यजुर्वेद 19 : 76)

*  दयानंद के इनके अर्थ ही बदल दिए 
जिस में बाप बेटी का था ।
( ऋग्वेद1 : 164 : 33 )
( ऋग्वेद 3 : 3 : 11)
( ऋग्वेद 7 : 33 : 11 )

* जो कि पहले ये थे ।

 (१) यां त्वा ………शेपहर्श्नीम ||

 (अथर्व वेद ४-४-१) अर्थ : हे जड़ी-बूटी, मैं तुम्हें खोदता हूँ. तुम मेरे लिंग को उसी प्रकार उतेजित करो जिस प्रकार तुम ने नपुंसक वरुण के लिंग को उत्तेजित किया था.
 (२) अद्द्यागने……………………….पसा:|| (अथर्व वेद ४-४-६) अर्थ: हे अग्नि देव, हे सविता, हे सरस्वती देवी, तुम इस आदमी के लिंग को इस तरह तान दो जैसे धनुष की डोरी तनी रहती है
 (३) अश्वस्या……………………….तनुवशिन || (अथर्व वेद ४-४-८) अर्थ : हे देवताओं, इस आदमी के लिंग में घोड़े, घोड़े के युवा बच्चे, बकरे, बैल और मेढ़े के लिंग के सामान शक्ति दो
 (४) आहं  तनोमि ते पासो अधि ज्यामिव धनवानी, क्रमस्वर्श इव रोहितमावग्लायता (अथर्व वेद ६-१०१-३) मैं तुम्हारे लिंग को धनुष की डोरी के समान तानता हूँ ताकि तुम स्त्रियों में प्रचंड विहार कर सको.
 (५) तां पूष………………………शेष:|| (अथर्व वेद १४-२-३८) अर्थ : हे पूषा, इस कल्याणी औरत को प्रेरित करो ताकि वह अपनी जंघाओं को फैलाए और हम उनमें लिंग से प्रहार करें.
(अथर्व वेद २०/१३३) 

अर्थात : हे लड़की, तुम्हारे स्तन विकसित हो गए है. अब तुम छोटी नहीं हो, जैसे कि तुम अपने आप को समझती हो। इन स्तनों को पुरुष मसलते हैं। तुम्हारी माँ ने अपने स्तन पुरुषों से नहीं मसलवाये थे, अत: वे ढीले पड़ गए है। क्या तू ऐसे बाज नहीं आएगी? तुम चाहो तो बैठ सकती हो, चाहो तो लेट सकती हो. 
(अब आप ही इस अश्लीलता के विषय में अपना मत रखो और ये किन हालातों में संवाद हुए हैं। ये तो बुद्धिमानी ही इसे पूरा कर सकते है ये तो ठीक ऐसा है जैसे की इसका लिखने वाला नपुंसक हो या फिर शारीरिक तौर पर कमजोर होगा तभी उसने अपने को तैयार करने के लिए या फिर अपने को एनर्जेटिक महसूस करने के लिए किया होगा या फिर किसी औरत ने पुरुष की मर्दानगी को ललकारा होगा) तब जाकर इस प्रकार की गुहार लगाईं हो.

* बरहाल कब तक आगे देखते है ।

* ऋग्वेद ( 10 : 10  : 1 से 14  )के पूरे मन्त्र 
यम और यमी की कहानी जो  की जुड़वा भाई बहन थे पर दयानद ने काफी चालाकी से इनको पत्ति पत्नी साबित करने की कोशिश की है । देखते है ।
&

उसी प्रकार अथर्वेद (18 :1 : 1 से 16 )
में भी यही कहनी है ।



यमी: “हे यम ! हमारे प्रथम दिन को कौन जान रहा है, कौन देख रहा है? फिर पुरुष इस बात को दूसरे से कह सकेगा? दिन मित्र देवता का स्थान है, यह दोनों ही विशाल हैं. इसलिए मेरे अभिमत के प्रतिकूल मुझे क्लेश देने वाले तुम, अनेक कर्मों वाले मनुष्यों के सम्बन्ध में किस प्रकार कहते हो ?(७) मेरी इच्छा है कि पति को शरीर अर्पण करने वाली पत्नी के सामान यम को अपनी देह अर्पित करूँ और वे दोनों पहिये जैसे मार्ग में संलिष्ट होते है, उसी प्रकार मैं होऊं (८) 

यम : (अपनी बहन से कहता है) : ” हे यमी ! देवदूत बराबर विचरण करते रहते हैं, वे सदा सतर्क रहते है, इसलिए हे मेरी धर्ममति को नष्ट करने की इच्छा वाली, तू मुझे छोड़ कर अन्य किसी की पत्नी बन और शीघ्रता से जा कर उसके साथ रथ-चक्र के सामान संश्लिस्ट हो (९) संभवत: आगे चलकर ऐसे ही दिन रात्रि आयें जब बहन अपने अबंधुत्व को पाने लगेंगी पर अभी ऐसा नहीं होता, अत: यमी ! तू सेवन समर्थ अन्य पुरुष के लिए अपना हाथ बढ़ा और मुझे छोड़ कर उसे ही पति बनाने की कामना कर” (१) 

यमी : अपने भाई (यम) का यह उत्तर सुन कर भी चुप नहीं होती बल्कि वह एक बार फिर अपने भाई को ताना देते हुए कहती है : ” वह बन्धु कैसा, जिसके विद्यमान रहते भगिनी इच्छित कामना से विमुक्त रह जाए, वह कैसी भगिनी जिसके समक्ष बंधु संतप्त हो ? इसलिए तुम मेरी इच्छनुसार आचरण करो” (२)

यम : फिर इनकार करते हुए कहता है : ” हे यमी ! मैं तेरी कामना को पूर्ण करने वाला नहीं हो सकता और तेरी देह से स्पर्श नहीं कर सकता. अब तू मुझे छोड़ कर अन्य पुरुष से इस प्रकार का सम्बन्ध स्थापित कर. मैं तेरे भार्यात्व की कामना नहीं करता (१३) हे यमी ! मैं तेरे शरीर का स्पर्श नहीं कर सकता. धर्म के ज्ञाता, भाई-भगिनी के ऐसे सम्बन्ध को पाप कहते हैं. मैं ऐसा करूँ तो यह कर्म मेरे ह्रदय, मन और प्राण का भी नाश कर देगा” (१४)

यह सुन कर तो मानों यमी बिलकुल निराश ही हो गई दिखती है वह कहती है : ” हे यम ! तेरी दुर्बलता पर मुझे दू:ख है. तेरा मन मुझ में नहीं है, मैं तेरे ह्रदय को नहीं समझ सकी. वह किसी अन्य स्त्री से सम्बंधित होगा” (५)

अंत में यम यह कह कर अपनी बहन से पीछा छुड़ाता है, ” हे यमी ! रस्सी जैसे अश्व में युक्त होती है, वृत्ति  जैसे वृक्ष को जकड़ती है, वैसे तू अन्य पुरुष से मिल. तुम दोनों परस्पर अनुकूल मन वाले होवो और फिर तू अत्यंत कल्याण वाले ।
हिंदूइस्म में नियोग  की प्रथा भी है 
जो  कि  बहुत कलंकित है  मानव जाति के लिए  इसके बारे में जानने के यहा 

* दयानद ने तो पूरा अर्थ ही बदल दिया है पति पत्नी बना दिया है ।

* दयानद ने पूरा वेदों का अर्थ अपने  मन मर्जी से किया । 


* इसलिए इनकी इज्जत इन्हें में नही रही ।
जो झुट की बुनियाद पर बात करते है उनकी इज्जत का जनाजा निकल जाता है ये मै नही 
यजुर्वेद 23 : 23 कहता है ।



* अब आगे देखते है , दयानद की ये पुस्तक का प्रमाण है ।







* सब जानते ही है कि काले जादू के लिए अर्थवेद प्रशिद्ध है । केवल एक  ही उदहारण देता हूं ।


(अर्थवेद 10 : 3 : 13 ,14 )
( अर्थवेद  4 : 17 : 3 से 7 )
(अर्थवेद 7 : 88 : 1 )
( अर्थवेद 6 : 83 : 1 ,2 )
( सामवेद 11 : B 14 )

* कहते है  कि वेदों में बहुत ज्ञान - विज्ञान भरा जिसका एक उदाहरण !
😊😊😊😊😊😊


( अथर्वेद 6 : 77 : 1 )
(ऋग्वेद 10 : 58 : 3 )
(यजुर्वेद  32 : 6  )
( यजुर्वेद 1 : 21 )
( अर्थवेद 13 : 1 : 6 )
( अथर्वेद 10 : 7 : 12 )

 * सब ठहरा हुआ है ,  ये कोनसा विज्ञान है भला बताना ?




* जिसके घर शीशे के होते है  ओ दूसरे के घरों  पर  पत्थर नही मारा  करते ?





 * हक़ बात( इस्लाम ) कोई जबरदस्ति नही।(2-256).  


 *पालनहार आज्ञा देता है नेकी का और बेहयाई को नापसंद करता है।(16:90).    
*नसीहत उनके लिए सीधे मार्ग पर चलना चाहे। 
(81:27,28,29)(40:28)
       
* ये मानव तुम लोग पालनहार(अल्लाह) के मोहताज हो और अल्लाह बे-नियाज़ है(सर्वशक्तिमान) है नसीहत वो मानते है जो अक्ल वाले है (13:19).     
    
 * और हरगिज अल्लाह को बे-खबर ना जानना जालिमो के काम से उन्हें ढील नही दे राहा है, मगर ऐसे दिन के लिए जिसमे आंखे खुली की खुली राह जांयेंगी।(14:42)

*कोई आदमी वह है, की अल्लाह के बारे में झगड़ाता है, ना तो कोई इल्म, ना कोई दलील और ना तो कोई रोशन निशानी।(22:8)(31:20)(52:33,34)(23:72)(23:73).                                                      
*कह दो,"सत्य आ गया और असत्य मिट 
गया, असत्य तो मिट जाने वाला ही होता है।
(17:81) 

       
NOTE : -  अल्हम्दुलिल्लाह  जवाब तो हम दे सकते है पर इनके दिमाग मे जंग  लगा है  इसलिए जो जैसी भाषा समझता है उसे वैसे ही समझना पड़ता है ।
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* अगर किसी को ठेस पहुंची तो क्षमा चाहता हु । 😢

* इस लेख का मकसद किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नही बल्कि उन इस्लाम विरोधी को जवाब देना है  जो खुद की धार्मिक गर्न्थो की मान्यता को नही जानते और इस्लाम और मुसलमानों के ऊपर तानाकाशी करते है।



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