SATYARTH PRAKASH AUR ISLAM

सत्यार्थ प्रकाश का सच्च

पोल खोल 1  (A )

 *अस्सलामु  अलैकुम*


मेरे नॉन मुस्लिम औऱ मुस्लिम भाइयो के लिए एक लेख । 


* सत्यर्थ प्रकाश का सच्च की  शुरुआत  करने  जा  रहा  हु  जिसमें दयानंद सरस्वती  की  किताब  सत्यार्थ  प्रकाश  में  जो  14  समुलास  में क़ुरआन  के बारे  में  टिप्पणी  की  है  अपनी  मंदबुद्धि  का  प्रदर्शन  करते  हुए  जो  कुछ  लिखा  उसके  बारे  मे  जवाब  देने  की  कोशिश  करूंगा इन्शाल्लाह  और  उनकी  क्या  मान्यता  है  उसके  बारे  में  चर्चा  करेंगे ।

  कभी - कभी  बीच  मे पोल  खोल  के  भाग  आते  रहेंगे  इन्शाल्लाह । आप  लोग  भी  दुआ  करे  ये काम  हो  जाये  पर  ये  कंपलीट  होने  में काफी  टाइम  लग सकता  है ।  कोशिश  करेंगे  जलदी  हो  जाये ।

*  1  प्रशन : - अल्लाह किस अल्लाह के नाम से शुरू कर रहा है ? 




* अल्लाह के पाक नाम से शुरू जो निहायत महेरबान खुद रहम फरमाने वाला ।

*  उत्तर :-  

*  अर्थात :- बेशक  वह  सुलैमान  की  तरफ़  से  है और  बेशक  वह  अल्लाह  के  नाम  से  है , जो  निहायत मेहरबान  रहम  वाला  ।(27:20)


*  ये  आयात  में  हज़रत  सुलैमान  अलेहसल्लम  का  जिक्र  है  जो  की  अपने  एक  खत  (लेटर)  में  

 

लिखा  था  ।  जिसका  जिक्र  इस  आयत  किया  गया  है ।  


*  इस  से  पता  चला  हर  नेक  काम  करने  से  पहले  ये  लिखाना  या  पढ़ना  चाहिए ।

*  इससे  मुताबिक  अहादीसो  में  कई  सारी  हदीसे  मोजूद है  जिसमें   कहा  गया  है  हर  अच्छे  काम  से  पहले  लिखो  भी  और  पढ़ो  भी  ।

*  ये  केवल  क़ुरआन की  एक आयात  जिसमे खुल के बताया गया  है  कि  ये  शब्द  का प्रयोग  सुलैमान  अलेहसल्लम  ने किया  था ।

*  इसमे  कई   बड़े - बड़े  अपने  वक़्त  के  मोहदीसों , उलमाओं  इत्यादि  लोगो  की  राय  है  कि  ये  जो  हर  सूरह के  पहले  बिस्मिल्लाहिर्रह्मानिररहिम्   लिखा  गया  है  ये दोनों  सुरों  में फर्क  बताने  के लिए  है , की  एक  सुरह  समाप्त  हो  रहा  है  दुसरे  सूरह की शुरुआत हो  रही है  । (अल्लाहुवआला)

*  और  सुलैमान अलेहसल्लम  ने  इसका  इस्तेमाल  अपने  पत्र  में  उपयोग  किया  था , ना  की  
 

ने


*   बरहाल  इससे  पता  चला  कि  हर  शुभ  काम  से  पहले बिस्मिल्लाहिर्रह्मानिररहिम्  लिखना  और  पढ़ना  चाहिए ।* 

* बाकी  अल्लाह  बहत्तर  जानने  वाला  है  ! 

*  जो  क़ुरआन की पहली आयात  नाजिल हुई वो  ये  है




* ये  होता  है  पालनहार  का  संदेश  कास  दयानद जी ये   आयात  पर  पर  गौर  करते ।  पर  क्या  कर  सकते  है  दिमाग  पर  जंग  लगा  था  । 😊


*   दयानद  जी  की  ये  भी  एक  और  आपत्ति थी  कि जानवरों  को  जबह  करते  वक्क्त  बिस्मिल्लाह  का  उच्चारण  होता  है  जी  बिस्मिल्लाह  का  मतलब  शुरू होता है ।  और  जबह  करते  वक़्त  बिस्मिल्लाही अल्लाहु अकबर  पढ़ा  जाता  है  नाकि बिस्मिल्लाहिर्रह्मानिररहिम्  ।


* और  हमे  पालनहार  ने  मांस  का  सेवन  करने  की  अनुमति दी  है ।


* जिसके  कई  फ़ायदे  है  मानव  शरीर  के  लिये । 

* मानव शरीर  मे  सबसे  ज्यादा  किसी  चीज़  की  आवश्यकता  है  तो  वो  चीज़  है  प्रोटीन  मांस ही सबसे अच्छा माध्यम  प्रोटिन  का । 



*  बरहाल  सबको  पता  ही  है  इन्शान  परभक्षी है ।

*  इस  विषय  बारे  में  अधिक  जानकारी  अपने  आस-पास 
के  डॉक्टर  संपर्क  करे । 😊

*  मेरे  कुछ  सवाल  की  मानव शरीर मांसाहारी है या नही ?



 * अब रही दयालु वाली बात तो बेशक अगर कोई मनुष्य जाने अनजाने में कोई गलती कर देता है और उसको उस चीज़ का पछतावा होजाता है और दोबारा उस काम से रोक जाने के बारे में अहद कर लेता है तो बेशक वो तवाबुर्रहीम है यानी तौबा को काबुल करने वाला है अल्लाह को बंदों पर सकती नही करता बल्कि इन्शान ही खुद खाई में गिरा जा रहा है । वो तो इतना करीम की अगर कोई आज भी सच्चे दिल से तौबा कर ले तो माफ फ़रमा देता हैं ।









* परंतु  वैदिक  ईश्वर  ऐसा  नही  करता  वेदों  के हिसाब  से वह  अपने  भक्तों  को  कभी  माफ  नही  करता   तो  यहाँ  पर  दयालु  नाम की कोई  चीज़  ही नही  है । तो  वो  ईशवर  से  हम  कोई  गरज  नही  जो  माफ  करना नही  जानता ।😢


* बरहाल  कोई   मसला  नही  !  जो  लोग  क़ुरआन  और  अरबी  का  (A)  भी  नही  जानते  वो  लोग  क़ुरआन  के  बारे  में  टिप्पणी  करना  चालू  कर  देते  है  तो  मुझे   काफी  सोच  आती  है ।  अगर  दयानद  जी  100  बार  भी  पुर्नजन्म  ले लेंगे  वैदिक  मान्यता  के  हिसाब  से  तो  भी क़ुरआन  

कफ 




* सही  उच्चारण  भी  नही  कर  पाएंगे  इनसे   ज्यादा  तो  हमारे  मकतब  के  पढ़ने   वाले बच्चे  समझदार है  और  ज्याद   अक्ल  रखते  है। ये पोल खोल  का 1 ( A )  है 1 .B अब इनकी  क्या  मान्यता  है   उसके  बारे  में  बताऊंगा  (इन्शाल्लाह) या  अल्लाह  बयान  करने  या  लिखने  में  कोई भी  किस्म  की  खामी  लगती गुस्ताखि  हुई हो  तू बहेतर जानने  वाला  है  माफ फ़रमा  दे  ( आमीन ) अल्हम्दुलिल्लाह ।

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